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ट्रस्ट का ही है राधा कृष्ण गोपाल मंदिर
Updated Tue, 20 Mar 2018 01:32 AM IST
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गोपीगंज। नगर के सदर मोहाल में स्थित राधा कृष्ण गोपाल मंदिर किसी की निजी संपत्ति नहीं है। यह ट्रस्ट के अधीन है। निर्माणकर्ता ने मंदिर और मंदिर की जमीन को ट्रस्ट में दे दिया है। जबकि मंदिर और उसकी जमीन पर एक व्यक्ति का कब्जा बताया जा रहा है। इसकी जांच के बाद चौकी प्रभारी ने रिपोर्ट अपर उप जिलाधिकारी के न्यायालय में पेश करने के साथ ही इसकी कॉपी पुलिस अधीक्षक को सौंप दी है।
सदर मोहाल में स्थित राधा कृष्ण गोपाल मंदिर का निर्माण 1931 में हुआ था। मंदिर के अगल बगल कमरे हैं। इसका निर्माण गोपालदास मारवाड़ी ने कराया था। उनकी मृत्यु के बाद उनकी पत्नी तिरपति देवी देखरेख करती थीं। तिरपति देवी ने मंदिर और उसकी जमीन के लिए एक फरवरी 1931 को ट्रस्ट का गठन किया। मंदिर राधा कृष्ण के ट्रस्ट में जंग बहादुर सिंह, रामकिशुन दुबे, सागरमल, विट्ठलदास मारवाड़ी, जगन्नाथदास मारवाड़ी को शामिल किया गया। चार लोगों की मृत्यु के बाद सागरमल मारवाड़ी ने 1982 में चार नए ट्रस्टी को शामिल कर लिया। ट्रस्टियों ने मंदिर को देखभाल के लिए नगर पालिका को देना चाहा, किंतु पालिका ने लेने से इनकार कर दिया। ट्रस्टियों में जय प्रकाश अग्रवाल जीवित हैं। उन्होंने पुन: ट्रस्ट का गठन किया। इसमें जय प्रकाश अग्रवाल, भिखारी लाल अग्रवाल, मुकेश अग्रवाल, छेदीलाल, दीनदयाल अग्रवाल, अशोक तिवारी और लोकेश तिवारी को ट्रस्टी बनाया। मंदिर से संबंधित अभिलेख अवलोकन किया गया तो 1375 फसली 1373 में राजस्व खतौनी में मंदिर दर्ज है। किंतु 1377 में मंदिर के नाम के आगे देवी प्रसाद, राम प्रसाद पुत्र गण महानंदा प्रसाद दर्ज है। देवी प्रसाद को कोई औलाद नहीं थी। मंदिर और उसकी जमीन पर जिस व्यक्ति का कब्जा है, वह उनके भतीजे हैं। रिपोर्ट में यह भी लिखा गया है कि ये लोग मंदिर का पुजारी बनकर मंदिर और उसके जमीन पर कब्जा किए हुए हैं। मंदिर का दरवाजा बंद रहता है। इससे नगर में सरगर्मी बढ़ी है।
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सदर मोहाल में स्थित राधा कृष्ण गोपाल मंदिर का निर्माण 1931 में हुआ था। मंदिर के अगल बगल कमरे हैं। इसका निर्माण गोपालदास मारवाड़ी ने कराया था। उनकी मृत्यु के बाद उनकी पत्नी तिरपति देवी देखरेख करती थीं। तिरपति देवी ने मंदिर और उसकी जमीन के लिए एक फरवरी 1931 को ट्रस्ट का गठन किया। मंदिर राधा कृष्ण के ट्रस्ट में जंग बहादुर सिंह, रामकिशुन दुबे, सागरमल, विट्ठलदास मारवाड़ी, जगन्नाथदास मारवाड़ी को शामिल किया गया। चार लोगों की मृत्यु के बाद सागरमल मारवाड़ी ने 1982 में चार नए ट्रस्टी को शामिल कर लिया। ट्रस्टियों ने मंदिर को देखभाल के लिए नगर पालिका को देना चाहा, किंतु पालिका ने लेने से इनकार कर दिया। ट्रस्टियों में जय प्रकाश अग्रवाल जीवित हैं। उन्होंने पुन: ट्रस्ट का गठन किया। इसमें जय प्रकाश अग्रवाल, भिखारी लाल अग्रवाल, मुकेश अग्रवाल, छेदीलाल, दीनदयाल अग्रवाल, अशोक तिवारी और लोकेश तिवारी को ट्रस्टी बनाया। मंदिर से संबंधित अभिलेख अवलोकन किया गया तो 1375 फसली 1373 में राजस्व खतौनी में मंदिर दर्ज है। किंतु 1377 में मंदिर के नाम के आगे देवी प्रसाद, राम प्रसाद पुत्र गण महानंदा प्रसाद दर्ज है। देवी प्रसाद को कोई औलाद नहीं थी। मंदिर और उसकी जमीन पर जिस व्यक्ति का कब्जा है, वह उनके भतीजे हैं। रिपोर्ट में यह भी लिखा गया है कि ये लोग मंदिर का पुजारी बनकर मंदिर और उसके जमीन पर कब्जा किए हुए हैं। मंदिर का दरवाजा बंद रहता है। इससे नगर में सरगर्मी बढ़ी है।
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