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Sonebhadra News: कमजोर तारों पर चल रहे हैवी उपकरण, विद्युत सुरक्षा की कभी नहीं हुई ऑडिट
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सोनभद्र। झांसी जैसी घटना कभी सोनभद्र में भी हो सकती है। यहां के अस्पतालों, स्कूलों और अन्य व्यावसायिक प्रतिष्ठानों में शार्ट सर्किट से बचाव के कोई इंतजाम नहीं है। किसी भी संस्थान ने विद्युत सुरक्षा को लेकर न कभी ऑडिट कराई है और न ही एनओसी ली है। कमजोर तारों पर एसी, फ्रिज, हीटर जैसे हैवी उपकरण चलाए जा रहे हैं। संस्थानों में दिखावे के लिए अग्निशमन उपकरण टांगे गए हैं, मगर इनकी क्रियाशीलता भी भगवान भरोसे है।
जिला अस्पताल परिसर में आग से बचाव के लिए अग्निशमन यंत्र की व्यवस्था है। तीन मंजिला भवन में कुल 28 अग्निशमन यंत्र लगाए गए हैं। कई अहम स्थानों पर कोई फायर एक्सटिंग्यूसर नहीं है। एल-2 अस्पताल में आग से बचाव के लिए फायर सिस्टम बनाया गया है, लेकिन हौज रील ही पाइप से कनेक्ट नहीं है।
फायर अलार्म भी चालू है। जिला अस्पताल परिसर में जगह-जगह कटे तारों के सहारे बिजली दौड़ रही है। कई जगह सामान्य स्वीच पर हैवी उपकरण जलाए जा रहे हैं। इससे शार्ट सर्किट का खतरा है। एसएनसीयू, आईसीयू वार्ड में बेड की क्षमता बढ़ने के साथ नई मशीनें भी लगी हैं, लेकिन उन तक बिजली पुरानी वायरिंग के सहारे ही पहुंच रही है।
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सभी केबल ओवरलोड से जूझ रहे हैं। एमसीएच विंग में भी अग्नि सुरक्षा से बचाव में लापरवाही जारी है। करीब चार माह पहले अग्निशमन विभाग ने जिला अस्पताल, एमसीएच विंग, घोरावल, म्योरपुर, डिबुलगंज सहित अन्य प्रमुख सरकारी अस्पतालों में फायर ऑडिट की थी, तब कई खामियां सामने आई थीं।
कई जगह फायर अलार्म बंद मिला था तो कहीं मोटर खराब था। अरसे से फायर सिस्टम की टेस्टिंग भी नहीं हुई थी। इस आधार पर संबंधितों को नोटिस भी जारी किया गया, बावजूद व्यवस्था में कोई सुधार नहीं। उधर, बिजली सुरक्षा के लिए ऑडिट में भी सरकारी अस्पतालों में कम क्षमता वाले तारों पर हैवी लोड के उपयोग का तथ्य सामने आया, मगर इसमें भी कोई सुधार नहीं कराया गया।
135 अस्पताल, सिर्फ 80 को फायर एनओसी, विद्युत सुरक्षा कहीं नहीं
स्वास्थ्य विभाग के आंकड़ों पर गौर करें तो जिले में पंजीकृत निजी अस्पताल, पैथालॉजी केंद्रों की संख्या करीब 135 है। इसमें से सिर्फ 80 को ही अग्निशमन विभाग से एनओसी मिली है। इसमें भी कइयों ने नवीनीकरण नहीं कराया है। किसी भी अस्पताल या पैथालॉजी की ओर से विद्युत सुरक्षा को लेकर न कोई ऑडिट कराई गई और न ही एनओसी ली गई है, जबकि आग लगने का सबसे ज्यादा खतर इलेक्ट्रानिक उपकरणों से होता है। सिर्फ अस्पताल ही नहीं स्कूल, होटल और अन्य व्यावसायिक प्रतिष्ठान में भी विद्युत सुरक्षा की एनओसी नहीं है।
विभाग की ओर से समय-समय पर अभियान चलाकर फायर ऑडिट के बाद कमियों पर संबंधितों को नोटिस जारी किया जाता है। इसके अलावा आग से बचाव और आग लगने पर बुझाने का प्रशिक्षण भी दिया जाता है। जिन अस्पतालों ने एनओसी नहीं ली है, उनके बारे में सीएमओ को पत्र भेजा गया है। आगे भी अभियान जारी रहेगा। - श्रीराम साहनी, मुख्य अग्निशमन अधिकारी।
सोनभद्र के किसी भी निजी अस्पताल या संस्थान ने विद्युत सुरक्षा विभाग ने एनओसी नहीं ली है और न ही ऑडिट कराई है। कुछ सरकारी अस्पतालों में जरूरतों के अनुसार ऑडिट कराई जाती है, लेकिन बताए गए सुझावों के अनुपालन के संबंध में कोई एनओसी जारी नहीं है। शार्ट सर्किट का कारण कम क्षमता वाले तारों, स्वीच आदि का इस्तेमाल है। -दिनेश मौर्य, विद्युत सुरक्षा अधिकारी।
हाल ही में जिला अस्पताल परिसर में लगे सभी अग्निशमन यंत्रों का परीक्षण कराया गया था। तीन उपकरणों की उपयोग तिथि खत्म होने के कारण उसे बदला गया है। भवन व वार्डों में लगे इमरजेंसी गेट को भी दुरुस्त कराया गया है, ताकि आपात स्थिति में उसका उपयोग किया जा सके। - डॉ. बी. सागर, सीएमएस, जिला अस्पताल।
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जिला अस्पताल परिसर में आग से बचाव के लिए अग्निशमन यंत्र की व्यवस्था है। तीन मंजिला भवन में कुल 28 अग्निशमन यंत्र लगाए गए हैं। कई अहम स्थानों पर कोई फायर एक्सटिंग्यूसर नहीं है। एल-2 अस्पताल में आग से बचाव के लिए फायर सिस्टम बनाया गया है, लेकिन हौज रील ही पाइप से कनेक्ट नहीं है।
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फायर अलार्म भी चालू है। जिला अस्पताल परिसर में जगह-जगह कटे तारों के सहारे बिजली दौड़ रही है। कई जगह सामान्य स्वीच पर हैवी उपकरण जलाए जा रहे हैं। इससे शार्ट सर्किट का खतरा है। एसएनसीयू, आईसीयू वार्ड में बेड की क्षमता बढ़ने के साथ नई मशीनें भी लगी हैं, लेकिन उन तक बिजली पुरानी वायरिंग के सहारे ही पहुंच रही है।
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सभी केबल ओवरलोड से जूझ रहे हैं। एमसीएच विंग में भी अग्नि सुरक्षा से बचाव में लापरवाही जारी है। करीब चार माह पहले अग्निशमन विभाग ने जिला अस्पताल, एमसीएच विंग, घोरावल, म्योरपुर, डिबुलगंज सहित अन्य प्रमुख सरकारी अस्पतालों में फायर ऑडिट की थी, तब कई खामियां सामने आई थीं।
कई जगह फायर अलार्म बंद मिला था तो कहीं मोटर खराब था। अरसे से फायर सिस्टम की टेस्टिंग भी नहीं हुई थी। इस आधार पर संबंधितों को नोटिस भी जारी किया गया, बावजूद व्यवस्था में कोई सुधार नहीं। उधर, बिजली सुरक्षा के लिए ऑडिट में भी सरकारी अस्पतालों में कम क्षमता वाले तारों पर हैवी लोड के उपयोग का तथ्य सामने आया, मगर इसमें भी कोई सुधार नहीं कराया गया।
135 अस्पताल, सिर्फ 80 को फायर एनओसी, विद्युत सुरक्षा कहीं नहीं
स्वास्थ्य विभाग के आंकड़ों पर गौर करें तो जिले में पंजीकृत निजी अस्पताल, पैथालॉजी केंद्रों की संख्या करीब 135 है। इसमें से सिर्फ 80 को ही अग्निशमन विभाग से एनओसी मिली है। इसमें भी कइयों ने नवीनीकरण नहीं कराया है। किसी भी अस्पताल या पैथालॉजी की ओर से विद्युत सुरक्षा को लेकर न कोई ऑडिट कराई गई और न ही एनओसी ली गई है, जबकि आग लगने का सबसे ज्यादा खतर इलेक्ट्रानिक उपकरणों से होता है। सिर्फ अस्पताल ही नहीं स्कूल, होटल और अन्य व्यावसायिक प्रतिष्ठान में भी विद्युत सुरक्षा की एनओसी नहीं है।
विभाग की ओर से समय-समय पर अभियान चलाकर फायर ऑडिट के बाद कमियों पर संबंधितों को नोटिस जारी किया जाता है। इसके अलावा आग से बचाव और आग लगने पर बुझाने का प्रशिक्षण भी दिया जाता है। जिन अस्पतालों ने एनओसी नहीं ली है, उनके बारे में सीएमओ को पत्र भेजा गया है। आगे भी अभियान जारी रहेगा। - श्रीराम साहनी, मुख्य अग्निशमन अधिकारी।
सोनभद्र के किसी भी निजी अस्पताल या संस्थान ने विद्युत सुरक्षा विभाग ने एनओसी नहीं ली है और न ही ऑडिट कराई है। कुछ सरकारी अस्पतालों में जरूरतों के अनुसार ऑडिट कराई जाती है, लेकिन बताए गए सुझावों के अनुपालन के संबंध में कोई एनओसी जारी नहीं है। शार्ट सर्किट का कारण कम क्षमता वाले तारों, स्वीच आदि का इस्तेमाल है। -दिनेश मौर्य, विद्युत सुरक्षा अधिकारी।
हाल ही में जिला अस्पताल परिसर में लगे सभी अग्निशमन यंत्रों का परीक्षण कराया गया था। तीन उपकरणों की उपयोग तिथि खत्म होने के कारण उसे बदला गया है। भवन व वार्डों में लगे इमरजेंसी गेट को भी दुरुस्त कराया गया है, ताकि आपात स्थिति में उसका उपयोग किया जा सके। - डॉ. बी. सागर, सीएमएस, जिला अस्पताल।