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Sonebhadra News: एक वोट से हुई हार-जीत तो सबसे बड़ी जीत भी मिली

Sun, 23 Apr 2023 10:23 PM IST
Varanasi Bureau वाराणसी ब्यूरो
Updated Sun, 23 Apr 2023 10:23 PM IST
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Defeat and victory by one vote, even the biggest victory
रेणुकूट। पं. गोविंद बल्लभ पंत सागर (रिहंद जलाशय) के कारण पूरे देश में मशहूर पिपरी नगर पंचायत का चुनावी इतिहास काफी रोचक है। इस निकाय में सबसे बड़ी जीत का रिकार्ड बना है तो कांटे की लड़ाई में एक वोट से हार-जीत का भी यह गवाह रहा है। बेहद कशमकस वाले चुनावी माहौल को अपने अनुकूल करना प्रत्याशियों के लिए कभी आसान नहीं रहा, मगर जनता की नब्ज पकड़ने वालों के लिए कोई मुश्किल भी नहीं रही। इस बार का चुनावी दंगल भी कुछ ऐसे ही समीकरणों में गूंथता जा रहा है। हालांकि अभी प्रत्याशियों की तस्वीर पूरी तरह साफ न होने से लोग सिर्फ अटकलें ही लगा रहे हैं।
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रिहंद बांध के कारण साठ के दशक में ही पिपरी को नोटिफाइड एरिया घोषित कर दिया गया था, लेकिन निकाय के रुप में यहां पहला चुनाव पंचायती राज कानून लागू होने के बाद वर्ष 1995 में हुआ। इस निकाय की खास बात यह भी रही है कि यहां की सीट का आरक्षण कभी भी एससी या ओबीसी के लिए नहीं हुआ है। शुरू से ही अनारक्षित या सभी वर्ग की महिलाओं के लिए आरक्षित होते आ रहे इस सीट पर सबको चुनाव लड़ने का पूरा मौका मिलता आ रहा है। पहले चुनाव में ज्ञानप्रभा जैन ने जीत हासिल की थी। उन्होंने बेहद रोचक मुकाबले में कुसुम शर्मा को एक वोट से शिकस्त दिया था। हाथ आई जीत फिसलने पर कुसुर्म शर्मा और उनके समर्थक काफी मायूस हुए थे। वर्ष 2001 में हुए चुनाव में फिर से कसुम शर्मा मैदान में उतरीं, लेकिन सफलता उन्हें इस बार भी नसीब नहीं हुई। काशीनाथ सिंह उन्हें हराकर पिपरी के दूसरे चेयरमैन बने। वर्ष 2006 में हुए चुनाव में जीत की माला विमलेश सिंह के गले में पड़ी, जिन्होंने सावित्री सिंह को मात दी थी। इसके बाद वर्ष 2012 में हुए चुनाव में सावित्री सिंह ने अपने निकटतम प्रतिद्वंद्वी गीता सिंह को हराकर चेयरमैन की कुर्सी पाई। वर्ष 2017 के चुनाव में निर्दल उम्मीदवार दिग्विजय प्रताप सिंह ने 4031 मत पाकर बड़ी जीत हासिल की। उन्हें कुल वैध मतों का 58 प्रतिशत से अधिक मिला था। वहीं निकटतम प्रतिद्वंद्वी रहे कुबेरनाथ सिंह को महज 1205 मतों से संतोष करना पड़ा था। करीब 2800 वोटों के अंतर से दिग्विजय की जीत को तब इस श्रेणी की किसी निकाय में सबसे बड़ी जीत माना गया था। अब सबकी निगाहे वर्ष 2023 के चुनाव पर है। सियासी दंगल में ताल ठोंकने के लिए ज्यादातर उम्मीदवारों ने नामांकन के साथ कमर कस लिया है। उनकी असली तस्वीर नामांकन की प्रक्रिया पूरी होने और नाम वापसी के बाद स्पष्ट हो पाएगी।
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