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काशी को संस्कृति का चिराग जलाना होगा : फारुख शेख
Varanasi
Updated Mon, 25 Feb 2013 05:30 AM IST
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वाराणसी। बेदरो-दीवार का इक घर बनाना चाहिए। यह ख्वाब मिर्जा गालिब का है। यह तसव्वुर उन्हें दिल्ली से कोलकाता (तब कलकत्ता) जाते समय काशी में हुआ था। वह औरंगाबाद की सराय में महीने भर रुके रहे। इल्म और फलसफों की दीवारें छीलते रहे और चराग-ए-दैर (मंदिर का दीप) में उसे बयां किया। इसी की याद में अभिनेता फारुख शेख और गायिका सोमा घोष को गालिब सम्मान दिया गया। उनसे गुजारिश की गई कि सिनेमा और संगीत की दुनिया में बन रही दीवारों को गिराएं और नया चराग जलाएं। हिंदी सिनेमा की सुंदर अदाकारा मधुबाला के नाम पर मधुबाला एलिगेंट एवार्ड रंगकर्मी रिजवाना मर्चेंट और भारती मधोक को दिया गया।
मलदहिया स्थित एक होटल में संस्था अक की ओर से आयोजित समारोह में सम्मान पाने के बाद फारुख ने कहा कि हम कभी गालिब पर फिल्में बनाते थे। मधुबाला के पीछे पतंगों की तरह चाहने वाले मंडराते थे लेकिन आज फेविकोल लेकर तस्वीर चिपकाने की गुजारिश करनी पड़ रही। तीन घंटे तक चुपचाप, बिना हाथ-पांव हिलाए अंधेरे कमरे में एक तरफ देखने की सजा के लिए रुपये चुकाने पड़ते हैं। इसके बावजूद सिनेमा के दर्शक यदि गुणवत्ता की मांग नहीं करेंगे तो सिनेमा बिगड़ जाएगा। आप मांग कीजिए फिल्मकार जनता की खुशी-नाराजगी से ज्यादा डरता है। काशी के अलावा कोई शहर दुनिया में नहीं है, जो धर्म, संस्कृति, संगीत, ज्ञान, खानपान, शायरी का केंद्र और महान सपूतों की जन्मभूमि हो। हुकूमत जनित तमाम बेइंतजामियों के बावजूद यहां आस्था जिंदा है। फास्ट फूड के इस दौर में काशी को संस्कृति का चिराग जलाना होगा।
आरंभ में अदिति चक्रवर्ती ने गालिब की रचना आके मेरी जान को करार नहीं के बाद दादरा श्याम तोहे नजरिया लग जाएगी सुनाया। सोमा घोष ने गालिब की रचना रहिए अब ऐसी जगह चलकर जहां कोई न हो, दुष्यंत की रचना चांदनी छत पे चल रही होगी और आज जाने की जिद ना करो सुनाई तो दीपक मधोक ने चौदवीं का चांद हो पेश किया। रिजवाना मर्चेंट ने इतना ही कहा कि जीवन बाक्सिंग की रिंग की तरह है, आप तब हारते हैं जब उठ नहीं पाते। अतिथियों का स्वागत अक के संस्थापक ओमा, संचालन सुमन पाठक, इमरान हसन, धन्यवाद ज्ञापन अजय गुप्ता ने किया। राय चैतन्य, डा. विश्वनाथ पांडेय, तेज प्रताप दूबे, मोहित अग्रवाल, नज्मी सुल्तान, लक्ष्मण दास, अमित श्रीवास्तव, नज्मी सुल्तान, वहाउद्दीन सिद्दीकी आदि ने सहयोग किया।
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मलदहिया स्थित एक होटल में संस्था अक की ओर से आयोजित समारोह में सम्मान पाने के बाद फारुख ने कहा कि हम कभी गालिब पर फिल्में बनाते थे। मधुबाला के पीछे पतंगों की तरह चाहने वाले मंडराते थे लेकिन आज फेविकोल लेकर तस्वीर चिपकाने की गुजारिश करनी पड़ रही। तीन घंटे तक चुपचाप, बिना हाथ-पांव हिलाए अंधेरे कमरे में एक तरफ देखने की सजा के लिए रुपये चुकाने पड़ते हैं। इसके बावजूद सिनेमा के दर्शक यदि गुणवत्ता की मांग नहीं करेंगे तो सिनेमा बिगड़ जाएगा। आप मांग कीजिए फिल्मकार जनता की खुशी-नाराजगी से ज्यादा डरता है। काशी के अलावा कोई शहर दुनिया में नहीं है, जो धर्म, संस्कृति, संगीत, ज्ञान, खानपान, शायरी का केंद्र और महान सपूतों की जन्मभूमि हो। हुकूमत जनित तमाम बेइंतजामियों के बावजूद यहां आस्था जिंदा है। फास्ट फूड के इस दौर में काशी को संस्कृति का चिराग जलाना होगा।
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आरंभ में अदिति चक्रवर्ती ने गालिब की रचना आके मेरी जान को करार नहीं के बाद दादरा श्याम तोहे नजरिया लग जाएगी सुनाया। सोमा घोष ने गालिब की रचना रहिए अब ऐसी जगह चलकर जहां कोई न हो, दुष्यंत की रचना चांदनी छत पे चल रही होगी और आज जाने की जिद ना करो सुनाई तो दीपक मधोक ने चौदवीं का चांद हो पेश किया। रिजवाना मर्चेंट ने इतना ही कहा कि जीवन बाक्सिंग की रिंग की तरह है, आप तब हारते हैं जब उठ नहीं पाते। अतिथियों का स्वागत अक के संस्थापक ओमा, संचालन सुमन पाठक, इमरान हसन, धन्यवाद ज्ञापन अजय गुप्ता ने किया। राय चैतन्य, डा. विश्वनाथ पांडेय, तेज प्रताप दूबे, मोहित अग्रवाल, नज्मी सुल्तान, लक्ष्मण दास, अमित श्रीवास्तव, नज्मी सुल्तान, वहाउद्दीन सिद्दीकी आदि ने सहयोग किया।
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