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प्रभु तक पहुंच सकते हैं भक्त
अमर उजाला ब्यूरो, सोनभद्र
Updated Mon, 28 Dec 2015 12:13 AM IST
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में गोरखपुर से पधारे मानस मर्मज्ञ पं. हेमंत त्रिपाठी ने कहा कि आर्चा
(प्रभु की अर्चना) के जरिए भक्त भगवान तक पहुंच सकता है। कहा कि आर्चा माने
प्रभु की अर्चना, पूजा-पाठ, श्री राम पंचायतन विग्रहों में श्रद्धा पूर्वक
अनुराग की ही आर्चा अर्चना है।
वाराणसी से पधारे पं. रामेश्वर तिवारी ने माता सीता की खोज में लंका जाते समय हनुमान जी की परीक्षा में सफलता का वृतांत सुनाया। कहा कि सुरसा लोभ का प्रतीक है, क्योंकि जिस तरह से सुरसा ने अपना मुख फैलाया था वैसा सिर्फ लोभ ही बढ़ता है।
ऐसे में जहां भी लोभ का उदय होगा सभी कार्य विफल हो जाएंगे। उन्होंने कहा कि पात्र हमेशा शुद्ध होना चाहिए। जैसे गाय का पवित्र दूध स्वच्छ पात्र में रखा जाए तब किसी प्रकार की विकृति दूध में नहीं आएगी। लेकिन अगर दूध चाहे कितना ही निर्मल क्यों न हो पात्र यदि दूषित है तो दूध का स्वरूप बदल जाता है अर्थात दूध फट जाता है।
अत: श्री रामकथा रूपी दूध हृदय रूपी पवित्र पात्र में ध्यानावस्थित होकर धारण करने पर भक्त का अवश्य कल्याण होगा। कहा कि क्षण मात्र की संगति से सुरसा को मोक्ष प्रदान कर दिया। वाराणसी से ही पधारे पं. अच्युतानंद पाठक ने शिव एवं सती विवाह की चर्चा करते हुए कहा कि शिव एवं विष्णु में कोई अंतर नहीं है।
कहा कि एक-दूसरे के दोनों लोग पुजारी हैं। कभी शिव बड़े तो कभी विष्णु बड़े का स्वरूप ही कुछ ऐसा था। परायण के अनुसार श्री राम जी सेवक बन कर शिव से प्रार्थना कर रहे हैं। कहने का अभिप्राय शिव के हृदय में विष्णु और विष्णु के हृदय में शिव जी का वास होता है।
संचालन डॉ. कृष्णानंद त्रिपाठी ने किया। पं. संतोष कुमार द्विवेदी, शिवकुमार शास्त्री, अनिल पांडेय के जरिए आरती-पूजन कराया गया।
इस मौके पर यजमान सुशील पाठक, शिशु तिवारी, राधेश्याम जालान, घनश्याम सिंघल, कृपा शंकर जायसवाल, संगम गुप्ता, परमेश जैन, अशोक गुप्ता, राजा सिंह, कुसुमाकर श्रीवास्तव, धर्मवीर तिवारी, विमलेश सिंह, रविंद्र पाठक, मृत्युंजय जायसवाल, सुंदर केशरी, महेश दुबे, सुधाकर दुबे आदि मौजूद रहे।
वाराणसी से पधारे पं. रामेश्वर तिवारी ने माता सीता की खोज में लंका जाते समय हनुमान जी की परीक्षा में सफलता का वृतांत सुनाया। कहा कि सुरसा लोभ का प्रतीक है, क्योंकि जिस तरह से सुरसा ने अपना मुख फैलाया था वैसा सिर्फ लोभ ही बढ़ता है।
ऐसे में जहां भी लोभ का उदय होगा सभी कार्य विफल हो जाएंगे। उन्होंने कहा कि पात्र हमेशा शुद्ध होना चाहिए। जैसे गाय का पवित्र दूध स्वच्छ पात्र में रखा जाए तब किसी प्रकार की विकृति दूध में नहीं आएगी। लेकिन अगर दूध चाहे कितना ही निर्मल क्यों न हो पात्र यदि दूषित है तो दूध का स्वरूप बदल जाता है अर्थात दूध फट जाता है।
अत: श्री रामकथा रूपी दूध हृदय रूपी पवित्र पात्र में ध्यानावस्थित होकर धारण करने पर भक्त का अवश्य कल्याण होगा। कहा कि क्षण मात्र की संगति से सुरसा को मोक्ष प्रदान कर दिया। वाराणसी से ही पधारे पं. अच्युतानंद पाठक ने शिव एवं सती विवाह की चर्चा करते हुए कहा कि शिव एवं विष्णु में कोई अंतर नहीं है।
कहा कि एक-दूसरे के दोनों लोग पुजारी हैं। कभी शिव बड़े तो कभी विष्णु बड़े का स्वरूप ही कुछ ऐसा था। परायण के अनुसार श्री राम जी सेवक बन कर शिव से प्रार्थना कर रहे हैं। कहने का अभिप्राय शिव के हृदय में विष्णु और विष्णु के हृदय में शिव जी का वास होता है।
संचालन डॉ. कृष्णानंद त्रिपाठी ने किया। पं. संतोष कुमार द्विवेदी, शिवकुमार शास्त्री, अनिल पांडेय के जरिए आरती-पूजन कराया गया।
इस मौके पर यजमान सुशील पाठक, शिशु तिवारी, राधेश्याम जालान, घनश्याम सिंघल, कृपा शंकर जायसवाल, संगम गुप्ता, परमेश जैन, अशोक गुप्ता, राजा सिंह, कुसुमाकर श्रीवास्तव, धर्मवीर तिवारी, विमलेश सिंह, रविंद्र पाठक, मृत्युंजय जायसवाल, सुंदर केशरी, महेश दुबे, सुधाकर दुबे आदि मौजूद रहे।