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पहरुआ जागो रे, चोरवा लागे तोरे पीछे
Varanasi
Updated Sun, 05 May 2013 05:30 AM IST
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वाराणसी। ‘पहरुआ जागो रे, चोरवा लागे तोरे पीछे’। पद्मभूषण पं. राजन-साजन मिश्र ने गोहराना शुरू किया तो पूरब से सूरज झांकने लगा। राग कोमल ऋषभ आसावरी के स्वर के चलन को परिवर्तित करके विलासखानी तोड़ी के रूप में पेश किया। सूरज चढ़ता गया और यशस्वी गायक जोड़ी उल्लास से भरती गई और ठुमरी, टप्पा, भजन की झड़ी लग गई। सब कुछ भैरवी में। घड़ी की बड़ी सूई छह और छोटी सात पर लटक गईं लेकिन श्रोताओं के मन का कांटा उमंग से बांहें पसारे रहा। उनको आश्वासन मिला कि किसी एक साल वह दो घंटे तक केवल ठुमरी गाएंगे। शनिवार की इस प्रस्तुति के साथ ही अगले साल 19 अप्रैल से मिलने के वादे के साथ संकटमोचन संगीत समारोह को विराम दे दिया गया।
संगीत समारोह की अंतिम प्रस्तुति की शुरुआत गायक युगल पं. राजन-साजन मिश्र ने मंगला आरती की समाप्ति पर की। उन्होंने राग कोमल ऋषभ आसावरी की विलंबित रचना ‘पहरुआ जाग रे, चोरवा लागे तोरे पीछे’ में तानों के सधे इस्तेमाल से लोगों को जगाया। द्रुत बंदिश ‘बढ़इया लाओ, आज सुघर गढ़े पलना’ सुनाकर सबको चैतन्य कर दिया। कोमल ऋषभ आसावरी के स्वरों के चलन बदलने से बन जाने वाले राग विलासखानी तोड़ी में एक ताल की द्रुत बंदिश सुनाई तो सब उनकी गायकी के कायल रह गए। खयाल का दौर थमते ही लोगों ने भजन की फरमाइश शुरू कर दी। राजन मिश्र ने कहा कि ‘धन्य भाग्य सेवा का अवसर पाया’ तो हर साल गाता हूं। आज कुछ और होगा। उन्होंने भैरवी में एक टप्पा सुनाया। उसके बाद भैरवी में ठुमरी ‘बाजूबंद खुल खुल जाए’ सुनाते समय कहा कि बनारस की ठुमरी में एक स्वर पर पांच, बोल दूसरे पर पांच, तीसरे पर दस बोल सुनाए जाते थे। खयाल की तरह विस्तार लेने वाली ठुमरी तो कब की जा चुकी है। जो सुना है, उसी अंदाज में विस्तार करूंगा। समापन ‘धन्य भाग सेवा का..’ से किया। हारमोनियम पर पं. धर्मनाथ मिश्र एवं तबले पर कुमार बोस ने यादगार संगत की। उनकी संग-साथ से गायकी का रूतबा बुलंद हुआ।
बेंगलूरू के गायक जयतीर्थ मेउंडी ने गायन की शुरुआत राग दरबारी कान्हड़ा से किया। झूमरा ताल में बड़ा एवं तीन ताल में छोटा खयाल सुनाने के बाद उन्होंने राग बसंत की बंदिश ‘फगवा ब्रज देखन को चलो री’ छेड़ दी। बेमौसम इस बंदिश से श्रोताओं को खटका लगा लेकिन उन्होंने चलन बदल कर इसे परज में कर दिया। तबले पर सुधीर पांडेय ने संगत की। उनके बाद बनारस के कलाकार अमरनाथ मिश्र ने सितार पर राग भटियार में आलाप, जोड़ बजाया और भैरवी धुन से समापन किया। तबले पर कुबेरनाथ मिश्र ने संगत की। संचालन पं. हरिराम द्विवेदी एवं प्रतिमा सिन्हा ने किया। कलाकारों का स्वागत महंत प्रो. विश्वंभरनाथ मिश्र ने किया।
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संगीत समारोह की अंतिम प्रस्तुति की शुरुआत गायक युगल पं. राजन-साजन मिश्र ने मंगला आरती की समाप्ति पर की। उन्होंने राग कोमल ऋषभ आसावरी की विलंबित रचना ‘पहरुआ जाग रे, चोरवा लागे तोरे पीछे’ में तानों के सधे इस्तेमाल से लोगों को जगाया। द्रुत बंदिश ‘बढ़इया लाओ, आज सुघर गढ़े पलना’ सुनाकर सबको चैतन्य कर दिया। कोमल ऋषभ आसावरी के स्वरों के चलन बदलने से बन जाने वाले राग विलासखानी तोड़ी में एक ताल की द्रुत बंदिश सुनाई तो सब उनकी गायकी के कायल रह गए। खयाल का दौर थमते ही लोगों ने भजन की फरमाइश शुरू कर दी। राजन मिश्र ने कहा कि ‘धन्य भाग्य सेवा का अवसर पाया’ तो हर साल गाता हूं। आज कुछ और होगा। उन्होंने भैरवी में एक टप्पा सुनाया। उसके बाद भैरवी में ठुमरी ‘बाजूबंद खुल खुल जाए’ सुनाते समय कहा कि बनारस की ठुमरी में एक स्वर पर पांच, बोल दूसरे पर पांच, तीसरे पर दस बोल सुनाए जाते थे। खयाल की तरह विस्तार लेने वाली ठुमरी तो कब की जा चुकी है। जो सुना है, उसी अंदाज में विस्तार करूंगा। समापन ‘धन्य भाग सेवा का..’ से किया। हारमोनियम पर पं. धर्मनाथ मिश्र एवं तबले पर कुमार बोस ने यादगार संगत की। उनकी संग-साथ से गायकी का रूतबा बुलंद हुआ।
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बेंगलूरू के गायक जयतीर्थ मेउंडी ने गायन की शुरुआत राग दरबारी कान्हड़ा से किया। झूमरा ताल में बड़ा एवं तीन ताल में छोटा खयाल सुनाने के बाद उन्होंने राग बसंत की बंदिश ‘फगवा ब्रज देखन को चलो री’ छेड़ दी। बेमौसम इस बंदिश से श्रोताओं को खटका लगा लेकिन उन्होंने चलन बदल कर इसे परज में कर दिया। तबले पर सुधीर पांडेय ने संगत की। उनके बाद बनारस के कलाकार अमरनाथ मिश्र ने सितार पर राग भटियार में आलाप, जोड़ बजाया और भैरवी धुन से समापन किया। तबले पर कुबेरनाथ मिश्र ने संगत की। संचालन पं. हरिराम द्विवेदी एवं प्रतिमा सिन्हा ने किया। कलाकारों का स्वागत महंत प्रो. विश्वंभरनाथ मिश्र ने किया।
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