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जिले की ‘मदर टेरेसा’ ने ली आखिरी सांस

Tue, 04 Nov 2014 05:30 AM IST
Sonbhadra
Sonbhadra Updated Tue, 04 Nov 2014 05:30 AM IST
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म्योरपुर/अनपरा। सामाजिक संस्था बनवासी सेवा आश्रम की संचालिका एवं प्रख्यात समाजसेविका डा. रागिणी प्रेम (80) का रविवार की रात 9.15 बजे लखनऊ स्थित लोहिया अस्पताल में निधन हो गया। उन्हीं के साथ जनपद में समाजसेवा का एक अध्याय समाप्त हो गया। उनके निधन के चलते सोमवार को पूरे जनपद में शोक की लहर दौड़ गई। कई जगह शोक में बाजार और स्कूल बंद रहे। उनकी कर्मस्थली गोविंदपुर स्थित बनवासी सेवा आश्रम में शव पहुंचते ही शोक संवेदना जताने और पार्थिव शरीर के अंतिम दर्शन के लिए भारी सैलाब उमड़ा पड़ा। शाम को उनकी बेटी डा. विभा प्रेम ने उन्हें मुखाग्नि दी।

नारी सशक्तीकरण, पर्यावरण संरक्षण, लोक साहित्य, संस्कृति संरक्षण, खादी ग्रामोद्योग, पशुपालन, जैविक कृषि जैसे मुद्दे उठाने वालीं डा. रागिनी का जन्म 12 सितंबर 1934 को हैदराबाद में चीफ आर्किटेक्ट विष्णुशंकर पालिसकर की बेटी के रूप में हुआ था। उन्होंने उस्मानिया विश्वविद्यालय से एमबीबीएस की डिग्री हासिल की। इसके बाद सेवाग्राम वर्धा में मेडिकल आफिसर के रूप में तैनाती हुई। स्थानीय स्तर पर लोगों की सेवा में भी जुटी रही। वर्ष 1966 में जब मेरठ निवासी प्रेम से उनकी शादी हुई तो पति के भी समाजसेवी होने के कारण उनके सपने को मंजिल मिल गई। शादी के महज दो वर्ष वह आदिवासियों का जीवन स्तर सुधारने की नियत से पति के साथ म्योरपुर ब्लाक के गोविंदपुर चली आईं। ऐसे समय में जब यह स्थल जंगलों से घिरा हुआ था, तब यहां एक झोपड़ी डालकर बनवासी सेवा आश्रम की नींव डाली। इसके बाद आदिवासियों का जीवन संवारने की मुहिम ने ऐसा जोर पकड़ा कि तमाम आदिवासी महिलाएं चौका-चूल्हा छोड़ उनके अभियान का हिस्सा बन गईं। चंद वर्षों में ही गोविंदपुर आश्रम को न केवल अंतर्राष्ट्रीय क्षितिज पर एक पहचान मिली बल्कि यह आश्रम इलाके के ढेरों आदिवासी महिला-पुरुषों के आत्मनिर्भरता का साधन बन गया। 1994 में प्रेम भाई के निधन के बाद उन्होंने आश्रम की मंत्री का कार्यभार ग्रहण संभाला। उनका कहना था कि अब वे यहीं पर रहकर पति के सपनों को आगे बढ़ाएगी। क्षेत्र की समस्याओं को लेकर जीवन भर उसे दूर करने के प्रयास में जुटी रहीं बहन रागिनी को कुछ लोग ‘मदर टरेसा’के नाम से भी संबोधित करते थे। फ्लोराइड से विकलांग हो रही 22 गांवों की आबादी को लेकर भी उन्होंने शासन-प्रशासन की तंद्रा तोड़ने में अहम भूमिका अदा की। वर्तमान में गांधीनिधि आश्रम लखनऊ की चेयरमैन और गांधी स्मारक निधि दिल्ली की सदस्य भी थी।
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