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कैकई का दूसरा वरदान सुन मूर्छित हुए राजा दशरथ
Updated Tue, 02 Oct 2018 02:16 AM IST
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रामनगर। कोप भवन में रानी कैकई ने जब अपने दूसरे वरदान में भगवान राम के लिए चौदह वर्ष का वनवास मांगा तो राजा दशरथ दुख से मूर्छित हो गये। वह फिर उठकर विलाप करते हैं।
रामनगर की रामलीला में सोमवार रात राम वनवास की लीला की गई। इसमें अयोध्याकांड के दोहा एक से 57 तक का प्रसंग हुआ। पुरवासियों की अभिलाषा का मान करते हुए राजा दशरथ भगवान राम को सिंहासन पर बैठाने की बात करते हैं। गुरु वशिष्ठ भी कहते हैं कि इस शुभ कार्य में अब देर नहीं करनी चाहिए। तैयारी कराई जाए। राम का राजतिलक होते देख इंद्र घबरा जाते हैं। वह माता सरस्वती से कहते हैं कि आप कुछ करिए ताकि राम वन जाएं। नारद भी भगवान राम और सीता के पास जाकर कहते हैं कि उन्हें देवताओं की भलाई के लिए राज छोड़कर वन गमन का उपाय करना चाहिए। इस बीच सरस्वती कैकई की दासी मंथरा की बुद्धि फेर देती हैं। वह कैकई के कान भरती है। कैकई कोप भवन में जा बैठती हैं। राजा दशरथ उन्हें मनाने आते हैं तो वह पहले वरदान में भरत के लिए राजतिलक और दूसरे वरदान में राम के लिए वनवास मांगती हैं। दशरथ कहते हैं कि तुम सूर्यवंश के लिए कुल्हाड़ी मत बनो। वह सिर पीटकर तड़पने लगते हैं। राम को बुलाकर कैकई अपने वरदान के बारे में बताती हैं तो वह सहर्ष वन जाने को तैयार हो जाते हैं। राम का वनवास सुनकर अयोध्यावासी कैकई को कोसते हैं।
राम माता कौशल्या से वन गमन की आज्ञा लेने जाते हैं। सीता तभी कौशल्या के चरण पकड़कर प्रणाम करती हैं तो उन्हें अचल सुहाग का आशीर्वाद देती हैं। यहीं पर भगवान की आरती के बाद लीला को विश्राम दे दिया गया।
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रामनगर की रामलीला में सोमवार रात राम वनवास की लीला की गई। इसमें अयोध्याकांड के दोहा एक से 57 तक का प्रसंग हुआ। पुरवासियों की अभिलाषा का मान करते हुए राजा दशरथ भगवान राम को सिंहासन पर बैठाने की बात करते हैं। गुरु वशिष्ठ भी कहते हैं कि इस शुभ कार्य में अब देर नहीं करनी चाहिए। तैयारी कराई जाए। राम का राजतिलक होते देख इंद्र घबरा जाते हैं। वह माता सरस्वती से कहते हैं कि आप कुछ करिए ताकि राम वन जाएं। नारद भी भगवान राम और सीता के पास जाकर कहते हैं कि उन्हें देवताओं की भलाई के लिए राज छोड़कर वन गमन का उपाय करना चाहिए। इस बीच सरस्वती कैकई की दासी मंथरा की बुद्धि फेर देती हैं। वह कैकई के कान भरती है। कैकई कोप भवन में जा बैठती हैं। राजा दशरथ उन्हें मनाने आते हैं तो वह पहले वरदान में भरत के लिए राजतिलक और दूसरे वरदान में राम के लिए वनवास मांगती हैं। दशरथ कहते हैं कि तुम सूर्यवंश के लिए कुल्हाड़ी मत बनो। वह सिर पीटकर तड़पने लगते हैं। राम को बुलाकर कैकई अपने वरदान के बारे में बताती हैं तो वह सहर्ष वन जाने को तैयार हो जाते हैं। राम का वनवास सुनकर अयोध्यावासी कैकई को कोसते हैं।
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राम माता कौशल्या से वन गमन की आज्ञा लेने जाते हैं। सीता तभी कौशल्या के चरण पकड़कर प्रणाम करती हैं तो उन्हें अचल सुहाग का आशीर्वाद देती हैं। यहीं पर भगवान की आरती के बाद लीला को विश्राम दे दिया गया।
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