फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Uttar Pradesh ›   Varanasi News ›   अब कहां वो होली और ठिठोली

अब कहां वो होली और ठिठोली

Wed, 13 Mar 2019 02:22 AM IST
Varanasi Bureau वाराणसी ब्यूरो
Updated Wed, 13 Mar 2019 02:22 AM IST
विज्ञापन
अब कहां वो होली और ठिठोली
वाराणसी। कभी काशी की होली अपना अलग ही अंदाज रखती थी। होली की ठिठोली और इसके रंग यहां के लोगों पर महीने-दो महीने पहले ही चढ़ जाया करते थे। ज्यों-ज्यों होली नजदीक आती हुड़दंग का रंग और चटख होता जाता। कहीं फागुन के गीत गूंजते तो कहीं रचनाकारों की होलियाना कविताएं लोगों का मनोरंजन करतीं। अस्सी और दशाश्वमेध स्थित डेढ़सी के पुल पर होने वाले कवि सम्मेलन तो पूरे शहर का मिजाज ही होलियाना कर देते थे। मगर अब सब कुछ बदल सा गया है। मंगलवार को हमने पिछले चार-पांच दशक में होली के मिजाज और उल्लास में आए बदलावों को समझने के लिए शहर के कुछ साहित्यकारों से बात की तो उन्होंने कुछ इस तरह से अपने अनुभव साझा किए...।
विज्ञापन

अब होलियाना अंदाज गायब हो रहा
साहित्यकार श्रीप्रकाश शुक्ल बताते हैं कि होली बसंत का राग है और मिलन का उत्सव है। जहां लोग पहले बांस की पिचकारियों से एक-दूसरों को रंगों में सराबोर करते थे। घरों में ठंडई और भाग खिलाई-पिलाई जाती थी। गंगा के घाटों पर कवियों की टोलियां अपनी महफिल सजाती थीं। मगर अब यहां का होलियाना अंदाज धीरे-धीरे गायब हो चला है। होली अब हाई-टेक होकर निशप्राण हो गई है, जो चिंता का विषय है।
विज्ञापन


यथार्थ जीवन से भी होली के रंग गायब
साहित्यकार डॉ. शशिकला त्रिपाठी की माने तो अब जो बदलाव से बिखराव आ गया, वह केवल रंग ही नहीं ले गया, तन-मन की उमंग, आपसी संबंध और भाईचारा भी छीन ले गया। होली का रंग अब हमारे यथार्थ जीवन से भी लुप्त होता जा रहा है। पहले होली के हफ्ते भर पहले कपड़े खरीदने की तैयारी के साथ महिलाएं अपने घर के आंगन और छतों पर पापड़, चिप्स बनाने में जुट जाती थीं। आज लोगों का रंगों के प्रति आकर्षण भी लुप्त हो गया है।
विज्ञापन
विज्ञापन

- मन के उल्लास और उमंग से जुड़ा था होलीकोत्सव-
डॉ. कुमार पंकज का मानना है कि आज लोक परंपरा का उल्लंघन हो रहा है। प्रेम ओर माधुर्य की जगह हुड़दंग ने ले लिया है। आज हर पर्व के साथ दिखावा और औपचारिकताएं जुड़ गई हैं। होली शुरू होने से पहले घर की औरतें इकट्टा होकर गीत, संगीत और नृत्य का कार्यक्रम किया करती थीं। घरों में टेसू के फूलों से प्रकृतिक रंग बनाया जाता था। हांसी ठिठोली हुआ करती थी। गालियां भी ऐसी जिसे सुनकर हंसी आती थी। चौक-चौराहे पर कवि सम्मेलन हुआ करते थे। पहले जहां दिन में लोग एक-दूसरे के साथ रंग खलते थे तो शाम को इत्र लगाकर होली की बधाई देते थे। अब खतरनाक रसायनिक रंगों का डर रहता है। होली में मेल-मिलाप का रंग नदारद है।
विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News App, iOS Hindi News App और Amarujala Hindi News APP अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed