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तीन तलाक पर फैसले का तहे दिल से स्वागत
Updated Wed, 23 Aug 2017 01:43 AM IST
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वाराणसी। तीन तलाक पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले को मुस्लिम महिलाओं ने खुले दिल से सराहा है। उनका कहना है कि तलाक का दंश झेल रही महिलाओं को अब जाकर न्याय मिला है। हालांकि उनका ये भी कहना है कि ये मुद्दा शरई है, इस लिहाज से इस पर फैसला मजहब के उलेमा को लेना चाहिए था। उनका कहना है कि एक बार में तीन तलाक का जिक्र कुरान में भी नहीं है लेकिन इसका इस्तेमाल गलत तरीके से हो रहा है। सुप्रीम कोर्ट के फैसले का दिल से इस्तकबाल होना चाहिए। हालांकि कुछ महिलाओं की राय इससे जुदा भी है। उनका कहना है कि मुसलमानों का कानून कुरान व हदीस की रौशनी में चलता है। इस मामले में किसी का भी हस्तक्षेप नहीं होना चाहिए।
तीन तलाक ने बढ़ा दीं जिंदगी की दुश्वारियां
वाराणसी। 16 बरस की उम्र में शादी और दो साल बाद 18 साल की उम्र में तलाक हो गया। लल्लापुरा की शाहिदा परवीन की जिंदगी इसके बाद एक अजाब बनकर ही रह गई थी। ससुराल में मिलने वाली दुश्वारियों के बावजूद वो अपनी शादी को बचाना चाहती थी लेकिन शौहर राजी नहीं हुआ और उसने उसे तीन तलाक दे दिया।
एक औलाद के साथ जिंदगी काटनी आसान तो नहीं थी लेकिन शाहिदा ने खुद को मजबूत बनाया। जब उसकी शादी हुई थी तब वो सिर्फ आठवीं पास थी। मायके से उसने फिर से अपनी पढ़ाई शुरू की। पहले हाईस्कूल फिर इंटरमीडिएट और उसके बाद ग्रेजुएशन। इसी दौरान उन्होंने खर्च चलाने के लिए टीचिंग भी शुरू कर दी। इसके बाद एमए किया और बीएड भी। कुछ दिन पहले तक वे प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना से जुड़कर एक प्रोजेक्ट पर काम कर रही थीं। उन्होंने अपने बेटे को पढ़ा लिखाकर उसे पैरों पर खड़ा किया। आईटीआई करके आज वो नौकरी कर रहा है।
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इसी तरह साकेत नगर की शहजादी भी दस साल से तलाक का दंश झेल रही हैं। 12 साल पहले उनकी शादी यहां हुई थी। एक दिन किसी बात पर शौहर से बहस हुई और उन्होंने उसका जवाब दे दिया। शौहर को ये बात इतनी नागवार गुजरी की कि उन्हें घर से निकाल दिया। शौहर जब उसे रखने को राजी नहीं हुआ तो वे कोर्ट चली गईं। बाद में थक-हार कर उन्होंने कोर्ट-कचहरी के चक्कर लगाने भी छोड़ दिए। दो बेटियां थीं, उन्हें पालने-पोसने के लिए उन्होंने घर-घर जाकर काम किया। बेटियां आज अच्छे स्कूल में पढ़ रही हैं। उनका कहना है कि तलाक ने उनकी जिंदगी बरबाद करके रख दी।
शाहिदा का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट का ये फैसला काबिल-ए-तारीफ है लेकिन चूंकि ये मसला पूरी तरह से मजहबी है, इसलिए ऐसे मामलेे में हमारे उलेमा को आगे आना चाहिए था। ये हमारी कमजोरी थी कि ये मुद्दा सड़क पर आया और आज कोर्ट इस पर फैसला ले रही है।
उलेमा का बयान
इस मामले में कुछ भी बोलना माकूल नहीं है। इस मुद्दे को पर मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के साथ हमारी मीटिंग होने जा रही है। मिल बैठकर इस मामले पर चर्चा की जाएगी। मजहबी मामलों में कोई भी फैसला शरई लिहाज से ही किया जाना चाहिए। - मौलाना बातिन नोमानी, मुफ्ती-ए-शहर
हम कुरान और हदीस को ही मानते हैं, कुरान और हदीस की रौशनी में बने शरई कानून को ही मानते हैं। शरई कानून से बढ़कर हमारे लिए कोई कानून नहीं। हुकूमतें आती हैं और जाती हैं, हमारा कानून न बदला है और ना ही बदलेगा। - मौलाना गुलाम यासीन, काजी-ए-शहर
ये हिंदुस्तान का संविधान है कि कोई भी मजहबी मामले में कोई दखल नहीं दे सकता। जो कानून हमारे नबी-ए-करीम (स.) ने बनाया है उस पर कोई सरकार या कोर्ट सुनवाई करे, ये अपने आप में हिंदुस्तान के कानून के खिलाफ है। मजहब के कानून पर फैसला मजहब के एक्सपर्ट को लेना चाहिए।
- मौलाना हसीन अहमद, इमाम, मुगलिया मस्जिद, बादशाहबाग
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तीन तलाक ने बढ़ा दीं जिंदगी की दुश्वारियां
वाराणसी। 16 बरस की उम्र में शादी और दो साल बाद 18 साल की उम्र में तलाक हो गया। लल्लापुरा की शाहिदा परवीन की जिंदगी इसके बाद एक अजाब बनकर ही रह गई थी। ससुराल में मिलने वाली दुश्वारियों के बावजूद वो अपनी शादी को बचाना चाहती थी लेकिन शौहर राजी नहीं हुआ और उसने उसे तीन तलाक दे दिया।
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एक औलाद के साथ जिंदगी काटनी आसान तो नहीं थी लेकिन शाहिदा ने खुद को मजबूत बनाया। जब उसकी शादी हुई थी तब वो सिर्फ आठवीं पास थी। मायके से उसने फिर से अपनी पढ़ाई शुरू की। पहले हाईस्कूल फिर इंटरमीडिएट और उसके बाद ग्रेजुएशन। इसी दौरान उन्होंने खर्च चलाने के लिए टीचिंग भी शुरू कर दी। इसके बाद एमए किया और बीएड भी। कुछ दिन पहले तक वे प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना से जुड़कर एक प्रोजेक्ट पर काम कर रही थीं। उन्होंने अपने बेटे को पढ़ा लिखाकर उसे पैरों पर खड़ा किया। आईटीआई करके आज वो नौकरी कर रहा है।
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इसी तरह साकेत नगर की शहजादी भी दस साल से तलाक का दंश झेल रही हैं। 12 साल पहले उनकी शादी यहां हुई थी। एक दिन किसी बात पर शौहर से बहस हुई और उन्होंने उसका जवाब दे दिया। शौहर को ये बात इतनी नागवार गुजरी की कि उन्हें घर से निकाल दिया। शौहर जब उसे रखने को राजी नहीं हुआ तो वे कोर्ट चली गईं। बाद में थक-हार कर उन्होंने कोर्ट-कचहरी के चक्कर लगाने भी छोड़ दिए। दो बेटियां थीं, उन्हें पालने-पोसने के लिए उन्होंने घर-घर जाकर काम किया। बेटियां आज अच्छे स्कूल में पढ़ रही हैं। उनका कहना है कि तलाक ने उनकी जिंदगी बरबाद करके रख दी।
शाहिदा का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट का ये फैसला काबिल-ए-तारीफ है लेकिन चूंकि ये मसला पूरी तरह से मजहबी है, इसलिए ऐसे मामलेे में हमारे उलेमा को आगे आना चाहिए था। ये हमारी कमजोरी थी कि ये मुद्दा सड़क पर आया और आज कोर्ट इस पर फैसला ले रही है।
उलेमा का बयान
इस मामले में कुछ भी बोलना माकूल नहीं है। इस मुद्दे को पर मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के साथ हमारी मीटिंग होने जा रही है। मिल बैठकर इस मामले पर चर्चा की जाएगी। मजहबी मामलों में कोई भी फैसला शरई लिहाज से ही किया जाना चाहिए। - मौलाना बातिन नोमानी, मुफ्ती-ए-शहर
हम कुरान और हदीस को ही मानते हैं, कुरान और हदीस की रौशनी में बने शरई कानून को ही मानते हैं। शरई कानून से बढ़कर हमारे लिए कोई कानून नहीं। हुकूमतें आती हैं और जाती हैं, हमारा कानून न बदला है और ना ही बदलेगा। - मौलाना गुलाम यासीन, काजी-ए-शहर
ये हिंदुस्तान का संविधान है कि कोई भी मजहबी मामले में कोई दखल नहीं दे सकता। जो कानून हमारे नबी-ए-करीम (स.) ने बनाया है उस पर कोई सरकार या कोर्ट सुनवाई करे, ये अपने आप में हिंदुस्तान के कानून के खिलाफ है। मजहब के कानून पर फैसला मजहब के एक्सपर्ट को लेना चाहिए।
- मौलाना हसीन अहमद, इमाम, मुगलिया मस्जिद, बादशाहबाग