{"_id":"5c6b12b2bdec22738633267f","slug":"121550521010-varanasi-news","type":"story","status":"publish","title_hn":"नहीं रहे पद्मश्री प्रो. राम शंकर त्रिपाठी","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
नहीं रहे पद्मश्री प्रो. राम शंकर त्रिपाठी
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
सारनाथ। पद्म श्री से सम्मानित और संस्कृत विश्वविद्यालय के बौद्घ दर्शन विभाग के पूर्व विभागाध्यक्ष प्रो. रामाशंकर त्रिपाठी का सोमवार की शाम को 90 वर्ष की आयु में कार्डियक अरेस्ट के कारण निधन हो गया। उन्हें एक निजी अस्पताल में भर्ती कराया गया था जहां उन्होंने अंतिम सांस ली।
परिजनों ने बताया कि प्रोफेसर का स्वास्थ्य पिछले दो दिन से खराब था। जिसके चलते उनको एक निजी अस्पताल में भर्ती कराया गया था। वो बौद्ध दर्शन व पाली भाषा के प्रख्यात विद्वान थे। उनको पूर्व राष्ट्रपति शंकर दयाल शर्मा और प्रतिभा देवी सिंह पाटिल भी सम्मानित कर चुकी थीं। उन्हें 2009 में पद्मश्री से सम्मानित किया गया था।
वे दर्जन भर से अधिक साहित्य लिख चुके थे। जिनमें मुख्यत: बौद्ध दर्शन प्रस्थान:, गुरु यमन्तभन्द मुखागम, आत्मयोजनासंहिता आदि ग्रंथ संस्कृत और पाली भाषा में लिखे हुए हैं। इसके अलावा वे केंद्रीय तिब्बती संस्थान के संस्थापक सदस्य भी रहे। उन्होंने बौद्घ धर्म दर्शन के प्रचार-प्रसार के लिए सिक्कम और लेह लद्दाख तक की यात्राएं की। उनकी मृत्यु पर संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय के पाली व संस्कृत विभाग के विभागाध्यक्ष प्रो. रमेश प्रसाद ने शोक व्यक्त करते हुए कहा कि प्रो. राम शंकर के जाने से बौद्ध धर्म दर्शन की अपूरणीय क्षति हुई है।
विज्ञापन
राजकीय सम्मान के साथ अंतिम संस्कार
संस्कृत विश्वविद्यालय में अध्यापन के बाद वह केंद्रीय तिब्बती उच्च शिक्षा संस्थान को सेवाएं दे रहे थे। उनके निधन के बाद सोमवार की शाम कुलपति प्रो. गेसे नवांग समतेन सहित कई प्रोफेसर सारनाथ स्थित आवास पर श्रद्धांजलि देने पहुंचे थे। उनका अंतिम संस्कार मणिकर्णिका घाट पर पूरे राजकीय सम्मान के साथ किया गया।
विज्ञापन
परिजनों ने बताया कि प्रोफेसर का स्वास्थ्य पिछले दो दिन से खराब था। जिसके चलते उनको एक निजी अस्पताल में भर्ती कराया गया था। वो बौद्ध दर्शन व पाली भाषा के प्रख्यात विद्वान थे। उनको पूर्व राष्ट्रपति शंकर दयाल शर्मा और प्रतिभा देवी सिंह पाटिल भी सम्मानित कर चुकी थीं। उन्हें 2009 में पद्मश्री से सम्मानित किया गया था।
विज्ञापन
वे दर्जन भर से अधिक साहित्य लिख चुके थे। जिनमें मुख्यत: बौद्ध दर्शन प्रस्थान:, गुरु यमन्तभन्द मुखागम, आत्मयोजनासंहिता आदि ग्रंथ संस्कृत और पाली भाषा में लिखे हुए हैं। इसके अलावा वे केंद्रीय तिब्बती संस्थान के संस्थापक सदस्य भी रहे। उन्होंने बौद्घ धर्म दर्शन के प्रचार-प्रसार के लिए सिक्कम और लेह लद्दाख तक की यात्राएं की। उनकी मृत्यु पर संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय के पाली व संस्कृत विभाग के विभागाध्यक्ष प्रो. रमेश प्रसाद ने शोक व्यक्त करते हुए कहा कि प्रो. राम शंकर के जाने से बौद्ध धर्म दर्शन की अपूरणीय क्षति हुई है।
विज्ञापन
राजकीय सम्मान के साथ अंतिम संस्कार
संस्कृत विश्वविद्यालय में अध्यापन के बाद वह केंद्रीय तिब्बती उच्च शिक्षा संस्थान को सेवाएं दे रहे थे। उनके निधन के बाद सोमवार की शाम कुलपति प्रो. गेसे नवांग समतेन सहित कई प्रोफेसर सारनाथ स्थित आवास पर श्रद्धांजलि देने पहुंचे थे। उनका अंतिम संस्कार मणिकर्णिका घाट पर पूरे राजकीय सम्मान के साथ किया गया।