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मुखबिर तंत्र का मंत्र भूल गई पुलिस
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सीतापुर। आए दिन पुलिस की ओर से जारी होने वाले प्रेस नोट में कहानी तो बार-बार यही दोहराई जाती है कि मुखबिर की सूचना पर शराब, असलहा, कारतूस के साथ आरोपियों को गिरफ्तार करने में कामयाबी मिली है। पुलिस भले ही इन गिरफ्तारियों के पीछे मुखबिर की मदद की बात करती हो, लेकिन हकीकत यही है कि आधुनिकता के इस दौर में पुलिस मुखबिर तंत्र का मंत्र ही भूल चुकी है। यही वजह है कि जिले में हुई कई बड़ी वारदातों का आज भी खुलासा नहीं हो सका है।
बदलते दौर में पुलिसिंग के तौर तरीके तो बदलते चले गए, लेकिन इसी के साथ पुलिस महकमे की सबसे मजबूत कड़ी माने जाने वाले भरोसेमंद मुखबिरों का साथ छूटता चला गया। आधुनिकता के दौर में भले ही खाकी हाईटेक संसाधनों से लैस हो गई हो, पर बेसिक पुलिसिंग से दूर होती गई। मुखबिरों की मदद नहीं मिलने से न तो बड़ी घटनाओं का पुलिस खुलासा कर पा रही है और न ही अपराधी पकड़ में आ रहे हैं।
पुलिस के अफसर भी दबी जुबान ये बात स्वीकार करते हैं, लेकिन मौजूदा दौर में अब पुराने दौर को लाना मुमकिन नहीं है। जिले में पिछले कई सालों के भीतर कई जघन्य वारदातें हों या फिर हाल में हुई घटनाएं, हर मामलों में पुलिस का नेटवर्क कमजोर ही रहा है। इसी वजह से घटनाओं का खुलासा नहीं हो सका।
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प्रेस नोट तक सिमट गए मुखबिर
पुलिस हर छोटे-बड़े मामलेे के खुलासे में जारी प्रेस नोट में यही जिक्र करती है कि मुखबिर की सूचना पर कार्रवाई की गई, लेकिन ऐसा होता नहीं है। सच तो यही है कि पुलिस को हाईटेक संसाधनों के नाम पर मिले सर्विलांस की मदद से ही घटनाओं का खुलासा कर अपराधियों को गिरफ्तार करती है। ऐसे में यह कहना गलत नहीं होगा कि मुखबिर प्रेस नोट तक ही सिमट गए हैं।
इसलिए किनारा करते चले गए मुखबिर
पुलिस सूत्रों की माने तो शुरुआती दौर में मुखबिर ही पुलिस की मजबूत कड़ी थे। कोई घटना होने पर मुखबिरों को फैला दिया जाता था। मुखबिर पूरी जानकारी देते थे। इसके बाद पुलिस अपने हिसाब से काम करती थी और कामयाबी भी मिलती थी, लेकिन धीरे-धीरे पुलिस ने मुखबिरों के साथ ही खेल शुरू कर दिया। कई बड़ी घटनाएं होने पर जब कोई क्लू नहीं मिलता था तो पुलिस मुखबिरों को ही उस मामले में लपेट देती थी।
कई मुखबिरों को पुलिस ने अपराधी बताकर एनकाउंटर में मार दिया। इसके कई मामले भी सामने आए। इन्हीं वजहों से मुखबिरों ने पुलिस से दूरियां बना ली और एक समय ऐसा आ चुका है अब मुखबिर बचे ही नहीं हैं।
जान जोखिम में डालकर करते थे मुखबिरी
जिले में कई ऐसे लोग हैं, जो कभी पुलिस के लिए मुखबिरी करते थे, लेकिन अब दूरी बना ली है। नाम न छापने की शर्त कई मुखबिरों ने बताई कि वह पुलिस के लिए जान जोखिम में डालकर काम करते थे, लेकिन पुलिस ने भरोसा ही खो दिया। मुखबिरी करने पर कई बार क्षेत्र में दुश्मनी भी हो जाती थी। पुलिस से दूरी बनाने की कोशिश की जाती तो फर्जी मामलों में जेल तक भेज दिया जाता था।
पुलिस के जानकारों की माने तो मुखबिरों को कई नाम से जाना जाता था। मुखबिर, सूत्र, खबरी से लेकर सोर्स का नाम भी दिया जाता था। 1990 से 2000 तक पुलिस कोई भी वारदात पर मुखबिरों पर ही निर्भर थी। वजह, तब सर्विलांस जैसे हाईटेक संसाधन नहीं थे। लेकिन इसके बाद हालात बदलते गए।
दो युवतियों के मिले थे कटे सिर
तीन दिसंबर 2015 को जिले के मानपुर इलाके में कमियापुर गांव के पास पुलिया के नीचे ट्रैवलिंग बैग में दो युवतियों के कटे सिर मिले थे। 4 दिसंबर को लखनऊ के आईआईएम रोड पर कैरियर डेंटल के पास चार पैर और दो धड़ मिले थे। दोनों घटनाओं को एक से जोड़कर जांच शुरू की गई। लखनऊ जोन से पूरे प्रदेश में मामला गूंजा था, लेकिन आज भी इस घटना का खुलासा नहीं हो सका। लिहाजा पुलिस ने नाकामी पर एफआर जरूर लगा दी।
दो लोगों की हुई थी हत्या
28 नवंबर 2021 को महोली में अलग-अलग स्थानों पर दो लोगों की गोली मारकर हत्या कर दी गई। एक पिकअप चालक की, दूसरे किसान की। किसान के मामले में एक नामजद हुआ है, लेकिन वही आरोपी है, इस पर पुलिस अभी पुख्ता तौर पर कुछ नहीं कह रही है। लापता नौकर का पता नहीं चल सका। पिकअप चालक की हत्या में भी पुलिस खाली हाथ है।
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बदलते दौर में पुलिसिंग के तौर तरीके तो बदलते चले गए, लेकिन इसी के साथ पुलिस महकमे की सबसे मजबूत कड़ी माने जाने वाले भरोसेमंद मुखबिरों का साथ छूटता चला गया। आधुनिकता के दौर में भले ही खाकी हाईटेक संसाधनों से लैस हो गई हो, पर बेसिक पुलिसिंग से दूर होती गई। मुखबिरों की मदद नहीं मिलने से न तो बड़ी घटनाओं का पुलिस खुलासा कर पा रही है और न ही अपराधी पकड़ में आ रहे हैं।
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पुलिस के अफसर भी दबी जुबान ये बात स्वीकार करते हैं, लेकिन मौजूदा दौर में अब पुराने दौर को लाना मुमकिन नहीं है। जिले में पिछले कई सालों के भीतर कई जघन्य वारदातें हों या फिर हाल में हुई घटनाएं, हर मामलों में पुलिस का नेटवर्क कमजोर ही रहा है। इसी वजह से घटनाओं का खुलासा नहीं हो सका।
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प्रेस नोट तक सिमट गए मुखबिर
पुलिस हर छोटे-बड़े मामलेे के खुलासे में जारी प्रेस नोट में यही जिक्र करती है कि मुखबिर की सूचना पर कार्रवाई की गई, लेकिन ऐसा होता नहीं है। सच तो यही है कि पुलिस को हाईटेक संसाधनों के नाम पर मिले सर्विलांस की मदद से ही घटनाओं का खुलासा कर अपराधियों को गिरफ्तार करती है। ऐसे में यह कहना गलत नहीं होगा कि मुखबिर प्रेस नोट तक ही सिमट गए हैं।
इसलिए किनारा करते चले गए मुखबिर
पुलिस सूत्रों की माने तो शुरुआती दौर में मुखबिर ही पुलिस की मजबूत कड़ी थे। कोई घटना होने पर मुखबिरों को फैला दिया जाता था। मुखबिर पूरी जानकारी देते थे। इसके बाद पुलिस अपने हिसाब से काम करती थी और कामयाबी भी मिलती थी, लेकिन धीरे-धीरे पुलिस ने मुखबिरों के साथ ही खेल शुरू कर दिया। कई बड़ी घटनाएं होने पर जब कोई क्लू नहीं मिलता था तो पुलिस मुखबिरों को ही उस मामले में लपेट देती थी।
कई मुखबिरों को पुलिस ने अपराधी बताकर एनकाउंटर में मार दिया। इसके कई मामले भी सामने आए। इन्हीं वजहों से मुखबिरों ने पुलिस से दूरियां बना ली और एक समय ऐसा आ चुका है अब मुखबिर बचे ही नहीं हैं।
जान जोखिम में डालकर करते थे मुखबिरी
जिले में कई ऐसे लोग हैं, जो कभी पुलिस के लिए मुखबिरी करते थे, लेकिन अब दूरी बना ली है। नाम न छापने की शर्त कई मुखबिरों ने बताई कि वह पुलिस के लिए जान जोखिम में डालकर काम करते थे, लेकिन पुलिस ने भरोसा ही खो दिया। मुखबिरी करने पर कई बार क्षेत्र में दुश्मनी भी हो जाती थी। पुलिस से दूरी बनाने की कोशिश की जाती तो फर्जी मामलों में जेल तक भेज दिया जाता था।
पुलिस के जानकारों की माने तो मुखबिरों को कई नाम से जाना जाता था। मुखबिर, सूत्र, खबरी से लेकर सोर्स का नाम भी दिया जाता था। 1990 से 2000 तक पुलिस कोई भी वारदात पर मुखबिरों पर ही निर्भर थी। वजह, तब सर्विलांस जैसे हाईटेक संसाधन नहीं थे। लेकिन इसके बाद हालात बदलते गए।
दो युवतियों के मिले थे कटे सिर
तीन दिसंबर 2015 को जिले के मानपुर इलाके में कमियापुर गांव के पास पुलिया के नीचे ट्रैवलिंग बैग में दो युवतियों के कटे सिर मिले थे। 4 दिसंबर को लखनऊ के आईआईएम रोड पर कैरियर डेंटल के पास चार पैर और दो धड़ मिले थे। दोनों घटनाओं को एक से जोड़कर जांच शुरू की गई। लखनऊ जोन से पूरे प्रदेश में मामला गूंजा था, लेकिन आज भी इस घटना का खुलासा नहीं हो सका। लिहाजा पुलिस ने नाकामी पर एफआर जरूर लगा दी।
दो लोगों की हुई थी हत्या
28 नवंबर 2021 को महोली में अलग-अलग स्थानों पर दो लोगों की गोली मारकर हत्या कर दी गई। एक पिकअप चालक की, दूसरे किसान की। किसान के मामले में एक नामजद हुआ है, लेकिन वही आरोपी है, इस पर पुलिस अभी पुख्ता तौर पर कुछ नहीं कह रही है। लापता नौकर का पता नहीं चल सका। पिकअप चालक की हत्या में भी पुलिस खाली हाथ है।