वन एवं पर्यावरण मंत्रालय की रिपोर्ट: सोनभद्र में खत्म हो रहे जंगल, दो साल में 103 वर्ग किमी की कमी
यूपी में सर्वाधिक वन क्षेत्र वाला जिला सोनभद्र में वन कटान व वनों पर हो रहे अतिक्रमण के चलते जंगल का दायरा सिकुड़ता जा रहा है। पूरे प्रदेश में जिले का सर्वाधिक वन क्षेत्र पिछले दो सालों में घटा है।
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वन माफिया की बुरी नजर सोनभद्र के जंगलों को लग गई है। कहां एक तरफ तो अभियान चलाकर हर साल लाखों पौधे लगाए जा रहे हैं तो दूसरी तरफ हरे पेड़ों की कटान भी धड़ल्ले से जारी है। हाल यह है कि पिछले दो वर्षों के दौरान जिले में करीब 103 वर्ग किमी वन क्षेत्र कम हो गया है। यह जंगल कहां गए किसी को नहीं पता। वन विभाग तेजी से होते नगरीकरण और विकास की दलील दे रहा है तो जानकार इसे वन माफिया की कारस्तानी बता रहे हैं। दोनों ही हालत में वन क्षेत्र का कम होना जिलेवासियों के लिए चिंताजनक है।
सोनभद्र की पहचान शुरू से ही घने जंगलों से रही है। विशिष्ट पहचान वाले यह जंगल अपने आप में खास हैं। वृहद जंगलों के कारण ही सोनभद्र क्षेत्रफल के लिहाज से प्रदेश का दूसरा सबसे बड़ा जिला है। यह प्रदेश का पहला जिला भी है जहां तीन से अधिक वन प्रभाग का कार्य क्षेत्र है।
वन सर्वे की रिपोर्ट में यह चौंकाने वाला खुलासा
राबर्ट्सगंज, ओबरा, रेणुकूट में अलग डीएफओ हैं तो कैमूर वन्य जीव प्रभाग का आधा क्षेत्र मिर्जापुर में भी है। साढ़े तीन वन प्रभाग होने के बावजूद यहां जंगल सुरक्षित न रहना चिंताजनक है। केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय की ओर से जारी भारतीय वन सर्वे की रिपोर्ट में यह चौंकाने वाला खुलासा हुआ है।
रिपोर्ट के अनुसार करीब 6905 वर्ग किमी के भौगोलिक क्षेत्रफल वाले इस जिले में वर्ष 2019 में वन क्षेत्र का दायरा 2540.29 वर्ग किमी था। वर्ष 2021 के सर्वे में यह घटकर 2436.75 वर्ग किमी रह गया है। इस तरह यहां करीब 103.54 वर्ग किमी वन क्षेत्र में कमी आई है। इसमें भी 138.32 वर्ग किमी में घने जंगल हैं जबकि 1357.81 वर्ग किमी में खुला वन क्षेत्र है। शेष 940 वर्ग किमी से अधिक के दायरे में मध्यम श्रेणी का वन है।
वन घटने के कई कारण
राबर्ट्सगंज डीएफओ संजीव सिंह ने कहा कि विस्तृत रिपोर्ट मंगाई जा रही है। कहां-किस क्षेत्र में वन कम हुए हैं, इसका अध्ययन करने के बाद ही कुछ कहा जा सकता है। वन घटने के कई कारण हो सकते हैं। जिले के विभिन्न क्षेत्रों में विकास कार्य चल रहे हैं। इसके लिए भी कई बार वनों को काटना पड़ता है। बदले में नए पौधे भी लगाए जाते हैं, मगर उनके फिर से पेड़ बनने में समय लगता है। फिलहाल रिपोर्ट आने पर ही कुछ स्पष्ट होगा।
खूब लगे पेड़, फिर भी घट गए जंगल
पर्यावरण संरक्षण के लिए पिछले कुछ वर्षों से सरकार लगातार सघन पौधरोपण अभियान चला रही है। जून-जुलाई के महीने में वन महोत्सव चलाकर पौधे रोपे जा रहे हैं। गत तीन वर्षों में एक करोड़ से अधिक पौधे लगाए गए हैं। दो वर्षों में इन पौधों को पेड़ बनना था। इसके बावजूद वन क्षेत्र में कमी इस अभियान की उपयोगिता पर सवाल खड़े कर रही है। वनों की सुरक्षा में कार्य करने वाले जिम्मेदारों की कार्यप्रणाली पर भी प्रश्न चिह्न लग रहा है। फिलहाल अधिकारी कारण तलाशने में जुटे हैं।
कोरोना काल में वनों ने समझाई उपयोगिता
गत वर्ष कोरोना महामारी की दूसरी लहर के दौरान ऑक्सीजन के लिए मची मारामारी ने पौधों की उपयोगिता समझाई थी। हर कोई जागरूक होकर पौधे लगाने और पेड़ बचाने का संदेश देता रहा। आसपास का वातावरण हरा-भरा बनाने पर जोर रहा। बड़ी संख्या में लोगों ने खुद से भी पौधे लगाए। इसके बाद भी वनों की संख्या घटती जा रही है।