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स्वजलधारा योजना में एक करोड़ का घोटाला
Unnao
Updated Sat, 24 Aug 2013 05:34 AM IST
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उन्नाव। ग्रामीणों को शुद्ध पेयजल उपलब्ध कराने के लिए चल रही स्वजलधारा योजना में एक करोड़ का घोटाला सामने आया है। उपायुक्त श्रम रोजगार की जांच में इसका खुलासा हुआ है। रायबरेली की एक एनजीओ इस योजना की कार्यदायी संस्था है। एनजीओ ने योजना में अनियमितताएं बरतीं। फर्जी और अधूरे कामों को पूरा दिखाकर जिला विकास कार्र्यालय से करोड़ों रुपये निकलवा लिए। मामले की जानकारी होने पर जिला विकास अधिकारी ने एनजीओ से व्ययों का ब्योरा तलब किया है।
हिलौली विकासखंड की विभिन्न ग्राम पंचायतों में स्वजलधारा योजना के तहत 35 पानी की टंकियों का निर्माण होना था। इन टंकियों के निर्माण का जिम्मा बछरावां रायबरेली की प्रेमा ग्राम्य विकास संस्थान नामक एनजीओ को दिया गया था।
स्वजलधारा कार्यक्रम के नियमों के तहत मिनी पाइप पेयजल योजना के परिचालन के लिए एनजीओ को ग्राम पेयजल एवं स्वच्छता समिति का गठन करके बैंक में खाता खोलना था। उसका संचालन समिति के अध्यक्ष एवं कोषाध्यक्ष के संयुक्त हस्ताक्षर से किया जाना था। एनजीओ को जिला विकास विभाग में शुद्ध पेयजल उपलब्ध कराने के लिए होने वाले व्यय का ब्योरा देना था। इसकी जांच पड़ताल के बाद ही धनराशि दी जानी थी लेकिन एनजीओ ने विभाग के एक अधिकारी से सांठगांठ कर अधूरे निर्माण कार्यों को दिखाकर करोड़ों रुपये का भुगतान करा लिया। शुद्ध पेयजल उपलब्ध न होने की शिकायत विकासखंड के कुछ ग्रामीणों ने मुख्य विकास अधिकारी से की। सीडीओ ने मामले की जांच उपायुक्त श्रम रोजगार को सौंप दी। 8 अगस्त 13 को उपायुक्त अनिल कुमार ने स्वजलधारा के तकनीकी सलाहकार सुरेंद्र मोहन दुग्गल और ग्राम पेयजल एवं स्वच्छता समितियों के अध्यक्ष व कोषाध्यक्ष के साथ गांव में जाकर योजना की असलियत जांची। टीम ने जांच में पाया कि ग्राम पंचायत हिलौली के मंदिर की टंकी की बोरिंग तो हुई लेकिन पानी सप्लाई नहीं हो सकी। टंकी की छत तक नहीं पड़ी है। उपायुक्त ने प्लास्टर आदि निर्माण की गुणवत्ता पर भी सवाल उठाए। ग्राम पेयजल एवं स्वच्छता समितियों में इन टंकियों के निर्माण का कोई कार्य नहीं किया गया जबकि टंकियों का निर्माण कार्य केवल समितियों द्वारा ही होना चाहिए था। किसके आदेश पर संस्था ने कार्य किया यह भी स्पष्ट नहीं हो पाया।
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एनजीओ ने नहीं कराया एग्रीमेंट
जांच पड़ताल में टीम को पता चला कि एनजीओ ने किसी की भी जमीन का एग्रीमेंट तक नहीं कराया। जनरेटर आदि क्रय नहीं किया। यहां तक की चेक बुक/पासबुक भी एनजीओ ठेकेदार अपने पास ही रखे रहा और धोखे से चेक काटकर भुगतान प्राप्त करता रहा। विभाग के एक अधिकारी के निर्देश पर एनजीओ को समय-समय पर भुगतान होता रहा और इस तरह से ठेकेदार ने योजना के मुख्य कर्ताधर्ता से सांठगांठ करके 1,17,84,384 रुपये निकाल लिए। सीडीओ को भेजे गए पत्र में उपायुक्त ने बताया कि ग्राम अकोहरी में पांच टंकियां प्रस्तावित थी जिनमें तीन का निर्माण अधूरा व दो शुरू ही नहीं हो पाई हैं। एनजीओ द्वारा निकाली गई धनराशि के सापेक्ष बहुत कम कार्य हो पाया है। योजना में ठेकेदार ने जमकर धांधली की और करोड़ों रुपये का हेरफेर किया।
योजना से जुड़े अधिकारी पर कस सकता है शिकंजा
जांच पड़ताल में उपायुक्त को इस योजना से जुड़े एक अधिकारी की भूमिका भी संदिग्ध लगी। जांच रिपोर्ट में उपायुक्त ने इस अफसर पर भी उंगली उठाई है। कहा है कि इस अधिकारी ने अपने दायित्वों का सही निर्वहन नहीं किया। बिना जांच पड़ताल के ही वह ठेकेदार को भुगतान करने के निर्देश देते रहे। विभाग के उच्चाधिकारी का कहना है कि जिन निर्माण कार्यों का भुगतान किया उनकी मौके पर जाकर जांच पड़ताल करनी थी। लेकिन अधिकारी ने ऐसा नहीं किया। इसलिए उस पर भी कार्रवाई होगी।
व्यय का ब्योरा ना दिया तो होगी एफआईआर
करोड़ों रुपये के घोटाले की भनक लगते ही अफसरों में हड़कंप मच गया है। आनन-फानन में एनजीओ से किए गए व्ययों का ब्योरा मांगा गया है। जिला विकास अधिकारी राममणि त्रिपाठी ने बताया कि एनजीओ को एक सप्ताह का समय दिया गया है। चार दिन बीत चुके हैं लेकिन एनजीओ ने अभी तक ब्योरा नहीं दिया है। निर्धारित समय बीतने के बाद एनजीओ के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराई जाएगी।
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हिलौली विकासखंड की विभिन्न ग्राम पंचायतों में स्वजलधारा योजना के तहत 35 पानी की टंकियों का निर्माण होना था। इन टंकियों के निर्माण का जिम्मा बछरावां रायबरेली की प्रेमा ग्राम्य विकास संस्थान नामक एनजीओ को दिया गया था।
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स्वजलधारा कार्यक्रम के नियमों के तहत मिनी पाइप पेयजल योजना के परिचालन के लिए एनजीओ को ग्राम पेयजल एवं स्वच्छता समिति का गठन करके बैंक में खाता खोलना था। उसका संचालन समिति के अध्यक्ष एवं कोषाध्यक्ष के संयुक्त हस्ताक्षर से किया जाना था। एनजीओ को जिला विकास विभाग में शुद्ध पेयजल उपलब्ध कराने के लिए होने वाले व्यय का ब्योरा देना था। इसकी जांच पड़ताल के बाद ही धनराशि दी जानी थी लेकिन एनजीओ ने विभाग के एक अधिकारी से सांठगांठ कर अधूरे निर्माण कार्यों को दिखाकर करोड़ों रुपये का भुगतान करा लिया। शुद्ध पेयजल उपलब्ध न होने की शिकायत विकासखंड के कुछ ग्रामीणों ने मुख्य विकास अधिकारी से की। सीडीओ ने मामले की जांच उपायुक्त श्रम रोजगार को सौंप दी। 8 अगस्त 13 को उपायुक्त अनिल कुमार ने स्वजलधारा के तकनीकी सलाहकार सुरेंद्र मोहन दुग्गल और ग्राम पेयजल एवं स्वच्छता समितियों के अध्यक्ष व कोषाध्यक्ष के साथ गांव में जाकर योजना की असलियत जांची। टीम ने जांच में पाया कि ग्राम पंचायत हिलौली के मंदिर की टंकी की बोरिंग तो हुई लेकिन पानी सप्लाई नहीं हो सकी। टंकी की छत तक नहीं पड़ी है। उपायुक्त ने प्लास्टर आदि निर्माण की गुणवत्ता पर भी सवाल उठाए। ग्राम पेयजल एवं स्वच्छता समितियों में इन टंकियों के निर्माण का कोई कार्य नहीं किया गया जबकि टंकियों का निर्माण कार्य केवल समितियों द्वारा ही होना चाहिए था। किसके आदेश पर संस्था ने कार्य किया यह भी स्पष्ट नहीं हो पाया।
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एनजीओ ने नहीं कराया एग्रीमेंट
जांच पड़ताल में टीम को पता चला कि एनजीओ ने किसी की भी जमीन का एग्रीमेंट तक नहीं कराया। जनरेटर आदि क्रय नहीं किया। यहां तक की चेक बुक/पासबुक भी एनजीओ ठेकेदार अपने पास ही रखे रहा और धोखे से चेक काटकर भुगतान प्राप्त करता रहा। विभाग के एक अधिकारी के निर्देश पर एनजीओ को समय-समय पर भुगतान होता रहा और इस तरह से ठेकेदार ने योजना के मुख्य कर्ताधर्ता से सांठगांठ करके 1,17,84,384 रुपये निकाल लिए। सीडीओ को भेजे गए पत्र में उपायुक्त ने बताया कि ग्राम अकोहरी में पांच टंकियां प्रस्तावित थी जिनमें तीन का निर्माण अधूरा व दो शुरू ही नहीं हो पाई हैं। एनजीओ द्वारा निकाली गई धनराशि के सापेक्ष बहुत कम कार्य हो पाया है। योजना में ठेकेदार ने जमकर धांधली की और करोड़ों रुपये का हेरफेर किया।
योजना से जुड़े अधिकारी पर कस सकता है शिकंजा
जांच पड़ताल में उपायुक्त को इस योजना से जुड़े एक अधिकारी की भूमिका भी संदिग्ध लगी। जांच रिपोर्ट में उपायुक्त ने इस अफसर पर भी उंगली उठाई है। कहा है कि इस अधिकारी ने अपने दायित्वों का सही निर्वहन नहीं किया। बिना जांच पड़ताल के ही वह ठेकेदार को भुगतान करने के निर्देश देते रहे। विभाग के उच्चाधिकारी का कहना है कि जिन निर्माण कार्यों का भुगतान किया उनकी मौके पर जाकर जांच पड़ताल करनी थी। लेकिन अधिकारी ने ऐसा नहीं किया। इसलिए उस पर भी कार्रवाई होगी।
व्यय का ब्योरा ना दिया तो होगी एफआईआर
करोड़ों रुपये के घोटाले की भनक लगते ही अफसरों में हड़कंप मच गया है। आनन-फानन में एनजीओ से किए गए व्ययों का ब्योरा मांगा गया है। जिला विकास अधिकारी राममणि त्रिपाठी ने बताया कि एनजीओ को एक सप्ताह का समय दिया गया है। चार दिन बीत चुके हैं लेकिन एनजीओ ने अभी तक ब्योरा नहीं दिया है। निर्धारित समय बीतने के बाद एनजीओ के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराई जाएगी।