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सारनाथ में जीवंत हुईं हिमालय की वादियां0
Updated Tue, 20 Mar 2018 02:27 AM IST
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वाराणसी। हिमालय की गोद में फल-फूल रहे कला व संस्कृति के चटख रंग जब बौद्ध की उपदेश स्थली सारनाथ में जीवंत हुए तो हर दिल झूम उठा। मंच पर कभी तिब्बत की प्राचीन परंपराओं की झलक दिखी तो कभी युवाओं की उमंग।
मौका था सारनाथ स्थित केंद्रीय उच्च तिब्बती शिक्षा संस्थान में आयोजित भारतीय विश्वविद्यालय संघ के 92वें वार्षिक अधिवेशन की सांस्कृतिक संध्या का। कार्यक्रम का आगाज तिब्बती पारंपरिक नृत्य ‘ताशी शोल्पा’ पेश किया गया। इसके बाद गुरुओं द्वारा दी जाने वाली धर्म की शिक्षा को प्रदर्शित करती तिब्बत का सांस्कृतिक नृत्य ‘चोए कि खोर्लो कोर्सा’पेश किया गया।
इसके बाद तिब्बत के विभिन्न हिस्सों में प्रचलित नृत्य विधाओं को बड़े ही आकर्षक और भावपूर्ण ढंग से स्थानीय विद्यार्थियों ने प्रस्तुत किया। इस दौरान परिवार में पिता के महत्व और जिम्मेदारियों को रेखांकित करती एक गीत पेश किया गया। इसी क्रम में भूटान, नेपाल सहित अन्य क्षेत्रों के कलाकारों ने नृत्य प्रदर्शित किया। अरुणांचल और फिर लद्दाख में प्रचलित युवक-युवतियों के बीच के प्रेम संवादों को नृत्य के माध्यम से दर्शकों के समक्ष रखा गया। संचालन नीमा छेयरिंग ने किया।
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मौका था सारनाथ स्थित केंद्रीय उच्च तिब्बती शिक्षा संस्थान में आयोजित भारतीय विश्वविद्यालय संघ के 92वें वार्षिक अधिवेशन की सांस्कृतिक संध्या का। कार्यक्रम का आगाज तिब्बती पारंपरिक नृत्य ‘ताशी शोल्पा’ पेश किया गया। इसके बाद गुरुओं द्वारा दी जाने वाली धर्म की शिक्षा को प्रदर्शित करती तिब्बत का सांस्कृतिक नृत्य ‘चोए कि खोर्लो कोर्सा’पेश किया गया।
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इसके बाद तिब्बत के विभिन्न हिस्सों में प्रचलित नृत्य विधाओं को बड़े ही आकर्षक और भावपूर्ण ढंग से स्थानीय विद्यार्थियों ने प्रस्तुत किया। इस दौरान परिवार में पिता के महत्व और जिम्मेदारियों को रेखांकित करती एक गीत पेश किया गया। इसी क्रम में भूटान, नेपाल सहित अन्य क्षेत्रों के कलाकारों ने नृत्य प्रदर्शित किया। अरुणांचल और फिर लद्दाख में प्रचलित युवक-युवतियों के बीच के प्रेम संवादों को नृत्य के माध्यम से दर्शकों के समक्ष रखा गया। संचालन नीमा छेयरिंग ने किया।
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