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फूलों की खुशबू से सराबोर फिजाएं
Updated Sun, 19 Nov 2017 02:02 AM IST
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वाराणसी। दीनापुर गांव की ओर जाने वाली पगडंडियां शुरू होने से पहले ही फूलों की खुशबू इस्तकबाल करती है। दूर-दूर तक फूल ही फूल और आब-ओ-हवा में उनकी खुशबू। कहीं गुड़हल, कुंद, बेला के पौधे हैं तो कहीं गुलाब, गेंदा की क्यारियां। यही खूबी दीनापुर को और गांवों से अलग करती है। यहां गेहूं, धान की नहीं, फूलों की खेती होती है। बनारस का ये वो अनूठा गांव है जहां के फूल न केवल मंदिरों के इस शहर में बल्कि पूर्वांचल समेत बिहार तक अपनी खुशबू बिखेर रहे हैं। इन फूलों से ही इस गांव में करीब डेढ़ लाख की आमदनी होती है। गांव वालों के लिए ये फूल सोने से कम नहीं। मेहनत भले हो लेकिन फूलों से सोना उगाने का हुनर जान चुके दीनापुर के बाशिंदे आज समृद्ध और खुशहाल हैं।
जिला मुख्यालय से सात किलोमीटर दूर बसे इस गांव की आबादी करीब सात हजार है। मूलभूत सुविधाएं नदारद हैं, चलने को ढंग की सड़क नहीं है लेकिन दीनापुर को खास बना दिया है यहां के लोगाें की मेहनत और जज्बे ने। यहां रहने वाले तीन सौ परिवार तीन सौ एकड़ में फूलों की खेती करते हैं। पूरा गांव ही फूलों की एक बगिया जैसा दिखता है। कभी पूरा गांव पीले नारंगी गेंदे से पटा रहता है तो कभी सफेद बेले, कुंद व टेंगरी से। देसी गुलाब की खुशबू की तो बात ही अलग है। और हां, खेत किनारे बड़ी-बड़ी झाड़ियों में सुर्ख लाल गुड़हल का फूल।
करीब 30 साल से फूलों की खेती कर रहे अनिल बताते हैं कि अब तो अगल-बगल के गांव भी हमारी देखा-देखी फूलों की खेती करने लगे हैं। इस गांव से सटे धन्नीपुर में भी अब अधिकांश लोग फूल की खेती करने लगे हैं। गांव त्रिलोकी नाथ बताते हैं कि धान की खेती करने में जहां हमें तीन हजार का मुनाफा होता था, वहीं इन फूलों से हमें तीन गुना ज्यादा मुनाफा होता है। चूंकि एसटीपी बनने के कारण कई किसानों की जमीन चली गई तो अब लोगों के पास खेत कम है। कम जमीन में फूलों की खेती से ही मुनाफा हो सकता था तो हमने वही शुरू किया।
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सुनीता देवी कहती हैं कि फूलों की खेती बड़ी मेहनत का काम है। पहले पौधे लगाना, पानी देना, उनकी देखभाल करना। फूल आने पर उन्हें तोड़ना। उनकी माला बनाना और फिर उसे मंडी में ले जाकर बेचना। सुनीता कहती हैं कि फूल सरकारी तंत्र से हम भले मायूस हों लेकिन अपनी मेहनत से खुश हैं। बच्चे बेहतर शिक्षा हासिल कर रहे हैं।
यहां फूल जाते हैं
करीब सवा छह सौ एकड़ में बसे इस गांव के फूल मलदहिया और बांसफाटक फूल मंडी में जाते हैं। इन दोनों फूल मंडियों से पूरे पूर्वांचल और बिहार में फूल और माला की सप्लाई होती है।
इन फूलों की होती है खेती
गांव में गुलाब, गेंदे, गुड़हल, गुलदावदी, कुंद, जूही, बेला जैसे फूलों की खेती होती है। इन फूलों से खास तौर पर मंदिरों में चढ़ाने के लिए मालाएं बनाई जाती हैं। शादी-विवाह और त्योहारों पर फूलों की मांग काफी बढ़ जाती है। कुंद के फूल खास तौर पर गजरे और जयमाल बनाने के लिए उगाए जाते हैं।
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जिला मुख्यालय से सात किलोमीटर दूर बसे इस गांव की आबादी करीब सात हजार है। मूलभूत सुविधाएं नदारद हैं, चलने को ढंग की सड़क नहीं है लेकिन दीनापुर को खास बना दिया है यहां के लोगाें की मेहनत और जज्बे ने। यहां रहने वाले तीन सौ परिवार तीन सौ एकड़ में फूलों की खेती करते हैं। पूरा गांव ही फूलों की एक बगिया जैसा दिखता है। कभी पूरा गांव पीले नारंगी गेंदे से पटा रहता है तो कभी सफेद बेले, कुंद व टेंगरी से। देसी गुलाब की खुशबू की तो बात ही अलग है। और हां, खेत किनारे बड़ी-बड़ी झाड़ियों में सुर्ख लाल गुड़हल का फूल।
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करीब 30 साल से फूलों की खेती कर रहे अनिल बताते हैं कि अब तो अगल-बगल के गांव भी हमारी देखा-देखी फूलों की खेती करने लगे हैं। इस गांव से सटे धन्नीपुर में भी अब अधिकांश लोग फूल की खेती करने लगे हैं। गांव त्रिलोकी नाथ बताते हैं कि धान की खेती करने में जहां हमें तीन हजार का मुनाफा होता था, वहीं इन फूलों से हमें तीन गुना ज्यादा मुनाफा होता है। चूंकि एसटीपी बनने के कारण कई किसानों की जमीन चली गई तो अब लोगों के पास खेत कम है। कम जमीन में फूलों की खेती से ही मुनाफा हो सकता था तो हमने वही शुरू किया।
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सुनीता देवी कहती हैं कि फूलों की खेती बड़ी मेहनत का काम है। पहले पौधे लगाना, पानी देना, उनकी देखभाल करना। फूल आने पर उन्हें तोड़ना। उनकी माला बनाना और फिर उसे मंडी में ले जाकर बेचना। सुनीता कहती हैं कि फूल सरकारी तंत्र से हम भले मायूस हों लेकिन अपनी मेहनत से खुश हैं। बच्चे बेहतर शिक्षा हासिल कर रहे हैं।
यहां फूल जाते हैं
करीब सवा छह सौ एकड़ में बसे इस गांव के फूल मलदहिया और बांसफाटक फूल मंडी में जाते हैं। इन दोनों फूल मंडियों से पूरे पूर्वांचल और बिहार में फूल और माला की सप्लाई होती है।
इन फूलों की होती है खेती
गांव में गुलाब, गेंदे, गुड़हल, गुलदावदी, कुंद, जूही, बेला जैसे फूलों की खेती होती है। इन फूलों से खास तौर पर मंदिरों में चढ़ाने के लिए मालाएं बनाई जाती हैं। शादी-विवाह और त्योहारों पर फूलों की मांग काफी बढ़ जाती है। कुंद के फूल खास तौर पर गजरे और जयमाल बनाने के लिए उगाए जाते हैं।