रोशन कर रहे शहर, खुद पी रहे जहर: ऊर्जांचल के रहवासियों के जीवन पर प्रदूषण का घना अंधेरा छाया, कठिन हो रहा जनजीवन
सोनभद्र के रेणुकापार और ऊर्जांचल क्षेत्र में सब कुछ प्रदूषण की चपेट में है। कोयला और बिजली से जुड़ी परियोजनाओं ने स्थानीय निवासियों के जीवन में खुशहाली का उजाला भरने के वादे तो खूब किए थे, लेकिन खुद के स्थापित होने के बाद लोगों को उनके हाल पर छोड़ दिया है।
विस्तार
हर चमकीली वस्तु का एक स्याह पक्ष जरूर होता है। सोनभद्र के रेणुकापार और ऊर्जांचल क्षेत्र में इसकी बानगी देखी जा सकती है। देश को रोशन करने वाले ऊर्जांचल के रहवासियों के जीवन पर प्रदूषण का घना अंधेरा छाया हुआ है। हवा हो या फिर मिट्टी और पानी। सब कुछ प्रदूषण की चपेट में है। दूषित पानी पीकर लोग गंभीर बीमारियों की चपेट में आ रहे हैं तो प्रदूषित हवा के लंबे संपर्क में रहने के कारण टीबी, अस्थमा, सीओपीडी जैसे रोग उन्हें कमजोर कर रहे हैं।
कोयला और बिजली से जुड़ी परियोजनाओं ने स्थानीय निवासियों के जीवन में खुशहाली का उजाला भरने के वादे तो खूब किए थे, लेकिन खुद के स्थापित होने के बाद लोगों को उनके हाल पर छोड़ दिया है। उनके हक-हकूक की बातें करने वालों ने भी निजी फायदों के लिए कायदों से समझौता कर लिया है। नतीजा देश के सर्वाधित प्रदूषित इलाकों में शामिल ऊर्जांचल के लोग हर रोज प्रदूषण का जहर हलक से नीचे उतारने को मजबूर हैं।
केस नं.- 1
अभी ज्यादा दिन नहीं बीते कि डिबुलगंज निवासी 50 वर्षीय पार्वती देवी सहजता से कोई भी कार्य कर लेती थीं। किंतु अचानक उनके घुटने में दर्द उठा। देखते ही देखते उन्हें चलने-फरने में भी परेशानी होने लगी। पार्वती देवी ने बताया कि काफी दवा कराने के बाद उनकी समस्या दूर नहीं हुई। आज वे दर्द के मारे किसी प्रकार लंगडाकर चलते हुए अपना कार्य निष्पादित करती हैं।
केस नं.-2
इसी प्रकार लोझरा निवासी सेवानिवृत्त अनपरा परियोजना कर्मी रामदुलारे पनिका बिल्कुल स्वस्थ रहते हुए अपनी ड्यूटी कर रहे थे। तभी अचानक सेवानिवृत्त होने के छह वर्ष पूर्व ही वे पैरालिसिस का शिकार हो गये। काफी दवा कराने के बाद भी काई आराम नहीं मिला। अंत में उनकी शेष ड्यूटी उनके पुत्र को करनी पडी। आज भी वे दूर तक आने-जाने में सक्षम नहीं हो सके हैं।
प्रदूषण के स्तर...
हवा: परिक्षेत्र में 24 घंटे छाए रहने वाले कोल डस्ट व फ्लाई ऐश के कारण नागरिकों का सांस लेना भी भारी हो रहा है। आलम यह है कि सिंगरौली व अनपरा परिक्षेत्र की एअर क्वालिटी अक्सर 200 से अधिक ही बनी रहती है। हवा में कार्बन, सल्फर, लेड आदि विषाक्त तत्वों की विद्यमानता के कारण क्षेत्र में सांस से जुड़ी बीमारियां तेजी से नागरिकों को अपना शिकार बना रही हैं।
पानी: औद्योगिक व रिहायशी अपशिष्टों के कारण पूरे क्षेत्र का भूगर्भ जलस्रोत जहरीला हो चुका है। एनजीटी के निर्देश पर कई ख्यातिलब्ध संस्थाओं ने क्षेत्र में पानी की जांच की है। पानी में मरकरी, पारा, कैडमियम, आर्सेनिक, फ्लोराइड, कार्बन आदि रसायन मानक से कई गुना अधिक पाए गए हैं। हजारों लोग इस जल का सेवन करने से लाइलाज बीमारियों का शिकार हो रहे हैं।
मिट्टी: विद्युत परियोजना के अपने ऐश पांड को मानक के अनुरूप दुरुस्त नहीं करने के कारण क्षेत्र में कई स्थानों पर बिखरी राख सहज ही देखी जा सकती है। इससे कृषि योग्य भूमि की उर्वरा शक्ति नष्ट हो रही है। वहीं फसलों में भी जहरीले रसायन प्रवेश कर रहे हैं। इसका नागरिकों के स्वास्थ्य पर व्यापक प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है।
खुले में कोयले व राख के परिवहन से बढ़ा प्रदूषण
परिक्षेत्र में प्रदूषण बढ़ने का मुख्य कारण है खुले में कोयले व राख का परिवहन। पिछले एक वर्ष से हाईवा पर भी राख का परिवहन शुरू कर दिया गया है। हालांकि इस संबंध में एनजीटी ने बाकायदा गाइडलाइन निर्धारित की है। इसके बावजूद मानक का अनुपालन नहीं हो रहा। जल प्रदूषण का कारण परिक्षेत्र स्थित रिहंद डैम सहित नदी-नालों में राख सहित अन्य अपशिष्टों का सीधे प्रवाह है। वैसे तो अपशिष्टों के निस्तारण के लिए कई मानक तय हैं, लेकिन ज्यादातर परियोजनाओं में इसकी अवहेलना हो रही है।
यह हो रही बीमारियां
भीषण जल प्रदूषण के कारण रेणुकापार इलाके में कुपोषण व अपंगता संबंधी मामले बढ़े हैं। क्षेत्र के 70 प्रतिशत से अधिक महिलाएं व बच्चे इस बीमारी से ग्रसित हैं। साथ ही त्वचा संबंधी मामले भी निरंतर बढ़ रहे हैं। कम उम्र में ही दांत टूटना व असमय बाल सफेद होने के मामले भी लगातार बढ़ रहे हैं। टीबी, कैंसर, अस्थमा, कुपोषण, हड्डियों का कमजोर होना, अपंगता आदि बीमारियां भी हो रही हैं। रिहंद के किनारे बसे मकरा, सिंदूर, बेलवादह जैसे गांव मच्छरजनित बीमारियों से जूझते हैं। हर साल कई जान भी जाती है।
जिम्मेदार कौन...
ऊर्जांचल में जानलेवा स्तर तक पहुंच चुके प्रदूषण के लिए विद्युत व कोल परियोजना प्रबंधकों के साथ ही प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और जिला प्रशासन कम जिम्मेदार नहीं है। उनकी ओर से अपनी जिम्मेदारियों का भली-भांति निर्वहन नहीं किया। रही-सही कसर कोयला व राख परिवहन में लगे वाहनों की जांच में उदासीनता बरतकर परिवहन विभाग ने पूरी कर दी।
यह हो सकता है उपाय:
जानकारों का मानना है कि प्रदूषण पर प्रभावी रोक का सबसे सहज उपाय है एनजीटी के दिशा-निर्देशों का सख्ती के साथ अनुपालन सुनिश्चित कराने की। ऐसा होने पर भी सतह तक जड़ जमा चुके प्रदूषण को समाप्त तो नहीं किया जा सकता, मगर भावी पीढी के लिए उस पर अंकुश अवश्य लगाया जा सकता है।
22 हजार मेगावाट बनती है बिजली
रेणु नदी पर स्थापित पं. गोविंद बल्लभ पंत सागर रिहंद बांध की गिनती एशिया के बड़े बांधों में होती है। इस बांध पर आधारित करीब 22 हजार मेगावाट बिजली पैदा करने वाली तापीय परियोजनाएं ऊर्जांचल में स्थापित हैं।
अभी भी रेणु व सोन नदी में गिर रही ओबरा की राख
सोनभद्र। क्षेत्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अधिकारियों के अनुसार रिहंद डैम में राख के प्रवाह को तो लगभग रुकवा दिया गया है। किंतु निरीक्षण के दौरान अभी भी ओबरा परियोजना की राख का प्रवाह रेणु व सोन नदी में होते पाया गया है। इस संबंध में जिला पर्यावरणीय समिति की बैठक सहित अन्य मंचों पर भी कड़ी आपत्ति जताई गई है।।
यहां औसत उम्र है 65-70 वर्ष
डिबुलगंज स्थित संयुक्त चिकित्सालय के मुख्य चिकित्सक डॉ. बीके सिंह ने बताया कि ऊर्जांचल क्षेत्र में पहुंच कर पांच साल तक जीवन बिताने के बाद यहां के लोगों की उम्र तेजी से घटने लगती है। पानी और हवा में व्याप्त प्रदूषण के कारण लोगों को तरह तरह के रोग हो रहे हैं।
इसमें दमा, टीबी, बीपी, शुगर, एलर्जी, चर्मरोग प्रमुख हैं। इन बीमारियों के बढ़ने का खतरा यहां अधिक है। पानी की गंदगी के कारण शरीर के भीतर और हवा की गंदगी के कारण शरीर के ऊपरी सतह को पूरी तरह से प्रदूषण बर्बाद कर रहा है। जिससे यहां लोगों को 70 वर्ष से अधिक जीवन जीने के लिए काफी संघर्ष करना पड़ता है।
एनजीटी के निर्देश पर प्रत्येक तीन महीने में सीपीसीबी, क्षेत्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड व जिला प्रशासन की संयुक्त टीम परियोजनाओं में प्रदूूषण मानकों व क्रियाकलापों का निरीक्षण करती है। कई बार परियोजनाओं पर मोटा जुर्माना भी लगाया गया है। जल स्रोतों को हरहाल में प्रदूषण से बचाने की हिदायत भी दी जाती है। -डॉ. टीएन सिंह, क्षेत्रीय प्रदूषण नियंत्रण अधिकारी सोनभद्र।