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Sonebhadra News: मैं रिहंद हूं... जहां डूबा सिंगरौली स्टेट, वहीं से रोशन हो रहा देश

Tue, 06 Jan 2026 12:56 AM IST
Varanasi Bureau वाराणसी ब्यूरो
Updated Tue, 06 Jan 2026 12:56 AM IST
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I am Rihand... where Singrauli State drowned, from there the country is being illuminated
यूपी-एमपी की सीमा पर स्थित रिहंद बांध सिर्फ एक बांध नहीं है। यह वह ग्रोथ इंजन है, जिसने आजादी के बाद देश की अर्थव्यवस्था को रफ्तार दी। यूपी-एमपी की तकदीर बदल दी।
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आज अपने निर्माण को 63 साल पूरा करने वाला यह कंक्रीट ग्रेविटी बांध इंजीनियरिंग का अनूठा उदाहरण है। पं. गोविंद बल्लभ पंत के नाम पर निर्मित इसका जलाशय एशिया की सबसे बड़ी मानव निर्मित झील है तो देश में बिजली उत्पादन का सबसे बड़ा स्रोत भी।
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करीब 466 वर्ग किमी क्षेत्रफल वाले इस जलाशय में तत्कालीन सिंगरौली स्टेट और उसके 81 गांव डूब गए थे। तब 81 हजार आबादी सीधे तौर पर विस्थापित हुई थी। इस बांध ने यूपी-एमपी के सीमावर्ती क्षेत्र के भौगोलिक और सामाजिक परिवेश को पूरी तरह बदल दिया।
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जानें रिहंद बांध की पूरी कहानी, कैसे बना देश का सबसे बड़ा बांध
20 साल सर्वे के बाद बंद हो गई फाइल, फिर 9 साल में हुआ निर्माण
रिहंद परियोजना की परिकल्पना अंग्रेजों ने की थी, जिसे मूर्त रूप आजादी के बाद भारत सरकार ने दिया। अंग्रेजों ने वर्ष 1914 से इस क्षेत्र में सर्वे शुरू किया। पहाड़ी नदी-नालों के कारण हर साल बाढ़ और गर्मी में सूखे से जूझने वाले इस क्षेत्र में जल प्रबंधन के लिए धंधरौल जैसा बांध बनाने की जरूरत महसूस हुई। करीब 20 साल तक सर्वे के बाद खाका खींचा गया, लेकिन कार्य की जटिलता और राजनीतिक उठापटक के चलते 1934 के बाद यह ठंडे बस्ते में चला गया। आजादी के बाद देश की अर्थव्यवस्था को मजबूत करने और कृषि क्षेत्र में भारत को आत्मनिर्भर बनाने के लिए इस परियोजना पर काम शुरू हुआ। तत्कालीन प्रधानमंत्री पं. जवाहर लाल नेहरु ने 13 जुलाई 1954 को पिपरी में रिहंद बांध की नींव रखी और महज नौ साल में ही देश का यह सबसे ऊंचा बांध (तत्कालीन) बनकर तैयार हुआ। छह जनवरी 1963 में इसका लोकार्पण हुआ। इंग्लिश इलेक्टि्रक फ्रांसिस कंपनी ने इसका निर्माण किया। बांध में लगे टरबाइन छतरी के आकार के हैं।

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बांध के लिए बनी यूपी की पहली सीमेंट फैक्ट्री, पत्थरों को पीसकर निकाला बालू
रिहंद बांध के लिए यहां की भौगोलिक स्थिति बेहद अनुकूल रही है। बांध के दो तरफ ऊंची पहाड़ियों से बंधा है। सिर्फ सामने की तरफ कंक्रीट की मजबूत दीवार खड़ी कर बांध निर्माण पूरा हुआ। यह तब की सबसे बड़ी परियोजना थी। इस बांध में सीमेंट की खपत को देखते हुए चुर्क में सीमेंट फैक्ट्री की स्थापना की गई। यह यूपी की पहली राजकीय सीमेंट फैक्ट्री थी। नदियों में खनन की बजाए बांध के ही पिछले हिस्से में मौजूद एक खास पहाड़ी के पत्थरों को पिसकर बालू बनाया गया। इस पहाड़ी के पत्थर ग्रेनाइट जैसे हैं। इनसे निकली बालू की उच्च गुणवत्ता ने बांध को मजबूती दी।

रिहंद नदी नहीं, परियोजना का नाम
रिहंद बांध के बारे में लोग यही मानते हैं कि रिहंद नदी पर होने के कारण ही इसका यह नाम पड़ा है। वास्तव में रिहंद पूरी परियोजना का संक्षिप्त नाम है। इसका मतलब रिजर्वायर फॉर एरिगेशन, हाइड्रोपावर एंड नेशनल डेवलपमेंट यानि ऐसा जलाशय जो सिंचाई, जल विद्युत और राष्ट्रीय विकास का आधार है। इसे छत्तीसगढ़ के सरगुजा से निकली रेड़, मोरना, मोहन जैसी अन्य पहाड़ी नदियों पर बनाया गया है। इसमें सबसे बड़ी नदी रेड़ है। जिस स्थान पर बांध का निर्माण हुआ, उसे पिपरी नाम दिया गया। पिपरी का अर्थ भी प्रोजेक्ट इनिशियल प्वाइंट ऑफ रिहंद इंस्टालेशन यानि रिहंद परियोजना का शुरुआती आधार बिंदू है। इसी तरह रिहंद के उत्तर में स्थित अनपरा और बाहरी क्षेत्र में स्थित ओबरा का भी नामकरण है।

सबसे सस्ती बिजली, सिर्फ 60 पैसे लागत
पिपरी में रिहंद बांध पर 300 मेगावाट की जल विद्युत परियोजना है। इसमें 50 मेगावाट की छह टरबाइन लगी हैं। इससे बनने वाली बिजली की कुल लागत 60-70 पैसा प्रति यूनिट है, जो अन्य इकाइयों की अपेक्षा सबसे सस्ती है। बांध के चारों तरफ एनटीपीसी, राज्य उत्पादन निगम और निजी क्षेत्र की तापीय परियोजनाएं स्थापित हैं, जिनकी क्षमता करीब 22 हजार मेगावाट हैं। बिजली उत्पादन करने वाली चिमनियों को ठंडा रखने के लिए इन्हें रिहंद बांध के जलाशय से ही पानी मिलता है। इसके लिए ही जलाशय में पानी के स्तर को हमेशा मेंटेंन रखा जाता है।


बांध के बाद नए उद्योग लगे, बना देश का सबसे बड़ा बिजली घर
रिहंद बांध की स्थापना ने देश की अर्थव्यवस्था को गति दी। बिजली की सुलभता हुई तो नए उद्योग लगने शुरू हुए। बिड़ला समूह ने बांध के पास ही हिंडाल्को की स्थापना की, जो एशिया का सबसे बड़ा एल्यूमिनियम कारखाना रहा है। बिड़ला कार्बन, ग्रासिम केमिकल्स जैसे कई अन्य उद्योग लगे। रेणुकूट भी इसी औद्योगिक विकास की देन है। राज्य उत्पादन निगम ने अनपरा में बिजली घर स्थापित किया तो एनटीपीसी ने यूपी के अंतिम छोर पर कोटा गांव में 2000 मेगावाट क्षमता वाले अपने पहले पावर प्लांट सिंगरौली सुपर थर्मल पावर स्टेशन (शक्तिनगर) की स्थापना की। बाद में बांध के दूसरे छोर पर बीजपुर में 3000 मेगावाट की एनटीपीसी रिहंद और शक्तिनगर से सटे मप्र की सीमा में भारत के सबसे बड़े पावर प्लांट 4760 मेगावाट क्षमता वाले एनटीपीसी विंध्याचल (विंध्यनगर) की स्थापना की गई। इन पावर प्लांटों की बदौलत ही सोनभद्र-सिंगरौली को देश की ऊर्जा राजधानी के रूप में पहचान मिली है।

रिहंद बांध पर संक्षिप्त नजर
स्थापना: 13 जुलाई 1954
लोकार्पण: 06 जनवरी 1962

बांध की ऊंचाई: 91.44 मीटर
बांध की लंबाई: 934.20 मीटर
जलाशय का क्षेत्रफल: 466 वर्ग किमी
कैचमेंट एरिया: 13333 वर्ग किमी
समुद्र तल से ऊंचाई: 880 फीट (अब 870)
बिजली उत्पादन क्षमता: कुल 300 मेगावाट
निर्माण कंपनी: इंग्लिश इलेक्टि्रक फ्रांसिस
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