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‘मेरे पैरों को तू मिट्टी से सना रहने दे, मेरा धरती से जो रिश्ता है बना रहने दे’

Sun, 28 Feb 2021 10:46 PM IST
Lucknow Bureau लखनऊ ब्यूरो
Updated Sun, 28 Feb 2021 10:46 PM IST
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special story of writer and lyricist manoj muntashir
सुल्तानपुर। बॉलीवुड के गीतकार व संवाद लेखक मनोज मुंतशिर दो दिन से अमेठी-सुल्तानपुर में हैं। अपने संघर्ष व काबिलियत के दम पर वे आज बॉलीवुड में उस मुकाम पर हैं, जहां पहुंचकर कोई भी अपनी सफलता पर रश्क कर सकता है।
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इसके बावजूद वे आज भी जमीन से जुड़े हैं। साल भर वे कहीं रहें लेकिन सुल्तानपुर में अपना जन्मदिन मनाना नहीं भूलते। अपने पुराने साथियों से आज भी लिपटकर मिलते हैं। बुजुर्गों को सम्मान देते हैं। रविवार को अमर उजाला ने उनके अतीत के पन्नों से लेकर भविष्य की उम्मीदों तक पर बात की। पेश है एक रिपोर्ट...
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सवाल : मिट्टी से आपका खास लगाव दिखता है। वो चाहे देश की मिट्टी हो या फिर अमेठी-सुल्तानपुर की। आपके गीत हों या फिर मंचीय प्रस्तुति, यह लगाव दिख ही जाता है। क्या वजह हो सकती है?
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जवाब : जो अपनी मिट्टी का नहीं रहता, वो कहीं का नहीं रहता। मैं आज जो कुछ भी हूं, उसकी बुनियाद में मेरे गांव, मेरे शहर के संस्कार हैं। यही गौरीगंज-सुल्तानपुर था, जहां पहली बार कविता लिखी, पहली बार मंचों पर गया, पहली बार वाहवाहियां मिली। यही वो शहर है, जहां बुजुर्गों की डांट सुनी, और उनसे बहुत कुछ सीखा। मिट्टी से मोहब्बत लाजिमी है। फिल्म केसरी के लिए गीत लिखते हुए यही मिट्टी मेरी कलम से झड़ने लगी और ‘तेरी मिट्टी’ जैसा गीत बन गया। आज भी जब कभी सफलता और शोहरत मुझे बहकाने के लिए आती है तो मैं उससे आंखें मिलाकर कह देता हूं... ‘मेरे पैरों को तू मिट्टी में सना रहने दे... मेरा धरती से जो रिश्ता है, वो बना रहने दे।’
सवाल : ‘तेरी मिट्टी’ गीत को पिछला फिल्म फेयर अवॉर्ड मिलने की उम्मीद थी। अवॉर्ड न मिलने से आपके लाखों प्रशंसकों में निराशा हुई। किस रूप में लेते हैं?
जवाब : मेरा दफ्तर अवॉर्ड से भरा हुआ है। फिल्म इंडस्ट्री का लगभग हर अवॉर्ड जीत चुका हूं। अब आगे बढ़ने का समय आ गया है। ये समझने का समय आ गया है कि हमारे काम का असली जजमेंट जनता के हाथ है। उनका प्यार ही असली अवॉर्ड है। मैं समझता हूं कि मेरी मिट्टी को एक ट्रॉफी नहीं मिली तो क्या, 135 करोड़ लोगों की शाबासियां मिलीं, इससे ज्यादा मैं और क्या मान सकता हूं। इस देश का सिपाही आज जन गण मन के बाद तेरी मिट्टी गाता है। मेरी कलम धन्य हो चुकी है। मुझे झूठे अवॉर्ड की कोई जरूरत नहीं है।
सवाल : संघर्ष के दिनों का कोई ऐसा वाकया, जिसने आपको गहरे हार्ट किया हो। जिसे आप अब तक न भूल पाए हों?
जवाब : मुंबई की बरसात गरीब को और गरीब बना देती है। बारिश के दिनों में एक बार मैं एक प्रोडक्शन हाउस के दफ्तर में किसी से मिलने गया। मेरे जूते फटेे हुए थे और उनके अंदर पानी भर चुका था। जैसे ही मैं ऑफिस में दाखिल हुआ वाचमैन चिल्ला उठा ‘बाहर जाओ’, पता नहीं कहां-कहां से चले आते हैं, पूरा ऑफिस गंदा कर दिया।’ मुझे फौरन दफ्तर से निकाल दिया गया और मैं बरसात में अपने फटे हुए जूतों में मुंबई की सड़कों पर देर तक भीगता रहा और रोता रहा। वक्त बदला तो उसी ऑफिस में मेरे जाने पर कंपनी के मालिक बाहर तक रिसीव करने आने लगे। जिंदगी के ऐसे ही उतार-चढ़ाव पर मैंने कभी कहा था ‘जूते फटे पहन के आकाश पर चढ़े थे, सपने हमारे हरदम औकात से बड़े थे’।
सवाल : बॉलीवुड का कौन सा गीतकार आपका सर्वाधिक पसंदीदा है?
जवाब : शैलेंद्र, साहिर, कैफी और आनंद बक्शी, मैं इन चारों को फिल्मी शायरी के चार आधार स्तंभ मानता हूं। चारों का स्टाइल एकदम अलग है, लेकिन शब्दों की गहराई और रवानी एक जैसी है। इन्होंने फिल्मी गीतों को जो दिया है, आने वाली कई पीढ़ियां उसके लिए कर्जदार रहेंगी।
सवाल : टेलीविजन से फिल्मों के गीत, फिर संवाद और अब तो आप फ़िल्म भी लिख रहे हैं। आज से पांच साल बाद मनोज मुंतशिर खुद को कहां देखते हैं?
जवाब : ये तो तय है कि पांच साल बाद मैं गीत और संवाद तो लिख ही रहा हूंगा, साथ ही सोशल वर्क में भी मेरा ज्यादा दखल देखने को मिलेगा। मनोज मुंतशिर इंटरटेनमेंट नाम से मेरा अपना प्रोडक्शन हाउस है। जिसके अंतर्गत अच्छी फिल्में बनाने की मुहिम भी चल रही है। मैं अपनी प्रोडक्शन कंपनी के जरिए नई प्रतिभाओं को मौका देने के लिए वचनबद्ध हूं।
सवाल : आपने न्यू इंक पोएट्री की शुरुआत युवा लेखकों, कवियों के लिए की है। यूपी में फ़िल्म इंडस्ट्री भी आ रही है, प्रतिभाओं के लिए ये अवसर कितने कारगर साबित होंगे ?

जवाब : तमिल फिल्में तमिलनाडु में बनती हैं, तेलगू, तेलंगाना में, कन्नड़ कर्नाटक में तो हिंदी फिल्में हिंदी की हृदयस्थली उत्तर प्रदेश में क्यों नहीं बन सकती। मेरी यही फरियाद थी, जो अलग-अलग न्यूज चैनल्स के जरिए मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ तक पहुंची। उन्होंने फौरन हमें मुलाकात के लिए बुलाया। मेरे साथ फिल्मी दुनिया की तकरीबन 30 प्रतिष्ठित हस्तियों ने उनसे भेंट की। अब नोएडा में फिल्म सिटी का काम जोर शोर से शुरू हो चुका है। मुझे विश्वास है कि बहुत जल्द वो दिन आएगा जब उत्तर प्रदेश के युवाओं को फिल्मों में अपना हुनर आजमाने के लिए मुंबई के फुटपाथों पर नहीं सोना पड़ेगा। सिनेमा खुद चलकर उनके दरवाजे तक आएगा।
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