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मां दुर्गा के दरबार में गायन-वादन-नृत्य की त्रिवेणी
Updated Mon, 21 Aug 2017 01:55 AM IST
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वाराणसी। गायन, वादन, नृत्य की त्रिवेणी में रविवार की रात संगीत प्रेमियों ने खूब गोता लगाया। संतूर और वायलिन के तार झंकृत हुए तो रागों-बंदिशों पर सुरों की अलापचारी ने मुग्ध कर दिया। दुर्गाकुंड संगीत समारोह की दूसरी निशा सुर, लय, ताल की त्रिवेणी के साथ यादगार बनी।
मां दुर्गा की महाआरती के बाद शुरुआत हुई कुमार सारंग के संतूर वादन से। उन्होंने संतूर पर राग पुरिया धनाश्री की अवतारणा की। तीन ताल में बंदिश बजाने के बाद उन्होंने भजन पर धुन बजाकर विदा ली। तबले पर संगत की श्रुतिशील उद्धव ने। इनके बाद गीतांजलि मौर्या का गायन हुआ। उन्होंने शुरुआत राग गोरख कल्याण में बड़ा ख्याल से की। बंदिश के बोल थे-कैसे धीर धरूं...। तबले पर संगत की रामाशीष पाठक ने और हारमोनियम पर अंकित जायसवाल थे। इनके बाद डॉ. स्वर्णा खूंटिया ने वायलिन पर राग रागेश्री की अवतारणा की। अंत में देवी गीत पर धुन बजाई। डॉ. रजनीश तिवारी ने तबले पर संगत की। चौथी प्रस्तुति थी डॉ. रश्मि चौधरी की। उन्होंने राग बागेश्री में बिलंबित एक ताल की रचना- माई तोरे बिन कंठ बिराजे... पर सुर लगाया। इनके बाद पं. वीरेंद्र मिश्र का सितार वादन हुआ। उन्होंने राग जोग में अलाप, जोड़, झाला के बाद विलंबित व द्रुत गत बजाकर वाहवाही लूटी। समापन कजरी पर धुन बजाकर किया। इनके पश्चात पं. रविशंकर मिश्र और डॉ. ममता का कथक नृत्य हुआ। शुरूआत- ऊं जयंती मंगला काली... के बोल पर पारंपरिक बंदिशों पर थिरकन से हुई। इनके बाद सुप्रिया शाह का सितार और डॉ. ज्ञानेश पांडेय का गायन सराहा गया। कलाकारों का स्वागत पं कौशलपति द्विवेदी ने किया। संयोजन पं. भोलानाथ मिश्र का था। संचालन कृष्ण कुमार तिवारी ने और धन्यवाद ज्ञापन रामयश मिश्र ने किया।
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मां दुर्गा की महाआरती के बाद शुरुआत हुई कुमार सारंग के संतूर वादन से। उन्होंने संतूर पर राग पुरिया धनाश्री की अवतारणा की। तीन ताल में बंदिश बजाने के बाद उन्होंने भजन पर धुन बजाकर विदा ली। तबले पर संगत की श्रुतिशील उद्धव ने। इनके बाद गीतांजलि मौर्या का गायन हुआ। उन्होंने शुरुआत राग गोरख कल्याण में बड़ा ख्याल से की। बंदिश के बोल थे-कैसे धीर धरूं...। तबले पर संगत की रामाशीष पाठक ने और हारमोनियम पर अंकित जायसवाल थे। इनके बाद डॉ. स्वर्णा खूंटिया ने वायलिन पर राग रागेश्री की अवतारणा की। अंत में देवी गीत पर धुन बजाई। डॉ. रजनीश तिवारी ने तबले पर संगत की। चौथी प्रस्तुति थी डॉ. रश्मि चौधरी की। उन्होंने राग बागेश्री में बिलंबित एक ताल की रचना- माई तोरे बिन कंठ बिराजे... पर सुर लगाया। इनके बाद पं. वीरेंद्र मिश्र का सितार वादन हुआ। उन्होंने राग जोग में अलाप, जोड़, झाला के बाद विलंबित व द्रुत गत बजाकर वाहवाही लूटी। समापन कजरी पर धुन बजाकर किया। इनके पश्चात पं. रविशंकर मिश्र और डॉ. ममता का कथक नृत्य हुआ। शुरूआत- ऊं जयंती मंगला काली... के बोल पर पारंपरिक बंदिशों पर थिरकन से हुई। इनके बाद सुप्रिया शाह का सितार और डॉ. ज्ञानेश पांडेय का गायन सराहा गया। कलाकारों का स्वागत पं कौशलपति द्विवेदी ने किया। संयोजन पं. भोलानाथ मिश्र का था। संचालन कृष्ण कुमार तिवारी ने और धन्यवाद ज्ञापन रामयश मिश्र ने किया।
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