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परियोजनाओं की राख से रिहंद जलाशय का आसित्व खतरे में

Tue, 26 Jun 2018 11:44 PM IST
Updated Tue, 26 Jun 2018 11:44 PM IST
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परियोजनाओं की राख से रिहंद जलाशय का आसित्व खतरे में
अनपरा। प्रदेश की सबसे बड़ी 2630 मेगावाट वाली अनपरा परियोजना के ऐश डैम से रिहंद जलाशय में लाखों टन राख बहाया जा रहा है। ऐसे में जलाशय का पानी पूरी तरह से प्रदूषित हो रहा है।
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प्रतिष्ठित संस्था सेंटर फार साइंस इनवायरमेंट ने 22 फरवरी 2015 को किए गए सर्वे में राज्य सरकार की ओबरा परियोजना को प्रदेश का सर्वाधिक और अनपरा परियोजना को दूसरा सर्वाधिक प्रदूषण उत्सर्जक केंद्र बताया गया था। लेकिन स्थिति सुधरने की बजाय बिगड़ती जा रही है। अनपरा परियोजना के लिए बने ऐश डैम में अनपरा ए, अनपरा बी, अनपरा सी की राख निस्तारित होती थी। अब इसमें डेढ़ साल से एक हजार मेगावाट वाली अनपरा डी की भी राख पहुंच रही है। ऐश डैम पूरी तरह भरने के कगार पर है। स्थिति को देखते हुए एनजीटी की टीम 2015 में ही ज्यादा से ज्यादा राख के निस्तारण लिए और नए ऐश डैम या फिर पुराने ही ऐश डेम की क्षमता बढ़ाने का सुझाव दे चुकी है। साथ ही चेतावनी भी दी गई थी कि 2020 तक ऐश डैम पूरी तरह भर जाएंगे। बावजूद नए ऐश डैम को लेकर अब तक कोई प्रक्रिया अमल में नहीं लाई जा सकी है। अलबत्ता ऐश डैम पर लोड कम करने के लिए ऐश डैम से बिना किसी ट्रीटमेंट के सीधे राख मिश्रित पानी रिहंद डैम में बहाया जा रहा रहा है।
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जलभराव की क्षमता पहले ही हो चुकी है दस फीट कम
एशिया के प्रमुख बड़े बांधों में स्थान रखने वाले रिहंद डैम के जलभराव की क्षमता गादभराव के चलते दस फीट पहले ही कम हो चुकी है। गत फरवरी माह में जिले के दौरे पर आई टीम ने भी रिहंद डैम में राख के बहाव की बात स्वीकारी थी। एनजीटी ने 12 जुलाई तक अनुपालन आख्या भी मांगी है। परियोजनाओं में प्रतिदिन 61 हजार मीट्रिक टन कोयला जलाया जाता है। इससे लगभग 24 हजार एमटी राख निकलती है। अनपरा में 2630 मेगावाट बिजली राज्य के स्वामित्व वाली परियोजना और 1200 मेगावाट वाली बिजली निजी स्वामित्व वाली परियोजना से पैदा होती है। कुल 3830 मेगावाट क्षमता वाले संयत्र से बिजली उत्पादन के लिए रोजाना 51 से 61 हजार मीट्रिक टन कोयला जलाया जाता है। इससे रोजाना 23 से 24 हजार एमटी राख निकलती है। ओबरा परियोजना में ऐश डैम से इतर राख निस्तारण महज दस से 15 प्रतिशत होने के कारण 85 फीसद राख ऐश डैम और वहां से रिहंद डैम में पहुंच रही है।
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जिम्मेदार बने हैं लापरवाह
पर्यावरणविद एडवोकेट अश्वनी दूबे और जगत नारायण की याचिका पर छह दिसंबर 2017 को एनजीटी ने जिला सुपरवाइजरी कमेटी गठित करने, प्रतिमाह उसकी बैठक कर प्रदूषण और उस पर नियंत्रण की स्थिति जानने का आदेश दिया था। कमेटी तो गठित हो गई है लेकिन आदेश के छह माह बाद भी प्रदूषण पर नियंत्रण की प्रभावी कवायद कागजी आंकड़ों में ही उलझी है।

रिहंद जैसे बड़े बांध के साथ रेणुका, सोन जैसी महत्वपूर्ण नदियों में सीधे औद्योगिक अवषिष्टों के पटाव ने भूजल को काफी खतरनाक स्तर तक प्रदूषित कर दिया है। इससे कैंसर, विकलांगता, बांझपन, मानसिक विक्षिप्तता, मूर्छा, एलर्जी के साथ ही सांस और त्वचा संबंधी बीमारियां लोगों को तेजी से अपनी चपेट में ले रही है। यहां के पानी में फ्लोराइड के साथ मरकरी, लेड, आर्सेनिक जैसे खतरनाक तत्वों की मिल रही मानक से अधिक मात्रा मानव जीवन के लिए खतरे का संकेत दे रहे हैं। फिर भी सरकारी तंत्र की उदासीनता समझ में नहीं आ रही है। -डा. अनिल गौतम वैज्ञानिक लोक विज्ञान संस्थान


रिहंद जलाशय में राख निस्तारित की जा रही है इसकी जानकारी नहीं है। यदि ऐसा है तो प्रदूषण व राजस्व विभाग की टीम से जांच कराकर आवश्यक कार्रवाई की जाएगी। -विशाल यादव, एसडीएम दुद्धी
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