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कोरोना काल में गिलोय बनी आय का जरि
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- फोटो : SITAPUR
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मछरेहटा (सीतापुर)। कोरोना कॉल में जहां लोगों का रोजगार गया, वहीं घर-परिवार की रोजी रोटी पर संकट आ गए। ऐसे में गिलोय लोगों के लिए एक वरदान बन गई है। कोरोना में इसका काढ़ा पीने से इम्युनिटी पॉवर बढ़ती है। इससे इसकी डिमांड भी होने लगी है। मछरेहटा इलाके के तमाम गांवों में यह भारी मात्रा में पाई जाती है। अब जब डिमांड बढ़ी तो लोगों ने इसे आय का जरिया बना दिया। अब दिन रात एक करके इस गिलोय को निकालते हैं। उसके बाद इसे लखनऊ तक की मंडी तक पहुंचकर अपनी रोजी रोटी चला रहे हैं।
करीब छह माह से कोरोना को लेकर संकट खड़ा हो गया है। इस अवधि में कल कारखाने बंद होने से लोगों का रोजगार छिन गया। ऐसे में तमाम लोग दूरदराज से अपने घर वापस आ गए। लेकिन गांव में आमदनी का कोई जरिया न होने से उनके सामने परिवार चलाने का संकट खड़ा हो गया। इस मुसीबत की घड़ी में गिलोय गरीबों के लिए एक संजीवनी बूटी बनकर उभरी है। मछरेहटा इलाके के बारेपारा, भदेफर, कंदुवापुर, परसदा, गद्दीपुर, कटेेहला, पेरियाकोडर, बीहट बीरम सहित तमाम गांवों में गिलोय भारी मात्रा में पाई जाती है।
ग्रामीण रमेश व कुलदीप का कहना है गिलोय से शारीरिक शक्ति बढ़ने की बात सुनी थी। जब लोग इसको तलाशने लगे तो सोचा क्यों न इसका कारोबार शुुुरू कर दिया। इस समय गिलोय की डिमांड भी हो रही है। शुरुआत में इसे गांव से लेकर मछरेहटा चौराहे पहुंचे। यहां पर इसके खरीदार मिल गए। अब धीरे-धीरे इसका कारोबार बढ़ता जा रहा है। लखनऊ से लोग खरीदारी आते हैं। एक क्विंटल करीब चार से पांच सौ रुपये में बिक जाती है।
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एक क्विंटल गिलोय इकट्ठा करने में करीब दो दिन लगते हैं। इससे मजदूरी निकल आती है और घर परिवार आसानी से चला देते हैं। उमेश का कहना है गिलोय ने हमारी परिवार की जिंदगी पटरी पर ला दी है। इस समय जब गांव में कोई रोजगार नहीं था तो गिलोय ने जीने का सहारा बना दिया है। इस समय मछरेहटा इलाके के 15 से अधिक गांवों में लोग गिलोय बेचने के काम में जुटे हैं।
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करीब छह माह से कोरोना को लेकर संकट खड़ा हो गया है। इस अवधि में कल कारखाने बंद होने से लोगों का रोजगार छिन गया। ऐसे में तमाम लोग दूरदराज से अपने घर वापस आ गए। लेकिन गांव में आमदनी का कोई जरिया न होने से उनके सामने परिवार चलाने का संकट खड़ा हो गया। इस मुसीबत की घड़ी में गिलोय गरीबों के लिए एक संजीवनी बूटी बनकर उभरी है। मछरेहटा इलाके के बारेपारा, भदेफर, कंदुवापुर, परसदा, गद्दीपुर, कटेेहला, पेरियाकोडर, बीहट बीरम सहित तमाम गांवों में गिलोय भारी मात्रा में पाई जाती है।
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ग्रामीण रमेश व कुलदीप का कहना है गिलोय से शारीरिक शक्ति बढ़ने की बात सुनी थी। जब लोग इसको तलाशने लगे तो सोचा क्यों न इसका कारोबार शुुुरू कर दिया। इस समय गिलोय की डिमांड भी हो रही है। शुरुआत में इसे गांव से लेकर मछरेहटा चौराहे पहुंचे। यहां पर इसके खरीदार मिल गए। अब धीरे-धीरे इसका कारोबार बढ़ता जा रहा है। लखनऊ से लोग खरीदारी आते हैं। एक क्विंटल करीब चार से पांच सौ रुपये में बिक जाती है।
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एक क्विंटल गिलोय इकट्ठा करने में करीब दो दिन लगते हैं। इससे मजदूरी निकल आती है और घर परिवार आसानी से चला देते हैं। उमेश का कहना है गिलोय ने हमारी परिवार की जिंदगी पटरी पर ला दी है। इस समय जब गांव में कोई रोजगार नहीं था तो गिलोय ने जीने का सहारा बना दिया है। इस समय मछरेहटा इलाके के 15 से अधिक गांवों में लोग गिलोय बेचने के काम में जुटे हैं।