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बीएचयू में शुरू होगा फारेंसिक साइंस का नया कोर्स
Varanasi
Updated Fri, 04 May 2012 12:00 PM IST
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वाराणसी। काशी हिंदू विश्वविद्यालय में विश्वस्तरीय चिकित्सा सेवा के साथ अंतरराष्ट्रीय चिकित्सा शिक्षा मुहैया कराने की तैयारी चल रही है। इसी कड़ी में फोरेंसिक साइंस पर नया पाठ्यक्रम शुरू करने का निर्णय लिया गया है। यह पाठ्यक्रम स्नातकोत्तर और डिप्लोमा स्तरीय तो होगा, इसमें शोध भी किए जाएंगे। प्रयास है कि विद्यार्थियों को साइबर क्राइम, फिंगर प्रिंट के क्षेत्र में माहिर बनाया जाए। साथ ही वह प्वायजनिंग, बैलेस्टिक और क्रिमिनोलाजी विधा का भी ज्ञाता होगा। इससे न्यायिक संस्थाओं को विज्ञान सम्मत तर्क और प्रमाण के साथ घटना के तह तक पहुंच कर न्याय करने में सहूलियत होगी।
अमर उजाला से खास बातचीत में कुलपति पद्मश्री डा. लालजी सिंह ने यह जानकारी दी। बताया कि यह नए दौर की जरूरत वाला पाठ्यक्रम है। देश में इन विधाओं के विशेषज्ञों की काफी कमी है। इस पाठ्यक्रम को तैयार करने के लिए आंध्र प्रदेश स्टेट फारेंसिक लैबोरेटरी के निदेशक डा. केपीसी गांधी को आमंत्रित किया गया है। प्रारूप तैयार होने पर उसे एकेडेमिक और एक्जीक्यूटिव कौंसिल में स्वीकृति के लिए प्रस्तुत किया जाएगा। अनुमान है कि वर्ष 2013 -14 के सत्र से लागू हो जाएगा। यह पूरी तरह अंतरराष्ट्रीय मानक का होगा। बता दें कि कुलपति स्वयं ही डीएनए फिंगर प्रिंट के विशेषज्ञ हैं। पूर्व प्रधानमंत्री स्व. राजीव गांधी हत्याकांड, नैना साहनी हत्याकांड, पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री बेअंत सिंह हत्याकांड में इन्होंने अपराध की उलझी गुत्थी इसी विधा से सुलझाई थी।
कुलपति डा. सिंह ने बताया कि इस क्रम में विश्वविद्यालय कुछ महत्वपूर्ण कदम आगे बढ़ा भी चुका है। चंद माह में चिकित्सा विज्ञान संस्थान में डीएनए सिक्वेंसिंग उपकरण काम करना शुरू कर देगा। सिक्वेंसिंग की एक किट की कीमत इस समय करीब 30 लाख रुपये है। इस उपकरण पर एक दिन में एक किट का रिजल्ट आएगा। एक दिन में एक व्यक्ति के सभी जीन का लेखाजोखा निकल जाएगा। इससे व्याधि और बीमारी संबंधी अबूझ और अज्ञात कारणों का सटीक पता चल सकेगा। उपकरण लगाने वाली कंपनी के दक्ष लोगों की टीम यहां पांच वर्ष तक रहेगी ताकि विश्वविद्यालय में भी इस फन के माहिर लोगों की विश्वस्तरीय टीम तैयार हो जाए। सब कुछ केंद्रीयकृत व्यवस्था के तहत होगा। बताया कि जीनोम फाउंडेशन की सुविधा का राष्ट्रीय नेटवर्क बनाने की योजना है ताकि इसका लाभ देश के हर लोगों को मिल सके।
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अमर उजाला से खास बातचीत में कुलपति पद्मश्री डा. लालजी सिंह ने यह जानकारी दी। बताया कि यह नए दौर की जरूरत वाला पाठ्यक्रम है। देश में इन विधाओं के विशेषज्ञों की काफी कमी है। इस पाठ्यक्रम को तैयार करने के लिए आंध्र प्रदेश स्टेट फारेंसिक लैबोरेटरी के निदेशक डा. केपीसी गांधी को आमंत्रित किया गया है। प्रारूप तैयार होने पर उसे एकेडेमिक और एक्जीक्यूटिव कौंसिल में स्वीकृति के लिए प्रस्तुत किया जाएगा। अनुमान है कि वर्ष 2013 -14 के सत्र से लागू हो जाएगा। यह पूरी तरह अंतरराष्ट्रीय मानक का होगा। बता दें कि कुलपति स्वयं ही डीएनए फिंगर प्रिंट के विशेषज्ञ हैं। पूर्व प्रधानमंत्री स्व. राजीव गांधी हत्याकांड, नैना साहनी हत्याकांड, पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री बेअंत सिंह हत्याकांड में इन्होंने अपराध की उलझी गुत्थी इसी विधा से सुलझाई थी।
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कुलपति डा. सिंह ने बताया कि इस क्रम में विश्वविद्यालय कुछ महत्वपूर्ण कदम आगे बढ़ा भी चुका है। चंद माह में चिकित्सा विज्ञान संस्थान में डीएनए सिक्वेंसिंग उपकरण काम करना शुरू कर देगा। सिक्वेंसिंग की एक किट की कीमत इस समय करीब 30 लाख रुपये है। इस उपकरण पर एक दिन में एक किट का रिजल्ट आएगा। एक दिन में एक व्यक्ति के सभी जीन का लेखाजोखा निकल जाएगा। इससे व्याधि और बीमारी संबंधी अबूझ और अज्ञात कारणों का सटीक पता चल सकेगा। उपकरण लगाने वाली कंपनी के दक्ष लोगों की टीम यहां पांच वर्ष तक रहेगी ताकि विश्वविद्यालय में भी इस फन के माहिर लोगों की विश्वस्तरीय टीम तैयार हो जाए। सब कुछ केंद्रीयकृत व्यवस्था के तहत होगा। बताया कि जीनोम फाउंडेशन की सुविधा का राष्ट्रीय नेटवर्क बनाने की योजना है ताकि इसका लाभ देश के हर लोगों को मिल सके।
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