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लॉकडाउन दूसरा चरण और दूसरा सप्ताह: ढील के साथ चुनौती भी
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सुल्तानपुर। लॉकडाउन के दूसरे चरण के दूसरे सप्ताह में प्रशासन ने सरकारी कार्यालयों को खोलने के साथ कुछ ही कुछ क्षेत्रों में रियायत दे दी है। सशर्त ढील देने के साथ ही प्रशासन व पुलिस की चुनौती बढ़ गई है। प्रशासन व पुलिस के सामने बाजार में भीड़ पर नियंत्रण, सड़क पर आवाजाही व कार्यालयों में आमलोगों के प्रवेश को रोकने के साथ कई चुनौती बढ़ गई है।
चुनौती को देखते हुए प्रशासन व पुलिस ने निरीक्षण का दायरा बढ़ा दिया है। साथ ही बाइक व कार पर चलने के नियम लागू कर दिए हैं। प्रतिबंध के बीच मिली रियायत के बीच लोगों ने सुकून महसूस किया लेकिन रियायत का पहला दिन आशंका, डर के बीच सन्नाटे में ही गुजर गया।
गांव से लेकर शहर तक अधिकांश लोग आवाजाही से कतराते रहे। हालांकि कुछ लोग पहले की तरह ही फर्राटा भरते रहे। कुछ जगहों पर पुलिस ने ऐसे लोगों को फटकार भी लगाई।
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शासन के निर्देश पर जिला मजिस्ट्रेट ने सोमवार से कुछ शर्तों के साथ सरकारी कार्यालयों को खोलने की इजाजत दे दी। डीएम के निर्देश के मुताबिक अधिकांश कार्यालय खुले और अधिकारियों के साथ एक तिहाई कर्मचारी भी पहुंचे।
विकास भवन, कलेक्ट्रेट समेत अधिकांश कार्यालयों को सैनिटाइज भी कराया गया। इसके बाद भी कर्मचारियों में कोरोना का लेकर दहशत रही। पहले की तरह कार्यालयों में न तो चहल-पहल रही और न ही आपाधापी। पहले दिन कार्यालयों में कार्य भी ठंडा रहा।
डीआरडीए के परियोजना निदेशक डॉ. शिवाकांत द्विवेदी पहले दिन कार्यालय पहुंचे। इसके पहले कार्यालय को सैनिटाइज कराया गया था। पहले दिन कार्यालय में कुछ खास कार्य नहीं हो सका। हालांकि कार्यालय में अकील अहमद, ओमप्रकाश मिश्र, आमोद त्रिपाठी भी मौजूद रहे लेकिन दहशत सबके चेहरे पर दिखी।
जिला दिव्यांगजन कल्याण अधिकारी चंद्रेश त्रिपाठी भी कार्यालय खोलने के आदेश के बाद सुबह ऑफिस पहुंचे। कार्यालय में बैठकर उन्होंने कार्यों की जानकारी ली लेकिन कोई खास कार्य नहीं हो सका। संक्रमण का भय दिव्यांगजन कार्यालय में दिखा।
ग्राम्य विकास अभिकरण कार्यालय में बैठे कर्मचारियों ने सोशल डिस्टेंसिंग, मॉस्क का पूरा ख्याल रखा। पटल पर कर्मचारी बैठे रहे लेकिन चर्चा कोरोना की ही चलती रही। यही हाल जिला विकास कार्यालय का भी रहा। जिला विकास कार्यालय में बृजेंद्र त्रिपाठी, देवकी नंदन यादव आठ कर्मचारी बैठे रहे लेकिन सोशल डिस्टेंसिंग का पूरा ख्याल रखा।
हालांकि कुछ लोग मास्क का उपयोग कार्यालय में नहीं किए। सीडीओ के स्टेनो देवेंद्र पांडेय अपने कार्यालय में अकेले ही बैठे रहे और कार्य निपटाते रहे। विकास विभाग समेत अन्य कार्यालयों में सिर्फ 33 फीसदी कर्मचारी ही आए थे।
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चुनौती को देखते हुए प्रशासन व पुलिस ने निरीक्षण का दायरा बढ़ा दिया है। साथ ही बाइक व कार पर चलने के नियम लागू कर दिए हैं। प्रतिबंध के बीच मिली रियायत के बीच लोगों ने सुकून महसूस किया लेकिन रियायत का पहला दिन आशंका, डर के बीच सन्नाटे में ही गुजर गया।
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गांव से लेकर शहर तक अधिकांश लोग आवाजाही से कतराते रहे। हालांकि कुछ लोग पहले की तरह ही फर्राटा भरते रहे। कुछ जगहों पर पुलिस ने ऐसे लोगों को फटकार भी लगाई।
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शासन के निर्देश पर जिला मजिस्ट्रेट ने सोमवार से कुछ शर्तों के साथ सरकारी कार्यालयों को खोलने की इजाजत दे दी। डीएम के निर्देश के मुताबिक अधिकांश कार्यालय खुले और अधिकारियों के साथ एक तिहाई कर्मचारी भी पहुंचे।
विकास भवन, कलेक्ट्रेट समेत अधिकांश कार्यालयों को सैनिटाइज भी कराया गया। इसके बाद भी कर्मचारियों में कोरोना का लेकर दहशत रही। पहले की तरह कार्यालयों में न तो चहल-पहल रही और न ही आपाधापी। पहले दिन कार्यालयों में कार्य भी ठंडा रहा।
डीआरडीए के परियोजना निदेशक डॉ. शिवाकांत द्विवेदी पहले दिन कार्यालय पहुंचे। इसके पहले कार्यालय को सैनिटाइज कराया गया था। पहले दिन कार्यालय में कुछ खास कार्य नहीं हो सका। हालांकि कार्यालय में अकील अहमद, ओमप्रकाश मिश्र, आमोद त्रिपाठी भी मौजूद रहे लेकिन दहशत सबके चेहरे पर दिखी।
जिला दिव्यांगजन कल्याण अधिकारी चंद्रेश त्रिपाठी भी कार्यालय खोलने के आदेश के बाद सुबह ऑफिस पहुंचे। कार्यालय में बैठकर उन्होंने कार्यों की जानकारी ली लेकिन कोई खास कार्य नहीं हो सका। संक्रमण का भय दिव्यांगजन कार्यालय में दिखा।
ग्राम्य विकास अभिकरण कार्यालय में बैठे कर्मचारियों ने सोशल डिस्टेंसिंग, मॉस्क का पूरा ख्याल रखा। पटल पर कर्मचारी बैठे रहे लेकिन चर्चा कोरोना की ही चलती रही। यही हाल जिला विकास कार्यालय का भी रहा। जिला विकास कार्यालय में बृजेंद्र त्रिपाठी, देवकी नंदन यादव आठ कर्मचारी बैठे रहे लेकिन सोशल डिस्टेंसिंग का पूरा ख्याल रखा।
हालांकि कुछ लोग मास्क का उपयोग कार्यालय में नहीं किए। सीडीओ के स्टेनो देवेंद्र पांडेय अपने कार्यालय में अकेले ही बैठे रहे और कार्य निपटाते रहे। विकास विभाग समेत अन्य कार्यालयों में सिर्फ 33 फीसदी कर्मचारी ही आए थे।