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खामियों की परतों पर खामोशी का परदा

Fri, 22 Dec 2017 02:25 AM IST
Updated Fri, 22 Dec 2017 02:25 AM IST
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खामियों की परतों पर खामोशी का परदा
वाराणसी। वरुणा कॉरिडोर की शुरुआत के समय ही नदी विशेषज्ञों ने सुझाव दिया था कि सबसे पहले डूब क्षेत्र खाली कराकर नदी के प्राकृत स्वरूप को संरक्षित किया जाए और नालों से गिरते सीवेज को रोकने के लिए इंटरसेप्टर पाइप लाइन बिछाई जाए। चेताया भी था कि इन सुझावों की अनदेखी हुई तो कॉरिडोर के औचित्यहीन होने के साथ ही वरुणा के नवजीवन और विकास का सपना भी अधूरा रह जाएगा। बावजूद इसके न सिर्फ नदी विशेषज्ञों की राय की खुलेआम अनदेखी की गई बल्कि चंद अफसरों और जनप्रतिनिधियों की मनमानी ने पूरी योजना को वरुणा के संरक्षण के उसके मूल उद्देश्य से ही भटका दिया। हैरानी की बात यह है कि गड़बड़ियों को सुधारने के बजाए अब भी उन्हें ढंकने की कोशिशें जारी हैं। खामियों की परतों पर नीचे से ऊपर तक खामोशी का परदा पड़ा है।
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नई सरकार में भी कॉरिडोर को लेकर न तो अफसरों का रवैया बदला न ही कार्यप्रणाली। एक के बाद एक खामियां सामने आने के बावजूद पूर्ववर्ती सरकार में नीचे से ऊपर तक जिम्मेदारों ने चुप्पी साधे रखी। अब भी इसके मूल उद्देश्य वरुणा के संरक्षण पर ध्यान देने की जगह बजट खपाऊ नीति को ही आगे बढ़ाया जा रहा है। जबकि, नदी विशेषज्ञों का दावा है कि शुरुआत से बरती गई खामियां अब भी दुरुस्त न कराई गईं तो 201 करोड़ की कॉरिडोर योजना का वरुणा के संरक्षण के लिहाज से कोई औचित्य नहीं रह जाएगा। नदी संरक्षण के मूल उद्देश्यों की ओर ध्यान न देने का ही खामियाजा है कि जिस मिट्टी पर एक रुपये खर्च नहीं होने थे, उसके लिए 21 करोड़ का भारीभरकम बजट तैयार कर दिया गया। सीवेज रोककर डेढ़ से दो मीटर की गहराई में ड्रेजिंग कराई गई होती तो इससे पर्याप्त मिट्टी निकलने के साथ ही नदी के भूगर्भ जलस्तर के पोर खुल जाते। न सिर्फ वरुणा को नवजीवन मिलता बल्कि यह कॉरिडोर अपने आप में एक मिसाल बन जाता।
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कॉरिडोर का मूल उद्देश्य वरुणा का पुनर्जीवन होना चाहिए। वरुणा बची रहेगी तो सुविधाएं कभी भी विकसित की जा सकती हैं। आज जरूरत वरुणा को बचाने की है। उसके प्राकृत स्वरूप को संरक्षित करने की है। इसके लिए जरूरी है कि सबसे पहले सीवेज रोका जाए। उसके बाद डूब क्षेत्र से अवैध निर्माण हटाकर नदी की एक से डेढ़ मीटर तक खुदाई की जाए।
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- प्रो. यूके चौधरी, बीएचयू के नदी वैज्ञानिक
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