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Sonebhadra News: धड़कते दिल को नहीं मिल पा रहे 'कॉर्डियोलॉजिस्ट', वाराणसी की दूरी तय करने में टूट जा रही जिंदगी की डोर

Tue, 29 Sep 2026 01:05 AM IST
Varanasi Bureau वाराणसी ब्यूरो
Updated Tue, 29 Sep 2026 01:05 AM IST
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Patients with failing hearts are unable to find cardiologists; the thread of life snaps while making the journey to Varanasi.
मेडिकल कॉलेज के आईसीयू की स्टेमी एरिया में मरीज का चेकअप करते डॉक्टर।- संवाद
सोनभद्र। सीने में तेज दर्द के साथ दिल के दौरे की पुष्टि हुई लेकिन जिले में कॉर्डियोलॉजिस्ट न होने के कारण थ्रॉम्बोलॉजी (खून का धक्का पिघलाने) के बाद मरीजों को वाराणसी के लिए रेफर करना पड़ा। मेडिकल कॉलेज से 12 महीने में 76 मरीज रेफर किए गए। ऐसे मरीजों के मामले की पड़ताल (परिवार वालों से संपर्क साधा गया) की गई तो पता चला कि 100 से 120 किमी की दौड़ के कारण करीब 3 घंटे का समय लगने से कई मरीजों की सांसें वाराणसी पहुंचने से पहले ही थम गईं थी। वहीं कई को बीएचयू में घंटों उपचार (बेड) न मिल पाने के कारण प्राइवेट अस्पतालों का रुख करना पड़ा। वहां पहुंचने में भी देर होने के कारण मरीज को बचाया नहीं जा सका।
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जिले में सरकारी या निजी किसी भी अस्पताल में कॉर्डियोलॉजिस्ट नहीं है। इससे जहां दिल के बीमारियों की जल्दी पहचान नहीं हो पाती। वहीं दिल का दौरा पड़ने की स्थिति में वाराणसी जाना मजबूरी है। सरकार ने जिले के पांच केंद्रों (मेडिकल कॉलेज, सीएचसी चोपन, सीएचसी घोरावल, सीएचसी म्योरपुर और संयुक्त चिकित्सालय अनपरा) पर स्टेमी (हृदय रोगियों के पहचान) की सुविधा उपलब्ध कराई है। वहां के डॉक्टर और कर्मियों को विशेष प्रशिक्षण भी दिया है। दिल के दौरे की पुष्टि के बाद खून का थक्का गलाने वाले इंजेक्शन-दवाएं देकर मरीज को बीएचयू रेफर कर दिया जाता है। वहां एंजियोग्राफी और इसके बाद आने वाली रिपोर्ट के मुताबिक उपचार की प्रक्रिया अपनानी होती है। इसके लिए बीएचयू स्टेमी नोडल ग्रुप भी बनाया गया है जिसमें मरीज और उसके स्थिति में बारे में जानकारी देने के साथ थ्रॉम्बोलिसिस के लिए अपनाई गई प्रक्रिया, किए गए उपचार का विवरण भी उपलब्ध कराया जाता है। बावजूद बीएचयू पहुंचने पर जहां बेड और उपचार के लिए खासी मशक्कत करनी पड़ रही है। वहीं सीसीयू (कार्डिएक केयर यूनिट) में बेड आरक्षित होने से पहले ही जिंदगी खत्म हो जा रही है।
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41 से साधा संपर्क, 30 ने उठाई कॉल, अधिकांश ने कहा : नहीं मिल पाया समय से उपचार
आंकड़े बताते हैं कि आठ सितंबर 2025 से 27 सितंबर 2026 के बीच सरकारी स्वास्थ्य केंद्रों पर दिल के दौरे के 80 मरीज पहुंचे। इसमें 76 को मेडिकल कॉलेज में प्राथमिक उपचार (थ्रॉम्बोलिसिस) की सुविधा उपलब्ध कराई गई। वर्ष 2026 में (जनवरी से अब तक) ऐसे मरीजों की संख्या 41 रही। इनके तीमारदारों से फोन पर संपर्क साधा गया। लगभग 30 ने कॉल रिसीव की। अधिकांश का कहना था कि कॉर्डियोलॉजिस्ट न होने से वाराणसी की दूरी तय करने की मजबूरी और बीएचयू के कॉर्डिएक केयर यूनिट में उपचार-भर्ती में घंटों की देरी उनके मरीजों की जिंदगी पर भारी पड़ी। किसी ने प्राइवेट अस्पताल का रुख किया तो किसी की प्राइवेट अस्पताल पहुंचने पर भी समय से उपचार न मिल पाने के कारण जिंदगी की डोर टूट गई।
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मेरे पिता श्रीराम (65) को गत 28 अगस्त को दिल का दौरा पड़ा था। मेडिकल कॉलेज में थ्रॉम्बोलिसिस की प्रक्रिया अपनाई गई लेकिन जब तक उन्हें वाराणसी के लिए रवाना होते, सांसें थम गईं। -बैजनाथ, मदार।
मेरी मां (80) को गत 14 अगस्त को हार्ट अटैक आया था। कॉर्डियोलॉजिस्ट न होने के कारण मेडिकल कॉलेज से थ्रॉम्बोलाइज कर बीएचयू भेजा गया। वहां पहुंचते-पहुंचते हालत काफी खराब हो गई। बीएचयू में घंटों इंतजार के बाद उपचार मिला लेकिन तब तक काफी देर हो चुकी थी। तीसरे दिन मौत हो गई। -मनीष कुमार, भरहरी।
11 अगस्त को दिल का दौरा पड़ने पर मां (59) को लेकर 11 अगस्त को मेडिकल कॉलेज पहुंचा था। वहां से थ्रॉम्बोलाइज कर वाराणसी भेजा गया। 24 घंटे से भी अधिक समय गुजर जाने के बाद बेड नहीं मिला तब प्राइवेट अस्पताल ले गया लेकिन वहां पहुंचते-पहुंचते स्थिति काफी खराब हो चुकी थी और उपचार शुरू होने के महज दो घंटे बाद मौत हो गई। - नंदू, घोरावल।
पिता राजकुमार (55) को अचानक सीने में दर्द की शिकायत हुई। मेडिकल कॉलेज पहुंचने पर प्राथमिक उपचार के बाद वाराणसी भेजा गया। वहां एक रात इंतजार के बाद बेड मिल गया। एंजियोग्राफी की रिपोर्ट आई तो पता चला कि ब्लॉकेज नहीं है सिर्फ गैस के चलते दिक्कत आई थी। - प्रमोद केशरी, नौगढ़, चंदौली।
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डॉक्टर के मुताबिक सीने के बीचों-बीच भारीपन, जकड़न, दबाव, जलन या निचोड़ने जैसा दर्द, दर्द एक या दोनों बांहों, कंधे, पीठ, गर्दन, जबड़े या ऊपरी पेट तक पहुंचने की शिकायत हो। अचानक से धड़कन बढ़ने, कम मेहनत पर ही सांस फूलने, बगैर किसी कारण के पसीना आने, बेचैनी के साथ मतली, उल्टी या पेट में असहज स्थिति बनने, अचानक कमजोरी, सिर घूमने, बेहोशी महसूस हो तो तत्काल अस्पताल पहुंचे। एंबुलेंस के लिए 108/112 डायल करें।
हार्ट अटैक में हर मिनट महत्वपूर्ण है। समय पर ईसीजी, सही निदान और आवश्यकतानुसार एंजियोप्लास्टी हृदय की मांसपेशियों को होने वाले नुकसान को कम करने में मदद करती हैं। बचाव के लिए जरूरी है कि नियमित व्यायाम, संतुलित आहार और स्वस्थ दिनचर्या को प्राथमिकता दें। रोजाना कम से कम 30 मिनट पैदल चलें। हरी सब्जियां-फल खाएं। नमक-तले हुए भोजन का सेवन सीमित रखें। धूम्रपान-तंबाकू से दूर रहें। उच्च रक्तचाप, मधुमेह, कोलेस्ट्रॉल के मरीज नियमित जांच कराते रहें। -डॉ. राहुल सिंह, विभागाध्यक्ष मेडिसिन, मेडिकल कॉलेज।

ऐसे मामलों में जागरूकता और समय पर उपचार अहम है। जिले के तीन सीएचसी, संयुक्त चिकित्सालय अनपरा और मेडिकल कॉलेज में लगातार स्टेमी सेवाएं दी जा रही है। इससे कई मरीजों की जान बचाने में मदद मिली है। जब भी किसी मरीज में दिल के दौरे की पुष्टि होती है। बीएचयू के नोडल से संपर्क करते हुए थ्रॉम्बोलाइज किया जाता है। खून का धक्का घुलने के बाद मरीज को इतना वक्त मिल जाता है कि 24 से 48 घंटे के भीतर वह किसी कॉर्डियोलॉजिस्ट से अपना उपचार शुरू करा सके। -डॉ. गिरधारी लाल, एसीएमओ/नोडल स्टेमी
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