फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Uttar Pradesh ›   Varanasi News ›   एक दिन फुर्र से उड़ जाऊंगी तब समझोगे

एक दिन फुर्र से उड़ जाऊंगी तब समझोगे

Tue, 19 Mar 2019 01:59 AM IST
Varanasi Bureau वाराणसी ब्यूरो
Updated Tue, 19 Mar 2019 01:59 AM IST
विज्ञापन
एक दिन फुर्र से उड़ जाऊंगी तब समझोगे
वाराणसी। अप्पा जी जब भी रियाज करती थीं तो वह अपने शिष्यों से कहती थीं कि एक दिन फुर्र से उड़ जाऊंगी तब समझोगे। ठीक से रियाज करो। जब वह गाने बैठती थीं तो कहती थीं कि मैं खुद से नहीं गाती हूं कोई है जो मुझसे गवाता है। संगीत के साथ भक्ति और आस्था का अद्भुत दर्शन होते थे। संगीत ही उनके लिए धर्म था, संगीत ही पूजा। अनुशासन बहुत था मां के जीवन में। बहुत सख्त मां थीं, समर्पित शिष्या और गुणी गुरु। उनके हर काम में बहुत परफेक्शन था। यह कहना है ठुमरी साम्राज्ञी पद्म विभूषण गिरिजा देवी की इकलौती बेटी डॉ. सुधा दत्ता की। जिन्हें अप्पा जी प्यार से मुन्नी बुलाती थीं।
विज्ञापन

संजय नगर कॉलोनी स्थित अप्पाजी के आवास पर बातचीत के दौरान डॉ. दत्ता ने बताया कि मां काशी में संगीत के लिए बहुत कुछ करना चाहती थीं। उनकी यह इच्छा अधूरी रह गई। उनको पुरस्कारों की कभी आकांक्षा नहीं रही। वह तो काशी में संगीत का आश्रम खोलना चाहती थीं। गुरु शिष्य परंपरा के तहत उनको जो भी मिला था वह अपने शिष्यों को देना चाहती थीं। उन्होंने दिल खोलकर सीखा और अपने शिष्यों को वही सिखाया भी। 24 अक्तूबर को जब उन्होंने अपनी अंतिम सांस ली उसके एक दिन पहले 23 को वह शिष्यों को सीखा रही थीं। लगातार डेढ़ घंटा वह गाती ही रह गईं। जब मैंने कहा कि मां आप इतनी देर से गा रही हो तो उन्होेंने कहा कि 26 को जयपुर जाना है ना उसी की तैयारी भी कर रही हूं।
विज्ञापन

वह कहती थीं कि जिस दिन गाना खत्म हो जाएगा उस दिन मैं नहीं रहूंगी। जैसे गंगा कोलकाता में सागर से मिलती हैं उसी तरह मां अपने संगीत को लेकर गंगासागर में समां गईं। डॉ. दत्ता ने कहा कि जब वह छोटी थीं तो मुझे मां का संगीत के प्रति यह समर्पण अच्छा नहीं लगता था। ऐसा नहीं था कि संगीत के कारण उन्होंने हम लोगों पर ध्यान नहीं दिया। वह पहले अपनी जिम्मेदारियों को पूरा करती थीं उसके बाद संगीत था। वह अपने शिष्यों को भी यही सिखाती थीं कि पहले अपनी जिम्मेदारियों और संबंधों पर ध्यान दें उसके बाद संगीत का रियाज करें। वह दोस्त भी थीं और गुरु भी।
विज्ञापन
विज्ञापन

डॉ. सुधा ने बताया कि जब मां को पद्म विभूषण मिला तो बधाई देने वालों का तांता लगा था। सुबह से ही लगातार फोन आ रहे थे। हम सभी खाना खाने बैठे थे इसी दौरान फोन की घंटी बजी। मैंने फोन उठाया तो उधर से बहुत पतली सी आवाज आई कि क्या मैं गिरिजा देवी जी से बात कर सकती हूं। मैंने कहा कि मां तो अभी खाली नहीं हैं। आप बताएं आपको क्या काम है। जवाब आया कि उन्हें बधाई देनी थी। मैने कहा कि आप अपना नाम बता दिजिए मैं मां को बता दूंगी। उन्होंने जब कहा कि मैं लता मंगेशकर बोल रही हूं तो मैं तो चकित रह गई। मैंने कहा लता ताई मैं अभी आपकी मां से बात कराती हूं।

पद्मविभूषण गिरिजा देवी की बेटी होने के सवाल पर डॉ. दत्ता का कहना है कि शायद मैंने पूर्वजन्म में बहुत अच्छे कर्म किए होंगे जो मुझे उनकी बेटी होने का सौभाग्य मिला। ठुमरी साम्राज्ञी की बेटी होने के बाद भी मैंने कभी गाना नहीं सीखा। मुझे लगता था कि संगीत दूर कर देता है। पं. केलू चरण महाराज से मैंने नृत्य की शिक्षा ली है और वह भी केवल कोरियोग्राफी के लिए।
विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News App, iOS Hindi News App और Amarujala Hindi News APP अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed