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Sonebhadra News: 75 साल बाद भी आदिवासियों के लिए अधूरी है आजादी...
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सोनभद्र। पूरा देश आज स्वतंत्रता दिवस मना रहा है। आजादी को 76 साल पूरे हो चुके हैं। गुलामी की बेड़ियों से मुक्ति पाने के बाद देश ने हर क्षेत्र में उत्तरोत्तर प्रगति की है। देश का हर हिस्सा विकास की इस दौड़ में कदम से कदम मिलाकर आगे बढ़ रहा है, मगर सोनांचल का आदिवासी क्षेत्र अब भी पूर्ण आजादी की कसक महसूस कर रहा है।
शिक्षा, स्वास्थ्य, शुद्ध पेयजल जैसी बुनियादी सुविधाएं भी उन्हें मयस्सर नहीं हो पाई हैं। कई गांवों में आज भी बिजली नहीं पहुंची है। इन इलाकाें में आदिवासी परिवारों के बच्चों के पढ़ने के लिए न तो अच्छे स्कूल हैं और न ही बेहतर उपचार के लिए संसाधनयुक्त अस्पताल। चांद की दूरी नापने वाले दौर में यहां लोग अब भी कच्ची पगडंडियों से उबर नहीं पाए हैं। चोपन, म्योरपुर, कोन, नगवां, बभनी और दुद्धी ब्लाॅक के यह आदिवासी इलाके अब भी बुनियादी समस्याओं से आजादी चाह रहे हैं।
पगडंडी पकड़कर आते-जाते हैं लोग
सदर विकासखंड अंतर्गत मारकुंडी ग्राम सभा स्थित अवई राजस्व गांव में आज तक संपर्क मार्ग से अछूता है। गांव के लोग रेलवे लाइन के किनारे से कच्चे रास्ते से आते-जाते हैं। किसी के बीमार होने की दशा में मरीज को खाट पर लादकर करीब एक किमी दूर मुख्य मार्ग तक आना होता है। शशिपाल, अरुण कुमार, अनिल कुमार पांडेय, सुभाष, रमेश, विजय कुमार आदि का कहना है कि कई बार जिम्मेदारों से सड़क के लिए कहा गया, लेकिन किसी ने ध्यान नहीं दिया। कुछ ऐसी ही स्थिति जिला मुख्यालय से छह किमी दूर स्थित गड़ौरा गांव की भी है। गांव तक जाने के लिए अब तक कोई सड़क नहीं बनी है। घोरावल ब्लाक के तिलहर, करमा ब्लाक के सिरसिया जेठी के अलावा चोपन के रेणुकापार और म्योरपुर के कुलडोमरी न्याय पंचायत के कई गांव ऐसी ही समस्या से जूझ रहे हैं।
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चुआंड़ के पानी से बुझती है प्यास
जिले के एक बड़े तबके को आज भी शुद्ध पानी उपलब्ध नहीं है। सुदूर गांवों में लोग कहीं नदी, तालाब का पानी पी रहे हैं तो कहीं चुआंड़ के भराेसे प्यास बुझ रही है। दुद्धी ब्लाॅक के फुलवार ग्राम पंचायत के पानी में फ्लोराइड की अधिकता है। म्योरपुर व कोन ब्लाॅक के भी दर्जनों गांव इस समस्या से जूझ रहे हैं। भूजल में फ्लोराइड की मात्रा अधिक होने से इस पानी के सेवन से लोगाें की हड्डियां कमजोर हो रही हैं। बच्चे बचपन में ही बुढ़ापा जैसी स्थिति से जूझ रहे हैं। टेढ़ी-मेढ़ी हड्डियां, दांतों में पीलापन, शारीरिक अक्षमता जैसी समस्या इन गांवों में आम है। यहीं नहीं पानी में आर्सेनिक व आयरन की अधिकता भी बनी हुई है।
बिजली की चमक देखने को तरस रही आंखें
बिहार सीमा पर स्थित नगवां ब्लाॅक के चौरा गांव में बिजली नहीं पहुंची है। कई अन्य ऐसे गांव भी हैं, जहां तार और पोल तो पहुंच गए मगर बिजली का पता नहीं है। चेरुई, मरकुड़ी जैसे गांवों में बस कहने के लिए ही बिजली है। ग्रामीणों को उसका लाभ नहीं मिल रहा। आदिवासी बहुल इलाकों में बिजली की यह स्थिति तब है, जब जिले में ही बनने वाली करीब 20 हजार मेगावाट बिजली से देश के दूसरे हिस्से जगमग हैं।
कुपोषण की चपेट में बचपन
सही खान-पान और स्वास्थ्य के प्रति जागरुकता के अभाव में नौनिहाल कुपोषण की चपेट में आ रहे हैं। जिले में करीब दो हजार बच्चे अति कुपोषित और इससे कई गुना कुपोषित श्रेणी में है। इन बच्चों को सामान्य श्रेणी में लाने और स्वास्थ्य पर नियमित निगरानी के लिए जिला अस्पताल, दुद्धी, चोपन सीएचसी में पोषण पुनर्वास केंद्र बनाए गए हैं, मगर इनमें बच्चों को भर्ती करने की रफ्तार बेहद वासुस्त है। कई गांवों में नए आंगनबाड़ी केंद्र बनाए गए। केंद्रों को जनप्रतिनिधियों, अधिकारियों को गोद दिया गया, जिससे वह एक केंद्र के बच्चों की बेहतर निगरानी कर सकें। गोद लेने के बाद अधिकांश जिम्मेदार केंद्रों तक गए ही नहीं।
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शिक्षा, स्वास्थ्य, शुद्ध पेयजल जैसी बुनियादी सुविधाएं भी उन्हें मयस्सर नहीं हो पाई हैं। कई गांवों में आज भी बिजली नहीं पहुंची है। इन इलाकाें में आदिवासी परिवारों के बच्चों के पढ़ने के लिए न तो अच्छे स्कूल हैं और न ही बेहतर उपचार के लिए संसाधनयुक्त अस्पताल। चांद की दूरी नापने वाले दौर में यहां लोग अब भी कच्ची पगडंडियों से उबर नहीं पाए हैं। चोपन, म्योरपुर, कोन, नगवां, बभनी और दुद्धी ब्लाॅक के यह आदिवासी इलाके अब भी बुनियादी समस्याओं से आजादी चाह रहे हैं।
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पगडंडी पकड़कर आते-जाते हैं लोग
सदर विकासखंड अंतर्गत मारकुंडी ग्राम सभा स्थित अवई राजस्व गांव में आज तक संपर्क मार्ग से अछूता है। गांव के लोग रेलवे लाइन के किनारे से कच्चे रास्ते से आते-जाते हैं। किसी के बीमार होने की दशा में मरीज को खाट पर लादकर करीब एक किमी दूर मुख्य मार्ग तक आना होता है। शशिपाल, अरुण कुमार, अनिल कुमार पांडेय, सुभाष, रमेश, विजय कुमार आदि का कहना है कि कई बार जिम्मेदारों से सड़क के लिए कहा गया, लेकिन किसी ने ध्यान नहीं दिया। कुछ ऐसी ही स्थिति जिला मुख्यालय से छह किमी दूर स्थित गड़ौरा गांव की भी है। गांव तक जाने के लिए अब तक कोई सड़क नहीं बनी है। घोरावल ब्लाक के तिलहर, करमा ब्लाक के सिरसिया जेठी के अलावा चोपन के रेणुकापार और म्योरपुर के कुलडोमरी न्याय पंचायत के कई गांव ऐसी ही समस्या से जूझ रहे हैं।
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चुआंड़ के पानी से बुझती है प्यास
जिले के एक बड़े तबके को आज भी शुद्ध पानी उपलब्ध नहीं है। सुदूर गांवों में लोग कहीं नदी, तालाब का पानी पी रहे हैं तो कहीं चुआंड़ के भराेसे प्यास बुझ रही है। दुद्धी ब्लाॅक के फुलवार ग्राम पंचायत के पानी में फ्लोराइड की अधिकता है। म्योरपुर व कोन ब्लाॅक के भी दर्जनों गांव इस समस्या से जूझ रहे हैं। भूजल में फ्लोराइड की मात्रा अधिक होने से इस पानी के सेवन से लोगाें की हड्डियां कमजोर हो रही हैं। बच्चे बचपन में ही बुढ़ापा जैसी स्थिति से जूझ रहे हैं। टेढ़ी-मेढ़ी हड्डियां, दांतों में पीलापन, शारीरिक अक्षमता जैसी समस्या इन गांवों में आम है। यहीं नहीं पानी में आर्सेनिक व आयरन की अधिकता भी बनी हुई है।
बिजली की चमक देखने को तरस रही आंखें
बिहार सीमा पर स्थित नगवां ब्लाॅक के चौरा गांव में बिजली नहीं पहुंची है। कई अन्य ऐसे गांव भी हैं, जहां तार और पोल तो पहुंच गए मगर बिजली का पता नहीं है। चेरुई, मरकुड़ी जैसे गांवों में बस कहने के लिए ही बिजली है। ग्रामीणों को उसका लाभ नहीं मिल रहा। आदिवासी बहुल इलाकों में बिजली की यह स्थिति तब है, जब जिले में ही बनने वाली करीब 20 हजार मेगावाट बिजली से देश के दूसरे हिस्से जगमग हैं।
कुपोषण की चपेट में बचपन
सही खान-पान और स्वास्थ्य के प्रति जागरुकता के अभाव में नौनिहाल कुपोषण की चपेट में आ रहे हैं। जिले में करीब दो हजार बच्चे अति कुपोषित और इससे कई गुना कुपोषित श्रेणी में है। इन बच्चों को सामान्य श्रेणी में लाने और स्वास्थ्य पर नियमित निगरानी के लिए जिला अस्पताल, दुद्धी, चोपन सीएचसी में पोषण पुनर्वास केंद्र बनाए गए हैं, मगर इनमें बच्चों को भर्ती करने की रफ्तार बेहद वासुस्त है। कई गांवों में नए आंगनबाड़ी केंद्र बनाए गए। केंद्रों को जनप्रतिनिधियों, अधिकारियों को गोद दिया गया, जिससे वह एक केंद्र के बच्चों की बेहतर निगरानी कर सकें। गोद लेने के बाद अधिकांश जिम्मेदार केंद्रों तक गए ही नहीं।