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अंतर्जनपदीय तबादला न होने से मायूस हुए शिक्षक
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सोनभद्र। यूपी सरकार ने साल के आखिरी दिन शिक्षकों को अंतर्जनपदीय तबादले की सौगात दी लेकिन नीति आयोग के पैरामीटर पर सोनभद्र के अति पिछड़ा जिला होने के नाते यहां के शिक्षकों का तबादला नहीं हो सका। बेसिक शिक्षा की ओर से जारी वेबसाइट पर अपना स्टेटस देखकर शिक्षकों को मायूसी हाथ लगी।
इस संबंध में शिक्षिका रंजना सिंह ने कहा कि सरकार के अंतर्जनपदीय ट्रांसफर में पिछड़े जिले के नाम पर हम सभी शिक्षकों को रोकना न्याय संगत नहीं है। सरकार की इस दोहरी नीति से हम सभी आहत हैं। सरकार की इस नीति की आलोचना करते हैं। यह नियम नौकरी देते समय ही बना देना चाहिए था कि इस जिले से ट्रांसफर नहीं होगा। नौकरी देने के बाद नियम बनाकर हम सभी को रोकना कहीं से भी उचित नहीं है। शिक्षक राजेश अग्रहरि ने कहा कि पिछड़े जिले का दर्द सिर्फ शिक्षक ही क्यों झेलें। अधिकारियों पर भी यह लागू होना चाहिए। इनका भी ट्रांसफर न हो जब तक जिला अगड़ा न हो जाए।
भारती पांडेय ने कहा कि अंतर्जनपदीय स्थानांतरण में पुन: आकांक्षी जिलों के शिक्षकों के साथ अन्याय हुआ। अधिकांश शिक्षक पांच साल और एस्पिरेशनल जिले में दो वर्ष कार्यकाल पूर्ण कर चुके हैं किंतु उनका स्थानांतरण नहीं किया जा रहा है। जबकि अन्य जिलों के उन्हीं के साथी अपने जिलों में पहुंच चुके हैं। आकांक्षी जिले के नाम पर शिक्षकों को मानसिक रूप से प्रताड़ित किया जा रहा है।
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शिक्षक राम गोपाल यादव ने कहा कि स्थानांतरण की बाट जोहते शिक्षकों की उम्मीद पर सरकार ने पानी फेरा है। शिक्षकों को सरकार से ऐसी उम्मीद नहीं थी। इस निर्णय से शिक्षकों में अंसतोष व्याप्त है। सरकार को आकांक्षी जिलों में स्थानांतरण नीति पर संवेदनशील होना चाहिए।
जेबा अफरोज ने कहा कि आकांक्षी जिलों से शिक्षकों के स्थानांतरण कभी नहीं होंगे, ऐसा हमारी ज्वाइनिंग के समय ही बताया गया होता। जब आकांक्षी जिलों से स्थानांतरण नहीं करने थे तो आवेदन ही क्यों मांगे गए। आकांक्षी जिलों की तबादले में उपेक्षा से शिक्षकों का मन दुखी है। बबिता सिंह ने कहा कि क्या पिछड़े जिले में नौकरी करना अभिशाप है। सोचा था 2020 जाते-जाते खुशियां देकर जाएगा, लेकिन सरकार की गलत नीतियों से खुशियां छिन सी गई हैं।
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इस संबंध में शिक्षिका रंजना सिंह ने कहा कि सरकार के अंतर्जनपदीय ट्रांसफर में पिछड़े जिले के नाम पर हम सभी शिक्षकों को रोकना न्याय संगत नहीं है। सरकार की इस दोहरी नीति से हम सभी आहत हैं। सरकार की इस नीति की आलोचना करते हैं। यह नियम नौकरी देते समय ही बना देना चाहिए था कि इस जिले से ट्रांसफर नहीं होगा। नौकरी देने के बाद नियम बनाकर हम सभी को रोकना कहीं से भी उचित नहीं है। शिक्षक राजेश अग्रहरि ने कहा कि पिछड़े जिले का दर्द सिर्फ शिक्षक ही क्यों झेलें। अधिकारियों पर भी यह लागू होना चाहिए। इनका भी ट्रांसफर न हो जब तक जिला अगड़ा न हो जाए।
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भारती पांडेय ने कहा कि अंतर्जनपदीय स्थानांतरण में पुन: आकांक्षी जिलों के शिक्षकों के साथ अन्याय हुआ। अधिकांश शिक्षक पांच साल और एस्पिरेशनल जिले में दो वर्ष कार्यकाल पूर्ण कर चुके हैं किंतु उनका स्थानांतरण नहीं किया जा रहा है। जबकि अन्य जिलों के उन्हीं के साथी अपने जिलों में पहुंच चुके हैं। आकांक्षी जिले के नाम पर शिक्षकों को मानसिक रूप से प्रताड़ित किया जा रहा है।
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शिक्षक राम गोपाल यादव ने कहा कि स्थानांतरण की बाट जोहते शिक्षकों की उम्मीद पर सरकार ने पानी फेरा है। शिक्षकों को सरकार से ऐसी उम्मीद नहीं थी। इस निर्णय से शिक्षकों में अंसतोष व्याप्त है। सरकार को आकांक्षी जिलों में स्थानांतरण नीति पर संवेदनशील होना चाहिए।
जेबा अफरोज ने कहा कि आकांक्षी जिलों से शिक्षकों के स्थानांतरण कभी नहीं होंगे, ऐसा हमारी ज्वाइनिंग के समय ही बताया गया होता। जब आकांक्षी जिलों से स्थानांतरण नहीं करने थे तो आवेदन ही क्यों मांगे गए। आकांक्षी जिलों की तबादले में उपेक्षा से शिक्षकों का मन दुखी है। बबिता सिंह ने कहा कि क्या पिछड़े जिले में नौकरी करना अभिशाप है। सोचा था 2020 जाते-जाते खुशियां देकर जाएगा, लेकिन सरकार की गलत नीतियों से खुशियां छिन सी गई हैं।