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ब्रोकेड का ताना-बाना, कबीर का दर्शन जाना
Varanasi
Updated Wed, 14 Nov 2012 12:00 PM IST
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वाराणसी। बनारसी ब्रोकेड की दुनिया दीवानी है। सिंगापुर में रहने वाली आयरिश मूल की फिल्मकार पैट मर्फी ब्रोकेड और बनारसी सिल्क की दस्तकारी की तकनीक और उसकी परंपरा की पड़ताल करती हुई काशी की गलियों में घूम रही हैं। वह बुनकरी के हर पहलू पर काम कर रही हैं। मंगलवार को उनकी टीम ने कबीरचौरा मूलगादी मठ में संत कबीर के पदों की रिकार्डिगिं की। पीठाधीश्वर संत विवेक दास आचार्य से उनके दर्शन को समझा। ताना-बाना का मर्म जाना।
’चादर हो गई बहुत पुरानी, अब तो सोच समझ अभिमानी’। रामप्रसाद दास अपनी मंडली के साथ कबीर के इस पद की टेर लगा रहे थे। शिवानी और अमला छवि और ध्वनि का अंकन कर रही थीं। निर्देशक पैट मर्सी ने कट किया और ‘काशी बसै जुलाहा एक, हरि भक्तन की पकड़ी टेक’ का गायन शुरू हो गया। सुबह दो घंटे तक टीम के सदस्य कबीर के पदों, कबीरचौरा मूलगादी मठ की छवियों को कैद करने में लगे रहे। पीठाधीश्वर संत विवेक दास आचार्य का साक्षात्कार हुआ। उसके बाद शूटिंग पैकअप हो गई। गांधीयन इंस्टीट्यूट आफ स्टडीज और पैट मर्फी की टीम मठ से चली गई। यह टीम पिछले 12 दिनों से बुनकरी की परंपरा को समझने के लिए काशी की गलियों की खाक छान रही है। अब तक टीम ने रेवड़ी तालाब, मदनपुरा, लोहता, चौक बाजार, घुंघरानी गली, जरी के निर्माण के तरीके आदि का फिल्मांकन किया है। बुनकरी में लगी महिलाओं से भी टीम के सदस्यों ने लंबी बातचीत की है। टीम के सहयोगी प्रो. दीपक मलिक और मुनीजा रफीक खान ने बताया कि टेक्सटाइल की प्रोफेसर एनी डेबल की प्रेरणा से मर्फी बुनकरी पर वृत्तचित्र बनाने निकली थीं। यहां उन्होंने बुनकरी के पीछे दर्शन महसूस किया तो कैनवास बड़ा हो गया। काम के दौरान ही उन्हें फिल्म का नाम ‘ताना-बाना’ सूझा है। वह एक हफ्ते यहां रहेंगी। यह फिल्म दुनिया भर में टेक्सटाइल और फैशन डिजाइनिंग के विद्यार्थियों के बीच प्रदर्शित की जानी थी लेकिन इसका दायरा बढ़ गया है।
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’चादर हो गई बहुत पुरानी, अब तो सोच समझ अभिमानी’। रामप्रसाद दास अपनी मंडली के साथ कबीर के इस पद की टेर लगा रहे थे। शिवानी और अमला छवि और ध्वनि का अंकन कर रही थीं। निर्देशक पैट मर्सी ने कट किया और ‘काशी बसै जुलाहा एक, हरि भक्तन की पकड़ी टेक’ का गायन शुरू हो गया। सुबह दो घंटे तक टीम के सदस्य कबीर के पदों, कबीरचौरा मूलगादी मठ की छवियों को कैद करने में लगे रहे। पीठाधीश्वर संत विवेक दास आचार्य का साक्षात्कार हुआ। उसके बाद शूटिंग पैकअप हो गई। गांधीयन इंस्टीट्यूट आफ स्टडीज और पैट मर्फी की टीम मठ से चली गई। यह टीम पिछले 12 दिनों से बुनकरी की परंपरा को समझने के लिए काशी की गलियों की खाक छान रही है। अब तक टीम ने रेवड़ी तालाब, मदनपुरा, लोहता, चौक बाजार, घुंघरानी गली, जरी के निर्माण के तरीके आदि का फिल्मांकन किया है। बुनकरी में लगी महिलाओं से भी टीम के सदस्यों ने लंबी बातचीत की है। टीम के सहयोगी प्रो. दीपक मलिक और मुनीजा रफीक खान ने बताया कि टेक्सटाइल की प्रोफेसर एनी डेबल की प्रेरणा से मर्फी बुनकरी पर वृत्तचित्र बनाने निकली थीं। यहां उन्होंने बुनकरी के पीछे दर्शन महसूस किया तो कैनवास बड़ा हो गया। काम के दौरान ही उन्हें फिल्म का नाम ‘ताना-बाना’ सूझा है। वह एक हफ्ते यहां रहेंगी। यह फिल्म दुनिया भर में टेक्सटाइल और फैशन डिजाइनिंग के विद्यार्थियों के बीच प्रदर्शित की जानी थी लेकिन इसका दायरा बढ़ गया है।
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