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पानी स्थिर मगर बढ़ रही मुसीबत

Fri, 05 Aug 2016 10:29 PM IST
अमर उजाला ब्यूरो
अमर उजाला ब्यूरो Updated Fri, 05 Aug 2016 10:29 PM IST
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River level stable
घाघरा नदी से कटान

बाढ़ग्रस्त इलाके में पानी स्थिर है, लेकिन मुसीबत कम होती नजर नहीं आ रही है। घाघरा नदी कटान कर रही है, जबकि बाढ़ में फंसे लोगों के घरों में राशन नहीं बचा है। ग्रामीणों का कहना है कि मदद तो आती है, लेकिन क्षेत्रीय अधिकारियों की मनमर्जी का शिकार हो जाती है।

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बहुत से ऐसे गांव हैं, जहां अभी प्रशासन के अधिकारी व कर्मचारी हाल जानने तक नहीं पहुंचे हैं। पीड़ितों का कहना है कि राहत सामग्री प्रमुख मार्ग पर वितरित की जाती है। जबकि असल मुसीबत जहां पर है, वहां पीड़ित पानी से बाहर ही नहीं निकल पाता। जिसकी वजह से उसे राहत सामग्री नहीं मिल पा रही है। रसोई में राशन नहीं है, चूल्हे ठंड़े हैं।
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शुक्रवार को बाढ़ का बढ़ता जलस्तर स्थिर हो गया, बावजूद इसके नदी का रौद्र रूप उसी तरह से नजर आ रहा है। नदी टापू पर बसे पचीसा व रेती में कटान कर रही है। रेती पर करीब 40 परिवार बसे हुए हैं।
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यहां के रहने वाले होरी लाल, नंगू, फूलमती, सुंदर लाल, रमेश आदि ग्रामीणों का कहना है कि न तो उनके टापू पर कोई राहत सामग्री पहुंची है और न ही कोई उनका हाल जानने आया है। यह टापू पचीसा के करीब है, लेकिन इस टापू पर किसी की नजरें इनायत नही हुई है। यहां पर बसने वाले पीड़ित बाढ़ व कटान का दंश झेल रहे हैं।

घरों में राशन खत्म हो गया है, लेकिन उन तक राहत सामग्री नहीं पहुंची है। पचीसा गांव के लोग रोशनी न होने की शिकायत कर रहे हैं। लोगों का कहना है कि कटान के कारण रात के समय मुसीबत और बढ़ जाती है। अंधेरा होने के कारण यह पता नहीं चल पाता कि नदी कहां तक कटान कर चुकी है।

उधर, मारू बेहड़ क्षेत्र में गार्गी पुरवा, लोधपुरवा, नई बस्ती, मरेली, लालपुर, जैतहिया, गोडिय़न पुरवा राजापुर कलां आदि गांवों के पीड़ितों का कहना है कि उनके घरों तक राहत सामग्री नहीं पहुंची है। नाव न होने की वजह से इन गांवों के पीड़ित मारू बेहड़ स्थित बाढ़ राहत चौकी तक नहीं पहुंच सके।

वहीं गांवों में कोई कर्मचारी व अधिकारी उनका हाल जानने नहीं आया है। ग्रामीणों का कहना है कि उन्हें राशन व लाइट की व्यवस्था भले ही न मिले, लेकिन कम से कम इस क्षेत्र में सरकारी नाव की मदद जरूर मिल जाए। ताकि कोई बीमार हो तो उसे अस्पताल तक पहुंचाया जा सके।

पीड़ितों का कहना है कि राहत के नाम पर इस क्षेत्र में तैनात अधिकारी मनमानी कर रहे हैं। इस क्षेत्र में करीब 61 गांव बाढ़ की चपेट में हैं, जिनमें करीब 30 गांवों का पानी घट चुका है। कई गांवों में पानी घटने से कीचड़ ही कीचड़ नजर आ रहा है। जहां पर अब संक्रमण फैलने का खतरा मंडरा रहा है।

घाघरा नदी पचीसा, रेती, कोनी, गोड़ियन पुरवा के निकट कटान कर रही है। उधर, रामपुर मथुरा  क्षेत्र के 48 बाढ़ पीड़ित गांवों में बाढ़ का पानी कम हो गया है। इस क्षेत्र में करीब 20 गांव ऐसे हैं, जहां पर अभी तक प्रशासन की मदद नहीं पहुंच सकी है। उधर, शारदा व घाघरा बैराज से शुक्रवार को 230780 क्यूसेक पानी छोड़ा गया है। यह पानी बाढ़ संकट में इजाफा करेगा। जिससे मुसीबत कम होती नजर नहीं आ रही है।
 
बैराजों से राहत की खबर
सूत्रों की माने तो बैराजों से मिलने वाली खबर जिले के बाढ़ पीड़ितों के लिए राहत भरी है। बैराजों पर अब पानी सामान्य की कटेगरी में आने वाला है। अब पानी वहां पर उतना उफान नहीं मार रहा है, जितना पहले था। जिससे बैराजों से छोड़े जाने वाले पानी में कमी आएगी। इससे बाढ़ग़्रस्त इलाके में मुसीबत में कमी आएगी।
 
सरायन में भी बढ़ा जलस्तर
जिले के गांजर इलाके में शारदा व घाघरा नदी का कहर बरप रहा है। जिससे पूरे गांजर में त्राहि-त्राहि मची हुई है। प्रशासन अभी वहां की स्थिति से नहीं निपट पा रहा है। वहीं दूसरी तरफ जिले में बहने वाली अन्य नदियों ने खतरे के संकेत देने शुरू कर दिए हैं।

हालांकि अभी इनका पानी खतरे के निशान से काफी नीचे है, लेकिन जिस तरह से पानी में उफान आया है, उससे तटीय इलाकों में मुसीबत आती नजर आ रही है। सरायन नदी का पानी उफनाने लगा है। यह नदी शहर के बीच से होकर गुजरती है, जिससे शहर के कुछ हिस्सों में बाढ़ की मुसीबत आती नजर आ रही है। ग्रामीण क्षेत्रों में नदी का पानी तटीय इलाके में पड़ने वाले खेतों में भर रहा है। हालांकि प्रशासन अभी पूरी तरह से आश्वस्त है कि मुख्यालय पर बाढ़ जैसे कोई संकेत नजर नहीं आए हैं। 
चहलारी मार्ग पर बढ़ते जा रहे बाढ़ पीड़ित
बाढ़ग्रस्त इलाके में सबसे मुफीद स्थान चहलारी मार्ग है। जो काफी ऊंचा होने के साथ बाढ़ पीड़ितों को सुरक्षित ठिकाना देने का काम कर रहा है। कहने को तो इस मार्ग के आसपास सिर्फ श्याम नगर, सुंदर नगर, नगीना पुरवा, नई बस्ती व जैतहिया गांव हैं, लेकिन इस मार्ग पर दूर दराज गांवों के बाढ़ पीड़ित भी शरण लेने पहुंच रहे हैं।


यही वजह है कि करीब 12 किलोमीटर दूरी तक इस मार्ग पर जहां-तहां लोग डेरा डाले पड़े हैं। खासकर मारू बेहड़ से चहलारी घाट पुल तक सड़क ने आबादी का रूप ले लिया है। जिस पर झोपड़ियां व पालीथीन तने घर नजर आ रहे हैं।

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