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ऑनलाइन गूंजा मंत्र, देहरी पर पहुंचेगा प्रसाद
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नैमिषारण्य में ऑनलाइन पूजन कराते आचार्य विवेेक द्विवेदी। (संवाद)
- फोटो : SITAPUR
सीतापुर। आधुनिकता और भागदौड़ भरी इस जिंदगी में इंटरनेट जीवन का अहम हिस्सा बन गया है, फिर चाहे कोरोना के इस संकट काल में शुरू हुआ वर्क फ्राम होम हो या फिर इस बुरे दौर में ऑनलाइन भक्ति हो। इंटरनेट आपके साथ साए की तरह जुड़ा है, जिसके बिना जीवन अधूरा सा लगता है।
जी हां, कोरोना के इस दौर को ही लीजिए, जिससे मानवता का हर एक क्षेत्र प्रभावित हुआ है। यही वजह है कि स्थापित मान्यताओं और परंपराओं में भी बदलाव आ गया है, लेकिन इंटरनेट की बदौलत ही लोग घर बैठे ही भक्ति के भव सागर में गोता लगा रहे हैं और भगवान का प्रसाद उनके घर पहुंच रहा है।
मंगलवार को नैमिषारण्य में अष्टमी के दिन भी भक्तों से भरे रहने वाले मंदिर तो सूने रहे, लेकिन भक्त और भगवान के बीच इंटरनेट सहारा जरूर बना। कोरोना से बचाव के लिए आचार्यों ने ऑनलाइन मंत्रोच्चारण करके सूदूर बैठे भक्तों को हवन कराया और कुरियर से प्रसाद भेजने का बंदोबस्त किया। आचार्यों को दक्षिणा भी ऑनलाइन मिली। सामान्य समय में भक्त तीर्थ नगरी में पदार्पण करके हवन-पूजन करते थे।
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दूसरे प्रदेश के भक्तों ने भी किया ऑनलाइन पूजन
तीर्थ नगरी के प्रकांड आचार्यों ने ऑनलाइन मंत्रोच्चारण कर प्रदेश के कई जनपदों के साथ दूसरे राज्यों के भक्तों को हवन-पूजन कराया। महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, राजस्थान आदि राज्यों के भक्तों ने ऑनलाइन हवन किया और आचार्यों को इंटरनेट के माध्यम से दक्षिणा दी। आचार्य सदानन्द द्विवेदी ने बताया कि वह और उनके शिष्यों ने ऑनलाइन करीब 50 हवन कराकर भक्तों के उत्थान के लिए माता रानी के श्री चरणों में अरदास लगाई।
आचार्य रमेश शास्त्री ने बताया कि उनका पूरा दिन व्यस्तता में गुजरा। उन्होंने सैकड़ों भक्तों को ऑनलाइन हवन कराया और कुरियर से प्रसाद भेजने का इंतजाम किया। श्रीधर शास्त्री ने बताया कि भला हो संचार क्रांति का, जो कि भक्तों से मुखातिब होने का मौका दे रही है। नहीं तो आचार्य तीर्थनगरी में और भक्त सुदूर स्थानों पर बैठे ही रह जाते।
न कन्या भोज और न ही जागरण
नवरात्र के अष्टमी को तीर्थ नगरी की छटा देखते ही बनती है, लेकिन इस बार अष्टमी सन्नाटे में बीती। नैमिष में न तो पंक्तिबद्ध कन्याएं दिखाई दीं और न ही उन्हें पकवान परोसते व दक्षिणा देते भक्त। कोरोना के चलते मां ललिता देवी मंदिर परिसर में परंपरागत देवी जागरण का आयोजन टाल दिया गया। मां के दरबार में थोड़े बहुत क्षेत्रीय भक्तों के अलावा सुदूर स्थानों के भक्त भी नहीं आए। व्यास पीठ, देवपुरी, देवदेवेश्वर धाम, रूद्रावर्त आदि मंदिर में भी भक्त नहीं दिखे।
हवन के बाद ऑनलाइन भेजी दक्षिणा
मुंबई के कमलेश भटनागर प्रत्येक वर्ष नैमिष में हवन-पूजन और कन्या भोज कराने आते थे। इस बार कोरोना के चलते वह नहीं आ पाए। ऐसे में उन्होंने नैमिष के आचार्यों से ऑनलाइन हवन कराया और नेट बैंकिंग से दक्षिणा देकर पुण्य प्राप्त की। कोरोना के चलते चित्रकूट की सीनी सिंह हवन-पूजन के लिए तीर्थ नगरी नहीं आ सकी।
ऐसे में उन्होंने ऑनलाइन मंत्रोच्चारण के बीच विधि विधान से हवन किया और माता रानी के चरणों में संकल्प अर्पित किया। लखनऊ के अनुराग श्रीवास्तव और सुनीता भी कोरोना के चलते अनुष्ठान संपन्न कराने तीर्थ नगरी नहीं आ सके। दोनों भक्तों ने भी ऑनलाइन हवन-पूजन किया और देवी दर्शन प्राप्त किए।
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जी हां, कोरोना के इस दौर को ही लीजिए, जिससे मानवता का हर एक क्षेत्र प्रभावित हुआ है। यही वजह है कि स्थापित मान्यताओं और परंपराओं में भी बदलाव आ गया है, लेकिन इंटरनेट की बदौलत ही लोग घर बैठे ही भक्ति के भव सागर में गोता लगा रहे हैं और भगवान का प्रसाद उनके घर पहुंच रहा है।
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मंगलवार को नैमिषारण्य में अष्टमी के दिन भी भक्तों से भरे रहने वाले मंदिर तो सूने रहे, लेकिन भक्त और भगवान के बीच इंटरनेट सहारा जरूर बना। कोरोना से बचाव के लिए आचार्यों ने ऑनलाइन मंत्रोच्चारण करके सूदूर बैठे भक्तों को हवन कराया और कुरियर से प्रसाद भेजने का बंदोबस्त किया। आचार्यों को दक्षिणा भी ऑनलाइन मिली। सामान्य समय में भक्त तीर्थ नगरी में पदार्पण करके हवन-पूजन करते थे।
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दूसरे प्रदेश के भक्तों ने भी किया ऑनलाइन पूजन
तीर्थ नगरी के प्रकांड आचार्यों ने ऑनलाइन मंत्रोच्चारण कर प्रदेश के कई जनपदों के साथ दूसरे राज्यों के भक्तों को हवन-पूजन कराया। महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, राजस्थान आदि राज्यों के भक्तों ने ऑनलाइन हवन किया और आचार्यों को इंटरनेट के माध्यम से दक्षिणा दी। आचार्य सदानन्द द्विवेदी ने बताया कि वह और उनके शिष्यों ने ऑनलाइन करीब 50 हवन कराकर भक्तों के उत्थान के लिए माता रानी के श्री चरणों में अरदास लगाई।
आचार्य रमेश शास्त्री ने बताया कि उनका पूरा दिन व्यस्तता में गुजरा। उन्होंने सैकड़ों भक्तों को ऑनलाइन हवन कराया और कुरियर से प्रसाद भेजने का इंतजाम किया। श्रीधर शास्त्री ने बताया कि भला हो संचार क्रांति का, जो कि भक्तों से मुखातिब होने का मौका दे रही है। नहीं तो आचार्य तीर्थनगरी में और भक्त सुदूर स्थानों पर बैठे ही रह जाते।
न कन्या भोज और न ही जागरण
नवरात्र के अष्टमी को तीर्थ नगरी की छटा देखते ही बनती है, लेकिन इस बार अष्टमी सन्नाटे में बीती। नैमिष में न तो पंक्तिबद्ध कन्याएं दिखाई दीं और न ही उन्हें पकवान परोसते व दक्षिणा देते भक्त। कोरोना के चलते मां ललिता देवी मंदिर परिसर में परंपरागत देवी जागरण का आयोजन टाल दिया गया। मां के दरबार में थोड़े बहुत क्षेत्रीय भक्तों के अलावा सुदूर स्थानों के भक्त भी नहीं आए। व्यास पीठ, देवपुरी, देवदेवेश्वर धाम, रूद्रावर्त आदि मंदिर में भी भक्त नहीं दिखे।
हवन के बाद ऑनलाइन भेजी दक्षिणा
मुंबई के कमलेश भटनागर प्रत्येक वर्ष नैमिष में हवन-पूजन और कन्या भोज कराने आते थे। इस बार कोरोना के चलते वह नहीं आ पाए। ऐसे में उन्होंने नैमिष के आचार्यों से ऑनलाइन हवन कराया और नेट बैंकिंग से दक्षिणा देकर पुण्य प्राप्त की। कोरोना के चलते चित्रकूट की सीनी सिंह हवन-पूजन के लिए तीर्थ नगरी नहीं आ सकी।
ऐसे में उन्होंने ऑनलाइन मंत्रोच्चारण के बीच विधि विधान से हवन किया और माता रानी के चरणों में संकल्प अर्पित किया। लखनऊ के अनुराग श्रीवास्तव और सुनीता भी कोरोना के चलते अनुष्ठान संपन्न कराने तीर्थ नगरी नहीं आ सके। दोनों भक्तों ने भी ऑनलाइन हवन-पूजन किया और देवी दर्शन प्राप्त किए।