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संदोही देवी मंदिर आने वाला खाली हाथ नहीं लौटता
अमर उजाला ब्यूरो, उन्नाव
Updated Sat, 17 Oct 2015 01:26 AM IST
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मां संदोही देवी की महिमा अपरंपार है। मान्यता है यहां आने वाले भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं और यहां से कोई भी याचक खाली हाथ नहीं लौटता। कहा जाता है त्रेता युग में राम वनगमन के समय माता पार्वती को इसी स्थान पर राम के बारे में संदेह पैदा हुआ था।
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संवत 1026 में घुमंतू जाति के बंजारों ने इन्हीं पिंडियों के स्थान पर मंदिर का निर्माण कराया था। एक शताब्दी से जिले ही नहीं बल्कि अन्य जिलों के भक्तों के लिए माता संदोही देवी का मंदिर श्रृद्धा का केंद्र बना हुआ है।नगर पंचायत क्षेत्र में स्थित करीब 1050 वर्ष पुराने विशाल मंदिर का अनोखा इतिहास है।
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मंदिर प्राचीनकाल में घने जंगलों से घिरा हुआ था। इसका उल्लेख ऐतिहासिक आल्हाखंड में मिलता है। संवत 1921 में देवनागरी लिपि में मुंशी राम स्वरूप ने तत्कालीन अंग्रेज अफसर और फर्रूखाबाद के बंदोबस्त अधिकारी सीई इलिएट की अनुमति से प्रकाशित किया गया था।
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इसी अंग्रेज अफसर ने आल्हाखंड का अंग्रेजी में अनुवाद करा कर लंदन भेजा था। इसमे माता संदोही देवी की महत्ता का वर्णन मिलता है। मंदिर की उत्तर दिशा में विशाल तालाब है जिसमें पक्का घाट बना हुआ है। यहां के शिवबालक ने मंदिर के आसपास के जंगल को साफ करा कर सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन शुरू कराया था।
तभी से यहां आज तक सांस्कृतिक कार्यक्रमों के आयोजन होते आ रहे हैं। साहित्य के क्षेत्र में भी मंदिर का विशेष महत्व है। कबीर की तरह अनपढ़ कवि कालीदीन ने इसी मंदिर की सीढ़िय़ों पर बैठकर सैकड़ों छंदों की रचना की थी। आधुनिक समय में स्व. काका बैसवारी ने इसी मंदिर से अपनी काव्य यात्रा प्रारंभ कर देश में ख्याति अर्जित की थी।