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शिक्षा की ‘दुकान’ पर लूट खुलेआम
Updated Sun, 08 Apr 2018 01:28 AM IST
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्रज्ञानपुर। सूबे की सरकार ने निजी स्कूलों की मनमानी पर नकेल कसने के लिए आदेश जारी कर दिया है, मगर इसका असर स्कूलों पर नहीं दिख रहा है। निजी स्कूल मनमानी फीस वसूली कर रहे हैं। एडमीशन फीस, टर्मिनल फीस, यूनिफार्म और किताब-कापी के रूप में वसूली जारी है। अभिभावक अपनी जेबें ढ़ीली करने को मजबूर हैं।
प्रदेश सरकार ने निजी स्कूलों को एक वर्ष में अधिकतम 20 हजार फीस लेने, पांच वर्ष बाद यूनिफॉर्म बदलने और तीन वर्ष बाद किताबें बदलने का आदेश जारी किया है। इसका पालन नहीं करने पर स्कूल की मान्यता रद्द करने और एक लाख से पांच लाख तक तक जुर्माना लगाने का एलान किया गया है। इस फरमान का स्कूलों पर कोई असर नहीं है। स्कूल मनमानी लूट में मशगूल हैं। निजी स्कूल या तो खुद किताब-कापी की बिक्री कर रहे हैं या कमीशन के लिए दुकानें निर्धारित कर दी गईं हैं। साथ ही एडमिशन के अलावा टर्मिनल फीस भी वसूली जा रही है। यूनिफॉर्म भी बदल दे रहे हैं। यहीं नहीं हर साल किताबों को बदला जा रहा है। नियमानुसार तीन वर्ष के पहले किताबें नहीं बदली जा सकतीं। इस नियम का खुलेआम उल्लंघन किया जा रहा है। एनसीआरटी की किताबें चलाने से स्कूल कतराते हैं, क्योंकि इससे स्कूल प्रबंधन को कमीशन नहीं मिल पाएगा। निजी प्रकाशक मोटा कमीशन देते हैं। खास तौर पर सीबीएसई और आईसीएसई बोर्ड से संबद्ध स्कूल अभिभावकों की जेब पर तगड़ी चोट कर रहे हैं।
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प्रदेश सरकार ने निजी स्कूलों को एक वर्ष में अधिकतम 20 हजार फीस लेने, पांच वर्ष बाद यूनिफॉर्म बदलने और तीन वर्ष बाद किताबें बदलने का आदेश जारी किया है। इसका पालन नहीं करने पर स्कूल की मान्यता रद्द करने और एक लाख से पांच लाख तक तक जुर्माना लगाने का एलान किया गया है। इस फरमान का स्कूलों पर कोई असर नहीं है। स्कूल मनमानी लूट में मशगूल हैं। निजी स्कूल या तो खुद किताब-कापी की बिक्री कर रहे हैं या कमीशन के लिए दुकानें निर्धारित कर दी गईं हैं। साथ ही एडमिशन के अलावा टर्मिनल फीस भी वसूली जा रही है। यूनिफॉर्म भी बदल दे रहे हैं। यहीं नहीं हर साल किताबों को बदला जा रहा है। नियमानुसार तीन वर्ष के पहले किताबें नहीं बदली जा सकतीं। इस नियम का खुलेआम उल्लंघन किया जा रहा है। एनसीआरटी की किताबें चलाने से स्कूल कतराते हैं, क्योंकि इससे स्कूल प्रबंधन को कमीशन नहीं मिल पाएगा। निजी प्रकाशक मोटा कमीशन देते हैं। खास तौर पर सीबीएसई और आईसीएसई बोर्ड से संबद्ध स्कूल अभिभावकों की जेब पर तगड़ी चोट कर रहे हैं।
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