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मायानगरी में दो बहनों के ‘कैद’ में कटे डेढ़ माह
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सोनाली।
- फोटो : UNNAO
मौरावां(उन्नाव)। विकासखंड हिलौली क्षेत्र के गांव मदाखेड़ा निवासी दो बहनें माया नगरी मुंबई में रहकर नेल पॉलिश कंपनी में नौकरी करती थीं। लॉकडाउन के चलते 24 अप्रैल से वह नौकरी पर न जाकर अपने कमरे में ‘कैद’ रहने को मजबूर हो गई। धीरे-धीरे पैसे खत्म हो गए तो खाने के लाले पड़ने लगे। मजबूरी में बाबा, दादी को फोन करके 10 हजार रुपये मंगाए। तब कुछ दिन तक दाल रोटी का जुगाड़ हो पाया। कुछ दिन बाद फिर जब स्थितियां बिगड़ी तो एक ट्रक के जरिए मुंबई से पलायन करने को मजबूर हुईं। किसी तरह से दोनों बहनें घर पहुंची तो बाबा, दादी से मिलते ही आंखों से आंसू निकल आए।
लॉकडाउन के दौरान ईस्ट मुंबई के मुकुरनगर में नौकरी करने गईं सगी बहनें उषा (18) व सोनाली (16) पुत्री बब्लू रावत किसी तरह से वहां से लौटकर घर आ सकी हैं। पिता बब्लू एक मामले में जेल में बंद है। जबकि मां की मौत हो चुकी है। लॉकडाउन की स्थिति बताते हुए रो पड़ी। कहा कि छह माह पहले जीजा मनीष व दीदी रूपा के साथ मुंबई गई थी। जीजा ने वहां पर एक नेल पॉलिश कंपनी में नौकरी लगवा दी थी। दोनों को 7-7 हजार रुपये प्रतिमाह मिलते थे। कोरोना संक्रमणकाल के चलते लॉकडाउन क्या लगा मानों सबकुछ ठहर गया। दोनों बहनें लगभग डेढ़ माह अपने किराये के कमरे में दुबकी रहीं।
इसी बीच पैसे खत्म हो जाने से पेट भरने का संकट खड़ा हो गया। किसी तरह से घर पर फोन करके दादा केशव से 10 हजार रुपये खाते में मंगवाए। कुछ दिन तक तो काम चला लेकिन फिर भी स्थितियां सुधरते न देख घर वापसी की तैयारी की। 9 मई को एक ट्रक मिला। इसकेे बाद वह मुंबई से पुरवा और फिर पीएचसी हिलौली पहुंची। यहां पर स्कैनिंग के बाद चिकित्सकों ने होम क्वारंटीन कर दिया। साथ ही दरवाजे पर पर्ची लगवा दी। दोनों बहनें आप बीती बताते हुए रोने लगी। जब कभी स्थितियां सामान्य होंगी तभी दोबारा मुंबई जाने की सोचूंगी।
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लॉकडाउन के दौरान ईस्ट मुंबई के मुकुरनगर में नौकरी करने गईं सगी बहनें उषा (18) व सोनाली (16) पुत्री बब्लू रावत किसी तरह से वहां से लौटकर घर आ सकी हैं। पिता बब्लू एक मामले में जेल में बंद है। जबकि मां की मौत हो चुकी है। लॉकडाउन की स्थिति बताते हुए रो पड़ी। कहा कि छह माह पहले जीजा मनीष व दीदी रूपा के साथ मुंबई गई थी। जीजा ने वहां पर एक नेल पॉलिश कंपनी में नौकरी लगवा दी थी। दोनों को 7-7 हजार रुपये प्रतिमाह मिलते थे। कोरोना संक्रमणकाल के चलते लॉकडाउन क्या लगा मानों सबकुछ ठहर गया। दोनों बहनें लगभग डेढ़ माह अपने किराये के कमरे में दुबकी रहीं।
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इसी बीच पैसे खत्म हो जाने से पेट भरने का संकट खड़ा हो गया। किसी तरह से घर पर फोन करके दादा केशव से 10 हजार रुपये खाते में मंगवाए। कुछ दिन तक तो काम चला लेकिन फिर भी स्थितियां सुधरते न देख घर वापसी की तैयारी की। 9 मई को एक ट्रक मिला। इसकेे बाद वह मुंबई से पुरवा और फिर पीएचसी हिलौली पहुंची। यहां पर स्कैनिंग के बाद चिकित्सकों ने होम क्वारंटीन कर दिया। साथ ही दरवाजे पर पर्ची लगवा दी। दोनों बहनें आप बीती बताते हुए रोने लगी। जब कभी स्थितियां सामान्य होंगी तभी दोबारा मुंबई जाने की सोचूंगी।

उषा।- फोटो : UNNAO
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