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सदा आनंद रहे एहि द्वारे मोहन खेले होरी...

Wed, 20 Mar 2019 02:18 AM IST
Varanasi Bureau वाराणसी ब्यूरो
Updated Wed, 20 Mar 2019 02:18 AM IST
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सदा आनंद रहे एहि द्वारे मोहन खेले होरी...
अजय राय
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वाराणसी। ‘सदा आनंद रहे एहि द्वारे मोहन खेलें होरी’। हर किसी के दरवाजे पर गायक मंडली इस तरह के स्वस्ति गायन से गवनई का समापन करती है। काशी में आनंद मुक्ति से जुड़ा है। होली के दिन दोपहर तक होरी के रंग बरसते हैं और शाम को हर कोई नए वस्त्र धारण करके चौसट्ठी घाट की ओर चल पड़ता है। पहले चौसठ योगिनियों का दर्शन करता है ताकि भैरव की यातना से मुक्त होकर मोक्ष का आनंद लें। वहां से लौटकर गवनई का आनंद लेता है। यह रवायत आज भी कुछ-कुछ कायम है।
महुआ, आम के बौर की महक, दरख्तों से झरते, खड़कते पत्ते, गर्म-सर्द मौसम बदन में आलस और मन में उमंग दोनों पैदा करते हैं। ऋतुराज बसंत का यह नशा दो चरणों में चढ़ता है। पहला पतझड़ में जीवन के जर्द पत्तों को हटाने और दूसरा नई कोपलों को खिलाने का मौसम है। होली इसके संधि काल में आती है। काशी का सुरीला समाज दोनों का उत्सव मनाता है। फागुन में होली और चैत में चैती के रूप में। काशी में आज घाटों पर होली की धूम मचती है लेकिन दो दशक पहले तक मंदिरों में होली रचाई जाती थी। नीचीबाग स्थित श्रीनिवास मंदिर के आंगन में रंग घोल दिया जाता था। उसमें में होली होती थी। मंदिर में उस्ताद बिस्मिल्लाह खां शहनाई बजाते तो राजन-साजन मिश्र का गायन होता था। रंग के साथ ही इत्र भी उड़ाया जाता था। मंदिर में आज भी गवनई होती है लेकिन अब स्थानीय निवासी ही गायन-वादन करते हैं।
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संगीत की संस्था कला प्रकाश के अशोक कपूर बताते हैं कि होली के दिन दोपहर तक रंग खेला जाता था और दोपहर बाद लोग स्नान करके सफेद कुर्ता-धोती या चूड़ीदार पायजामा पहन कर चौसट्ठी देवी का दर्शन करने निकल पड़ते थे। गोदौलिया से दशाश्वमेध और गोदौलिया से मैदागिन तक भीड़ लग जाती थी। इस दरमियान 40 से 50 दुकानों और मंदिरों के आगे लोग बैठ कर होली गायन करते थे तो कहीं शहनाई और बांसुरी बजती रहती थी। अबीर-गुलाल उड़ते रहते थे। इन महफिलों में ‘कैसी धूम मचाई कन्हाई’, ‘ऐसी होरी न खेलो कन्हाई रे’, ‘ खेल रहे रंग होली उनके दोऊ नैना’ जैसे शास्त्रीय गायन भी होते थे तो ‘तरसे जियरा मोर बलम अबहीं लड़िकवा’ और ‘कन्हाई कूद पड़े जमुना में’ जैसी पारंपरिक गीत भी मंडलियां गाती थीं। अब हास्य कवि सम्मेलनों ने उनकी जगह ले ली है। आज भी लोगों में चौसट्ठी देवी के दर्शन की परंपरा कायम है लेकिन गवनई की जगह कम हो गई। ललित अग्रवाल बताते हैं कि अब होली मिलन क्लबों, व्यापार मंडल और सामाजिक संगठनों में सिमट कर रह गया है।
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