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...तो इस बार भी बाढ़ का दंश झेलेंगे ग्रामीण
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रामपुर मथुरा/सीतापुर। तराई इलाके को बाढ़ से बचाने के लिए प्रति वर्ष करोड़ों की योजनाओं पर काम शुरू होता है, लेकिन यह काम बाढ़ आने से पहले पूरा नहीं हो पाता है। इसकी वजह से खर्च की गई रकम बर्बाद जाती है, वहीं लोगों को बाढ़ का दंश झेलना पड़ता है। इस बार भी कुछ ऐसा ही है। अब जब नदियों का जलस्तर बढ़ने लगा तो काम की रफ्तार बढ़ाई जा रही है। ग्रामीणों की माने तो अभी तक महज 50 फीसदी ही काम हो सका है। ऐसे में बाढ़ से पहले काम पूरा होने की उम्मीद कम है। इस बार भी लोगों को बाढ़ का संकट झेलना पड़ सकता है।
रामपुर मथुरा ब्लॉक की शुकुलपुरवा बगस्ती कनरखी अटौरा व अंगरौरा ग्राम पंचायतों की करीब 35 हजार आबादी दो दशक से प्रति वर्ष बाढ़ और कटान से प्रभावित हो रही है। इस भीषण त्रासदी को बचाने के लिए 2014-15 से चहलारी-गनेशपुर तटबंध का निर्माण शुरू हुआ था। 2017 में पूर्ण हो गया। तटबंध बन जाने के बाद आसपास के लोगों में खुशी थी कि अब हमें बाढ़ और कटान से मुक्ति मिल जाएगी। लेकिन लोगों की उम्मीदें सिर्फ उम्मीद बनकर ही रह गईं।
2018 में आई बाढ़ में तटबंध के कटने का खतरा बढ़ गया। तटबंध बचाने के लिए बाढ़ के समय में कार्य शुरू हुआ। तटबंध की सुरक्षा का जिम्मा संभाल रहे सिंचाई व बाढ़ खंड बाराबंकी ने करोड़ों रुपये के बोल्डर, नायलॉन बैग सहित अस्थाई ठोकर बनाने के बाद भी आखिरकार तटबंध का करीब 200 मीटर हिस्सा टूट गया। गनीमत रही कि संयोग से जलस्तर तेजी से घटना शुरू हो गया और आसपास के कई गांवों का अस्तित्व बच गया। दो वर्षों से लगातार तटबंध के किनारे पत्थर लगाने का कार्य चल रहा है।
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लेकिन हैरत की बात यह है कि जब जलस्तर में वृद्धि का समय आ जाता है तो यह कार्य अप्रैल-मई में शुरू किए जाते है। परियोजना का 50 फीसदी भी कार्य कभी भी पूरा नहीं हो पाया। इस वर्ष भी कटान प्वाइंट पर करीब 250 मीटर की दूरी में पत्थर लगाने का कार्य चल रहा है, जो अभी तक अपूर्ण है। दो पत्थरों के बीच काफी गैप रखा गया है। बताया जा रहा है कि अभी इसमें पत्थर के छोटे-छोटे टुकड़े भरे जाएंगे। लेकिन काम में लगे मजदूरों की माने तो जलस्तर बढ़ने लगा है। इस गैप में पानी के साथ आने वाली बालू भर जाएगी।
नहीं बनीं ठोकरें, बढ़ने लगा पानी
नदी की धारा को मोड़ने के लिए करीब 10 करोड़ की लागत से ड्रेजिंग एवं चैनलाइजेशन का कार्य फत्तेपुरवा से हेतमापुर सीमा तक करीब पौने पांच किलोमीटर में पूर्ण किए जाने का दावा किया जा रहा है। लेकिन असलियत यह है कि महज दो किमी की लंबाई में 35 मीटर की चौड़ाई में यह कार्य किया गया है। अंगरौरा व अखरी गांवों के अस्तित्व को बचाने के लिए करीब 15 करोड़ की लागत से तीन ठोकर का निर्माण भी प्रस्तावित है। अब जब जलस्तर बढ़ चुका है तो इन ठोकरों का निर्माण विभाग किस प्रकार कराएगा। इन गांवों का अस्तित्व कैसे बचेगा। इससे लोग चिंतित हैं।
शासन से कार्य की स्वीकृति न मिल पाने के कारण काम में विलंब होता है। वर्तमान में सभी परियोजनाओं पर तेजी से काम चल रहा है। 85 फीसदी कार्य पूर्ण हो चुका है। बाढ़ से तटबंध को पूरी तरह सुरक्षित कर लिया गया है।
- बीएन गुप्ता, अधिशाषी अभियंता, सिंचाई व बाढ़ खंड बाराबंकी
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रामपुर मथुरा ब्लॉक की शुकुलपुरवा बगस्ती कनरखी अटौरा व अंगरौरा ग्राम पंचायतों की करीब 35 हजार आबादी दो दशक से प्रति वर्ष बाढ़ और कटान से प्रभावित हो रही है। इस भीषण त्रासदी को बचाने के लिए 2014-15 से चहलारी-गनेशपुर तटबंध का निर्माण शुरू हुआ था। 2017 में पूर्ण हो गया। तटबंध बन जाने के बाद आसपास के लोगों में खुशी थी कि अब हमें बाढ़ और कटान से मुक्ति मिल जाएगी। लेकिन लोगों की उम्मीदें सिर्फ उम्मीद बनकर ही रह गईं।
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2018 में आई बाढ़ में तटबंध के कटने का खतरा बढ़ गया। तटबंध बचाने के लिए बाढ़ के समय में कार्य शुरू हुआ। तटबंध की सुरक्षा का जिम्मा संभाल रहे सिंचाई व बाढ़ खंड बाराबंकी ने करोड़ों रुपये के बोल्डर, नायलॉन बैग सहित अस्थाई ठोकर बनाने के बाद भी आखिरकार तटबंध का करीब 200 मीटर हिस्सा टूट गया। गनीमत रही कि संयोग से जलस्तर तेजी से घटना शुरू हो गया और आसपास के कई गांवों का अस्तित्व बच गया। दो वर्षों से लगातार तटबंध के किनारे पत्थर लगाने का कार्य चल रहा है।
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लेकिन हैरत की बात यह है कि जब जलस्तर में वृद्धि का समय आ जाता है तो यह कार्य अप्रैल-मई में शुरू किए जाते है। परियोजना का 50 फीसदी भी कार्य कभी भी पूरा नहीं हो पाया। इस वर्ष भी कटान प्वाइंट पर करीब 250 मीटर की दूरी में पत्थर लगाने का कार्य चल रहा है, जो अभी तक अपूर्ण है। दो पत्थरों के बीच काफी गैप रखा गया है। बताया जा रहा है कि अभी इसमें पत्थर के छोटे-छोटे टुकड़े भरे जाएंगे। लेकिन काम में लगे मजदूरों की माने तो जलस्तर बढ़ने लगा है। इस गैप में पानी के साथ आने वाली बालू भर जाएगी।
नहीं बनीं ठोकरें, बढ़ने लगा पानी
नदी की धारा को मोड़ने के लिए करीब 10 करोड़ की लागत से ड्रेजिंग एवं चैनलाइजेशन का कार्य फत्तेपुरवा से हेतमापुर सीमा तक करीब पौने पांच किलोमीटर में पूर्ण किए जाने का दावा किया जा रहा है। लेकिन असलियत यह है कि महज दो किमी की लंबाई में 35 मीटर की चौड़ाई में यह कार्य किया गया है। अंगरौरा व अखरी गांवों के अस्तित्व को बचाने के लिए करीब 15 करोड़ की लागत से तीन ठोकर का निर्माण भी प्रस्तावित है। अब जब जलस्तर बढ़ चुका है तो इन ठोकरों का निर्माण विभाग किस प्रकार कराएगा। इन गांवों का अस्तित्व कैसे बचेगा। इससे लोग चिंतित हैं।
शासन से कार्य की स्वीकृति न मिल पाने के कारण काम में विलंब होता है। वर्तमान में सभी परियोजनाओं पर तेजी से काम चल रहा है। 85 फीसदी कार्य पूर्ण हो चुका है। बाढ़ से तटबंध को पूरी तरह सुरक्षित कर लिया गया है।
- बीएन गुप्ता, अधिशाषी अभियंता, सिंचाई व बाढ़ खंड बाराबंकी