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चौखंडी स्तूप और लाल खां का रौजा में भी लगेगा प्रवेश शुल्क
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वाराणसी। जल्दी ही सारनाथ क्षेत्र में स्थित चौखंडी स्तूप और राजघाट स्थित मालवीय ब्रिज के पास लाल खां का रौजा देखने के लिए पैसे खर्च करने पड़ेंगे। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग (एएसआई) की ओर से जारी एक आदेश के बाद वाराणसी में पांच ऐसी जगहें होने जा रही हैं, जिन्हें देखने के लिए टिकट लेना पड़ेगा।
अब तक सारनाथ में संग्रहालय, धम्मेख स्तूप वाला उत्तखनित स्थल और मानमहल में वेधशाला देखने का ही शुल्क लगता है। भारतीयों से 25 रुपये और विदेशी नागरिकों से 300 रुपये लिए जाते हैं। चौखंडी स्तूप और राजघाट में लाल खां का रौजा लोग बिना शुल्क के ही देखते रहे हैं।
लाल खां का रौजा ऐतिहासिक है। लाल खां काशी नरेश परिवार के सेनापति थे। उनकी वीरता के मद्देनजर मकबरे का निर्माण 1773 के करीब काशी नरेश के परिवार ने कराया था। 1940 और 1960 में हुई खुदाई में पता चला कि छठवीं सदी में प्राचीन काशी इसी क्षेत्र में आबाद थी। यहां मिट्टी की मुहर मिली थीं, जिस पर वाराणसी लिखा था। दूसरी तरफ गुप्त काल में सम्राट अशोक द्वारा निर्मित चौखंडी बौद्ध स्तूप चारों ओर से अष्टभुजीय मीनारों से घिरा हुआ है। ठोस ईंटों से कुर्सी के रूप में बना यह स्तूप तीन मंजिल की तरह दिखता है, जो ठोस ईंटों से तैयार किया गया है। यहां विश्व भर से बौद्ध अनुयायी आते हैं।
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अब तक सारनाथ में संग्रहालय, धम्मेख स्तूप वाला उत्तखनित स्थल और मानमहल में वेधशाला देखने का ही शुल्क लगता है। भारतीयों से 25 रुपये और विदेशी नागरिकों से 300 रुपये लिए जाते हैं। चौखंडी स्तूप और राजघाट में लाल खां का रौजा लोग बिना शुल्क के ही देखते रहे हैं।
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लाल खां का रौजा ऐतिहासिक है। लाल खां काशी नरेश परिवार के सेनापति थे। उनकी वीरता के मद्देनजर मकबरे का निर्माण 1773 के करीब काशी नरेश के परिवार ने कराया था। 1940 और 1960 में हुई खुदाई में पता चला कि छठवीं सदी में प्राचीन काशी इसी क्षेत्र में आबाद थी। यहां मिट्टी की मुहर मिली थीं, जिस पर वाराणसी लिखा था। दूसरी तरफ गुप्त काल में सम्राट अशोक द्वारा निर्मित चौखंडी बौद्ध स्तूप चारों ओर से अष्टभुजीय मीनारों से घिरा हुआ है। ठोस ईंटों से कुर्सी के रूप में बना यह स्तूप तीन मंजिल की तरह दिखता है, जो ठोस ईंटों से तैयार किया गया है। यहां विश्व भर से बौद्ध अनुयायी आते हैं।
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