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कटान के मुहाने पर खड़ा है रफीपुर
Updated Sun, 04 Jun 2017 11:03 PM IST
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करंडा। क्षेत्र के गंगा किनारे के कई गांव वर्षों से कटान का दंश झेल रहे हैं। गंगा कटान का सबसे ज्यादा कहर पुरैना गांव पर बरपा है। गंगा इस गांव के सैकड़ों घरों के साथ ही शिवमंदिर को अपनी आगोश में ले चुकी है। कई कटान पीड़ित अभी भी खानाबदोश का जीवन व्यतीत कर रहे हैं। इस गांव में शासन द्वारा द्वारा बोल्डर पिचिंग कर कटान रोक दिया गया है लेकिन रफीपुर, बड़हरिया और बयेपुर गांव कटान के मुहाने पर खड़ा है। बारिश के मौसम गंगा के जलस्तर में वृद्धि होने के बाद कटान शुरू होने पर कई लोगों के आशियाने गंगा में समाहित हो सकते हैं। इसको लेकर कटान पीड़ित सहमे हुए हैं। कई बार ग्रामीणों की तरफ से धरना-प्रदर्शन करने के बाद भी प्रशासन की ओर से कटान को रोकने का इंतजाम नहीं किया जा रहा है।
पुरैना के लोग कई दशक से कटान का दंश झेल रहे थे। कटान की वजह से सैकड़ों घरों के साथ ही शिव मंदिर गंगा में समाहित हो गया। इसके अलावा सैकड़ों एकड़ कृषि योग्य भूमि भी कटान की भेंट चढ़ गई है। कई कटान पीड़ित अभी भी खानाबदोश की जिंदगी जी रहे हैं। भारी तबाही के बाद प्रशासन ने कटान की सुधि लेते हुए बोल्डर पिचिंग का कार्य कराकर यहां के कटान को रोक दिया। अब रफीपुर, बड़हरिया, बयेपुर तथा सोकनी गांव कटान के मुहाने पर खड़े हैं। इन गांव में पिछले चार वर्षों से कटान का क्रम बना हुआ है। सैकड़ों एकड़ भूमि कटकर गंगा में समाहित हो चुकी है। बारिश का मौसम आने वाला है। इसको लेकर कटान पीड़ितों की चिंता इस बात से बढ़ गई है कि बारिश होने पर गंगा के जलस्तर में वृद्धि होने के साथ ही कटान का कहर भी शुरू हो जाएगा। ऐसे में उनके आशियानों के साथ ही कृषि योग्य भूमि कटान की भेंट चढ़ जाएगी। अगर कटान हुआ तो इन तीनों गांव के करीब 70 मकान कटान की जद में आ सकते हैं। कटान को रोकने के लिए कटान पीड़ितों ने कई बार धरना-प्रदर्शन किया। बावजूद इसके शासन-प्रशासन की तरफ से इन गांवों को कटान से बचाने के लिए अभी तक कोई उपाय नहीं किया गया है। इससे कटान पीड़ितों में निराशा है।
बयेपुर, रफीपुर गांव में हो रहे कटान के लिए प्रस्ताव बनाकर शासन से स्वीकृत करा लिया गया है। धन मिलते ही बोल्डर और पार्कों पाइन के जरिए कटान को रोकने का कार्य शुरु करा दिया जाएगा। दिनेश सिंह, अधिशासी अभियंता देवकली प्रखंड
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कटान से बेघर हो चुके हैं कई गांव के लोग
करंडा। कटान प्रभावित गंगा के तटवर्ती 9 गांवों में से 4 गांव पूरी तरह समाप्त हो गए हैं। अब ये गांव मात्र कागज पर ही रह गए हैं। करंडा के सबसे बड़े गांव में शुमार नूरनपुर (रकबा लगभग 4000 बीघा) पूरी तरह नष्ट हो गया। लगभग 95 प्रतिशत लोग अन्यत्र चले गए। यही हाल कशेरा का भी है लगभग 300 बीघा का रकबा समाप्त हो गया और 60 प्रतिशत लोग दूसरी जगह जाकर बस गए। सिधारीपुर रकबा 700 बीघा पूरी तरह समाप्त हो गया। पांच-सात घरों को छोड़कर बाकी लोग दूसरे क्षेत्रों में जाकर बस गए हैं। बड़हरिया रकबा 320 बीघा पूरी तरह समाप्त हो गया है। अब यहां के लोग सोकनी मौजा में ही बड़हरिया के नाम से बसे हैं। सोकनी में भी भयानक कटान से बड़हरिया वासी विस्थापित होने लगे हैं।
गंगा में समा चुकी है सैकड़ों बीघा भूमि
करंडा। बयेपुर रकबा 600 बीघा में से 450 बीघा, पुरैना 2400 बीघा में से 2200 बीघा, शेरपुर तुलसीपुर 900 बीघा में से 600 बीघा, सोकनी 600 बीघा में से 100 बीघा एवं रफीपुर में लगभग 150 बीघा में से 85 बीघा भूमि कटान की वजह से गंगा में समाहित हो चुकी है।
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पुरैना के लोग कई दशक से कटान का दंश झेल रहे थे। कटान की वजह से सैकड़ों घरों के साथ ही शिव मंदिर गंगा में समाहित हो गया। इसके अलावा सैकड़ों एकड़ कृषि योग्य भूमि भी कटान की भेंट चढ़ गई है। कई कटान पीड़ित अभी भी खानाबदोश की जिंदगी जी रहे हैं। भारी तबाही के बाद प्रशासन ने कटान की सुधि लेते हुए बोल्डर पिचिंग का कार्य कराकर यहां के कटान को रोक दिया। अब रफीपुर, बड़हरिया, बयेपुर तथा सोकनी गांव कटान के मुहाने पर खड़े हैं। इन गांव में पिछले चार वर्षों से कटान का क्रम बना हुआ है। सैकड़ों एकड़ भूमि कटकर गंगा में समाहित हो चुकी है। बारिश का मौसम आने वाला है। इसको लेकर कटान पीड़ितों की चिंता इस बात से बढ़ गई है कि बारिश होने पर गंगा के जलस्तर में वृद्धि होने के साथ ही कटान का कहर भी शुरू हो जाएगा। ऐसे में उनके आशियानों के साथ ही कृषि योग्य भूमि कटान की भेंट चढ़ जाएगी। अगर कटान हुआ तो इन तीनों गांव के करीब 70 मकान कटान की जद में आ सकते हैं। कटान को रोकने के लिए कटान पीड़ितों ने कई बार धरना-प्रदर्शन किया। बावजूद इसके शासन-प्रशासन की तरफ से इन गांवों को कटान से बचाने के लिए अभी तक कोई उपाय नहीं किया गया है। इससे कटान पीड़ितों में निराशा है।
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बयेपुर, रफीपुर गांव में हो रहे कटान के लिए प्रस्ताव बनाकर शासन से स्वीकृत करा लिया गया है। धन मिलते ही बोल्डर और पार्कों पाइन के जरिए कटान को रोकने का कार्य शुरु करा दिया जाएगा। दिनेश सिंह, अधिशासी अभियंता देवकली प्रखंड
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कटान से बेघर हो चुके हैं कई गांव के लोग
करंडा। कटान प्रभावित गंगा के तटवर्ती 9 गांवों में से 4 गांव पूरी तरह समाप्त हो गए हैं। अब ये गांव मात्र कागज पर ही रह गए हैं। करंडा के सबसे बड़े गांव में शुमार नूरनपुर (रकबा लगभग 4000 बीघा) पूरी तरह नष्ट हो गया। लगभग 95 प्रतिशत लोग अन्यत्र चले गए। यही हाल कशेरा का भी है लगभग 300 बीघा का रकबा समाप्त हो गया और 60 प्रतिशत लोग दूसरी जगह जाकर बस गए। सिधारीपुर रकबा 700 बीघा पूरी तरह समाप्त हो गया। पांच-सात घरों को छोड़कर बाकी लोग दूसरे क्षेत्रों में जाकर बस गए हैं। बड़हरिया रकबा 320 बीघा पूरी तरह समाप्त हो गया है। अब यहां के लोग सोकनी मौजा में ही बड़हरिया के नाम से बसे हैं। सोकनी में भी भयानक कटान से बड़हरिया वासी विस्थापित होने लगे हैं।
गंगा में समा चुकी है सैकड़ों बीघा भूमि
करंडा। बयेपुर रकबा 600 बीघा में से 450 बीघा, पुरैना 2400 बीघा में से 2200 बीघा, शेरपुर तुलसीपुर 900 बीघा में से 600 बीघा, सोकनी 600 बीघा में से 100 बीघा एवं रफीपुर में लगभग 150 बीघा में से 85 बीघा भूमि कटान की वजह से गंगा में समाहित हो चुकी है।