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गंगा तटों- कुंडों से घर-आंगन तक सुहाग के लिए आराधना
Updated Fri, 25 Aug 2017 02:11 AM IST
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वाराणसी। अखंड सुहाग, पतियों के लिए दीर्घायु कामना से जहां विवाहिताओं ने व्रत रखा, वहीं कुंवारी कन्याओं ने मनोवांछित वर की प्राप्ति के लिए शिव-पार्वती की आराधना की। हरतालिका तीज पर गुरुवार को काशी में घरों से लेकर घाटों तक आस्था का उत्सवी माहौल देखते बना। मंदिरों पर समूहबद्ध महिलाओं ने पूजा के बाद जहां शिव-पार्वती के भजन और मंगल गान किए, वहीं घाटों पर आरती और अर्घ्य का सिलसिला चला। घरों में तरह-तरह केपकवानों का भोग शिव-पार्वती को अर्पित किया गया।
मान्यता के अनुसार महिलाओं ने भोर में ही मौन स्नान कर तीज व्रत धारण किया। स्नान के बाद गंगा तटों पर मिट्टी से बनी शिव-पार्वती की प्रतिमाओं को केले के मंडप में प्रतिष्ठापित तक षोडशोपचार विधि से पूजा की गई। हल्दी, चंदन,रोली, नैवेद्य अर्पित कर मंत्रोच्चार के साथ भगवान शिव को प्रसन्न किया गया। घरों में आंगन और छतों पर महिलाओं के समूह उमड़े। सोलह शृंगार कर घरों से गीत गाते निकली महिलाओं ने शिव मंदिरों मेंअभिषेक, पूजा किया। संकल्पों के अनुसार कुछ व्रती महिलाओं ने रजत और स्वर्ण प्रतिमाओं की प्रतिष्ठापना की। दशाश्वमेध घाट, अस्सी घाट के अलावा कुंडों पर भी भीड़ लगी रही। व्रतियों ने शाम को भी आरती और अर्घ्य दिया। निर्जला व्रत रखने वाली महिलाओं ने ही घरों में तरह-तरह के पकवान बनाकर शिव-पार्वती को भोग अर्पित किया। इसके साथ ही अखंड सुहाग की कामना की गई। काशी समेत पूर्वांचल में सनातनी परंपरा का महिलाओं का यह लोकप्रिय व्रत है। बाबा काशी विश्वनाथ के अलावा बीएचयू के विश्वनाथ मंदिर, महामृत्युंज मंदिर, गौरी-केदारेश्वर मंदिर, तिलभांडेश्वर मंदिर, डीरेका परिसर के शिव मंदिर के अलावा गौतमेश्वर महादेव, अहिलेश्वर महादेव, गभस्तीश्वर महादेव, त्रिपुरांतकेश्वर महादेव, घृष्णेश्वर महादेव मंदिरों में व्रती महिलाओं का दर्शन-पूजन के लिए तांता लगा रहा।
पार्वती ने भगवान शिव को प्राप्त करने के लिए रखा था हरतालिका तीज व्रत
पौराणिक मान्यता के अनुसार हरतालिका तीज व्रत सबसे पहले गिरिराज हिमालय की पुत्री उमा यानी पार्वती ने किया था। इसी व्रत के सौभाग्य फल से भगवान शंकर उन्हें पति के रूप में प्राप्त हुए थे। हरितालिका तीज व्रत की कथा के अनुसार जब दक्ष कन्या सती पिता के यज्ञ में अपने पति भगवान शिव की उपेक्षा होने पर भी पहुंच गई थीं, तब उन्हें वहां तिरस्कार सहना पड़ा था। पिता के यहां पति का अपमान देखकर वह इतनी क्षुब्ध हुईं कि उन्होंने अपने आप को योगाग्नि में भस्म कर दिया। दूसरे जन्म में वही आदिशक्ति ही मैना और हिमाचल की तपस्या से प्रसन्न होकर उनके यहां पुत्री के रूप में प्रकट हुईं। और उनका नाम पार्वती रखा गया। इस जन्म में भी पार्वती भगवान शंकर के ध्यान में ही मग्न रहती थीं।
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मान्यता के अनुसार महिलाओं ने भोर में ही मौन स्नान कर तीज व्रत धारण किया। स्नान के बाद गंगा तटों पर मिट्टी से बनी शिव-पार्वती की प्रतिमाओं को केले के मंडप में प्रतिष्ठापित तक षोडशोपचार विधि से पूजा की गई। हल्दी, चंदन,रोली, नैवेद्य अर्पित कर मंत्रोच्चार के साथ भगवान शिव को प्रसन्न किया गया। घरों में आंगन और छतों पर महिलाओं के समूह उमड़े। सोलह शृंगार कर घरों से गीत गाते निकली महिलाओं ने शिव मंदिरों मेंअभिषेक, पूजा किया। संकल्पों के अनुसार कुछ व्रती महिलाओं ने रजत और स्वर्ण प्रतिमाओं की प्रतिष्ठापना की। दशाश्वमेध घाट, अस्सी घाट के अलावा कुंडों पर भी भीड़ लगी रही। व्रतियों ने शाम को भी आरती और अर्घ्य दिया। निर्जला व्रत रखने वाली महिलाओं ने ही घरों में तरह-तरह के पकवान बनाकर शिव-पार्वती को भोग अर्पित किया। इसके साथ ही अखंड सुहाग की कामना की गई। काशी समेत पूर्वांचल में सनातनी परंपरा का महिलाओं का यह लोकप्रिय व्रत है। बाबा काशी विश्वनाथ के अलावा बीएचयू के विश्वनाथ मंदिर, महामृत्युंज मंदिर, गौरी-केदारेश्वर मंदिर, तिलभांडेश्वर मंदिर, डीरेका परिसर के शिव मंदिर के अलावा गौतमेश्वर महादेव, अहिलेश्वर महादेव, गभस्तीश्वर महादेव, त्रिपुरांतकेश्वर महादेव, घृष्णेश्वर महादेव मंदिरों में व्रती महिलाओं का दर्शन-पूजन के लिए तांता लगा रहा।
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पार्वती ने भगवान शिव को प्राप्त करने के लिए रखा था हरतालिका तीज व्रत
पौराणिक मान्यता के अनुसार हरतालिका तीज व्रत सबसे पहले गिरिराज हिमालय की पुत्री उमा यानी पार्वती ने किया था। इसी व्रत के सौभाग्य फल से भगवान शंकर उन्हें पति के रूप में प्राप्त हुए थे। हरितालिका तीज व्रत की कथा के अनुसार जब दक्ष कन्या सती पिता के यज्ञ में अपने पति भगवान शिव की उपेक्षा होने पर भी पहुंच गई थीं, तब उन्हें वहां तिरस्कार सहना पड़ा था। पिता के यहां पति का अपमान देखकर वह इतनी क्षुब्ध हुईं कि उन्होंने अपने आप को योगाग्नि में भस्म कर दिया। दूसरे जन्म में वही आदिशक्ति ही मैना और हिमाचल की तपस्या से प्रसन्न होकर उनके यहां पुत्री के रूप में प्रकट हुईं। और उनका नाम पार्वती रखा गया। इस जन्म में भी पार्वती भगवान शंकर के ध्यान में ही मग्न रहती थीं।
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