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Unnao News: मोबाइल की लत बच्चों को बना रही मानसिक कमजोर
Mon, 19 May 2025 12:00 AM IST
कानपुर ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, उन्नाव
संवाद न्यूज एजेंसी, उन्नाव
Updated Mon, 19 May 2025 12:00 AM IST
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उन्नाव। मानसिक स्वास्थ्य कार्यक्रम के तहत जिला अस्पताल में बीते 30 दिनों में 90 बच्चों की जांच हुई। इनमें 67 ऐसे मिले जिनमें सोचने, समझने का स्तर सामान्य से काफी कम है। जब उनसे सवाल किए गए तो वह समझ ही नहीं पाए। बार-बार पूछने पर वह चिड़ाचिड़ा गए। ऐसे ज्यादातर बच्चों की उम्र 6-12 साल है। मनोचिकित्सकों के अनुसार, इसकी मुख्य वजह मोबाइल की बढ़ती लत है।
बच्चा न रोए और न ही अभिभावकों को परेशान करे, इसके लिए उन्हें मोबाइल देकर किनारे बैठा दिया जाता है। यही वजह है कि बच्चे लोगों की बताई बात कम और मोबाइल से मिली जानकारी को ज्यादा ठीक तरीके से समझते हैं। उस पर विश्वास भी करते हैं। मोबाइल फोन पर रील, गेम आदि की लत की वजह से उनकी सोचने व समझने की शक्ति भी कम होती जा रही है।
पिछले दिनों स्वास्थ्य विभाग ने मानसिक स्वास्थ्य कार्यक्रम के तहत स्कूल, कॉलेज, गांव आदि में कैंप लगाकर लोगों को जागरूक किया। इसमें स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं ने समस्या होने पर जिला अस्पताल के मानसिक रोग विभाग में दिखाने की बात कही थी। इसके बाद शहर व ग्रामीण क्षेत्रों से बच्चों के आने का सिलसिला शुरू हुआ। अप्रैल माह में लगभग 90 बच्चे जिला अस्पताल के मानसिक रोग विभाग में पहुंचे। इनमें 67 ऐसे थे, जिनसे कुछ पूछा गया तो वह बता नहीं पा रहे थे। इसके अलावा सोचने व याद करने में उन्हें दिक्कत हो रही थी।
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अभिभावक ऐसे करें बचाव
- तीन साल की उम्र के बाद बच्चे को सिर्फ एक घंटे ही टीवी देखने दें
- मां सिर्फ अपना दूध ही बच्चे को पिलाएं
- दूध पिलाते समय बच्चे से बात करें
- बोतल से दूध पिला रहीं है तो गोद में लेकर ही पिलाएं
- खाना खिलाते समय अभिभावक भी टीवी व मोबाइल न देखें
- बच्चों के सामने मोबाइल का प्रयोग करने से बचें
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मोबाइल की वजह से बच्चों में बढ़ रहीं कई समस्याएं
पिछले कुछ दिनों में मोबाइल की वजह से बच्चों में कई समस्याएं बढ़ गई हैं। मानसिक रोग विभाग में रोजाना ऐसे बच्चे पहुंच रहे हैं, जिनकी सोचने व समझने की शक्ति कमजोर हुई है। झगड़ा और जिद्दीपन की प्रवृति भी देखने को मिल रहा है। ऐसे बच्चों के अभिभावकों की पहले काउंसलिंग की जाती है। इसके बाद बच्चों की होती है। करीब दो से छह माह तक एक समय अंतराल में यह क्रम चलता है। जरूरत पर पड़ने पर दवाएं भी दी जाती हैं। किसी प्रकार की समस्या होने पर जिला अस्पताल के मानसिक रोग विभाग में संपर्क कर सकते हैं।
- सरस्वती रानी, परामर्शदाता, मानसिक रोग विभाग, जिला अस्पताल
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बच्चा न रोए और न ही अभिभावकों को परेशान करे, इसके लिए उन्हें मोबाइल देकर किनारे बैठा दिया जाता है। यही वजह है कि बच्चे लोगों की बताई बात कम और मोबाइल से मिली जानकारी को ज्यादा ठीक तरीके से समझते हैं। उस पर विश्वास भी करते हैं। मोबाइल फोन पर रील, गेम आदि की लत की वजह से उनकी सोचने व समझने की शक्ति भी कम होती जा रही है।
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पिछले दिनों स्वास्थ्य विभाग ने मानसिक स्वास्थ्य कार्यक्रम के तहत स्कूल, कॉलेज, गांव आदि में कैंप लगाकर लोगों को जागरूक किया। इसमें स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं ने समस्या होने पर जिला अस्पताल के मानसिक रोग विभाग में दिखाने की बात कही थी। इसके बाद शहर व ग्रामीण क्षेत्रों से बच्चों के आने का सिलसिला शुरू हुआ। अप्रैल माह में लगभग 90 बच्चे जिला अस्पताल के मानसिक रोग विभाग में पहुंचे। इनमें 67 ऐसे थे, जिनसे कुछ पूछा गया तो वह बता नहीं पा रहे थे। इसके अलावा सोचने व याद करने में उन्हें दिक्कत हो रही थी।
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अभिभावक ऐसे करें बचाव
- तीन साल की उम्र के बाद बच्चे को सिर्फ एक घंटे ही टीवी देखने दें
- मां सिर्फ अपना दूध ही बच्चे को पिलाएं
- दूध पिलाते समय बच्चे से बात करें
- बोतल से दूध पिला रहीं है तो गोद में लेकर ही पिलाएं
- खाना खिलाते समय अभिभावक भी टीवी व मोबाइल न देखें
- बच्चों के सामने मोबाइल का प्रयोग करने से बचें
मोबाइल की वजह से बच्चों में बढ़ रहीं कई समस्याएं
पिछले कुछ दिनों में मोबाइल की वजह से बच्चों में कई समस्याएं बढ़ गई हैं। मानसिक रोग विभाग में रोजाना ऐसे बच्चे पहुंच रहे हैं, जिनकी सोचने व समझने की शक्ति कमजोर हुई है। झगड़ा और जिद्दीपन की प्रवृति भी देखने को मिल रहा है। ऐसे बच्चों के अभिभावकों की पहले काउंसलिंग की जाती है। इसके बाद बच्चों की होती है। करीब दो से छह माह तक एक समय अंतराल में यह क्रम चलता है। जरूरत पर पड़ने पर दवाएं भी दी जाती हैं। किसी प्रकार की समस्या होने पर जिला अस्पताल के मानसिक रोग विभाग में संपर्क कर सकते हैं।
- सरस्वती रानी, परामर्शदाता, मानसिक रोग विभाग, जिला अस्पताल