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धर्म-दर्शन से आधुनिक ज्ञान-विज्ञान तक मंथन
Updated Sun, 31 Dec 2017 02:13 AM IST
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वाराणसी। केंद्रीय उच्च तिब्बती शिक्षा संस्थान के स्वर्ण जयंती समारोह में शनिवार को ‘भारतीय दार्शनिक प्रस्थानों एवं आधुनिक विज्ञान में मन की अवधारणा’ विषयक संगोष्ठी के पहले दिन मनुष्य की आंतरिक प्रवृत्तियां चर्चा के केंद्र में रहीं। धर्म-दर्शन की प्राचीनतम परंपराओं से आधुनिक ज्ञान-विज्ञान तक मंथन हुआ। मन और प्रकृति के रहस्यों पर विद्वानों ने अपनी राय रखी। निष्कर्ष यह रहा कि वैज्ञानिकों और धर्म-दर्शन के अध्येताओं को अब एक साथ मानव मन और प्रकृति की आंतरिक शक्तियों पर विचार करना होगा। इसके जो परिणाम सामने आएंगे मानवता के लिए बेहद कल्याणकारी होंगे।
सांख्य दर्शन की विशेषज्ञ मुंबई की प्रो. शुभदा जोशी ने कहा कि दूसरों के बारे में सोचना और उसके लिए जो धैर्य है, जो साधना है उसकी नींव सांख्य है और उसका प्रतिफल योग। सांख्य दर्शन के माध्यम से हम इच्छाओं को सीमित रख सकते हैं और अगर हम इसमें सफल हो जाएं और सभी के बारे में सोचें तो संसार स्वर्ग हो जाएगा। प्रो. सच्चिदानंद मिश्रा ने कहा कि क्वांटम थ्योरी के बाद विज्ञान ने भी मन के बारे में विचार बदले हैं। न्याय दर्शन मस्तिष्क, मन और यथार्थ को अलग-अलग मानता है। न्याय दर्शन को विज्ञान कोई तवज्जो नहीं देता है क्योंकि भौतिकवादी दर्शन के आधार पर ही विज्ञान काम करता है। रामकृष्ण मिशन विवेकानंद विश्वविद्यालय के कुलपति स्वामी आत्मप्रियानंद ने कहा कि जागृत मन से विश्व में बहुत सारे बदलाव किए जा सकते हैं। सबसे पहले हमको जागने की जरूरत है। परमपावन दलाई लामा के अलावा संस्थान के कुलपति प्रो. गेशे नवांग समतेन, जादवपुर विश्वविद्यालय की प्रो. रुपा बंदोपाध्याय, प्रो. भागचंद्र जैन ने भी विचार व्यक्त किए। प्रथम सत्र का संचालन कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय के प्रो. जेश केब्जन ने किया। दूसरे सत्र का संचालन भारतीय दार्शनिक अनुसंधान परिषद के अध्यक्ष प्रो. एसआर भट्ट ने किया।
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सांख्य दर्शन की विशेषज्ञ मुंबई की प्रो. शुभदा जोशी ने कहा कि दूसरों के बारे में सोचना और उसके लिए जो धैर्य है, जो साधना है उसकी नींव सांख्य है और उसका प्रतिफल योग। सांख्य दर्शन के माध्यम से हम इच्छाओं को सीमित रख सकते हैं और अगर हम इसमें सफल हो जाएं और सभी के बारे में सोचें तो संसार स्वर्ग हो जाएगा। प्रो. सच्चिदानंद मिश्रा ने कहा कि क्वांटम थ्योरी के बाद विज्ञान ने भी मन के बारे में विचार बदले हैं। न्याय दर्शन मस्तिष्क, मन और यथार्थ को अलग-अलग मानता है। न्याय दर्शन को विज्ञान कोई तवज्जो नहीं देता है क्योंकि भौतिकवादी दर्शन के आधार पर ही विज्ञान काम करता है। रामकृष्ण मिशन विवेकानंद विश्वविद्यालय के कुलपति स्वामी आत्मप्रियानंद ने कहा कि जागृत मन से विश्व में बहुत सारे बदलाव किए जा सकते हैं। सबसे पहले हमको जागने की जरूरत है। परमपावन दलाई लामा के अलावा संस्थान के कुलपति प्रो. गेशे नवांग समतेन, जादवपुर विश्वविद्यालय की प्रो. रुपा बंदोपाध्याय, प्रो. भागचंद्र जैन ने भी विचार व्यक्त किए। प्रथम सत्र का संचालन कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय के प्रो. जेश केब्जन ने किया। दूसरे सत्र का संचालन भारतीय दार्शनिक अनुसंधान परिषद के अध्यक्ष प्रो. एसआर भट्ट ने किया।
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