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दो से तीन हजार रुपये देकर अस्पताल और घर पहुंचे मरीज
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जिला महिला अस्पताल में एंबुलेंस न मिलने पर ऑटो रिक्शा से अपने नवजात बच्चे के साथ घर जाती महिला। (स
- फोटो : SITAPUR
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सीतापुर। एंबुलेंस कर्मियों की हड़ताल से जनपद में स्वास्थ्य सुविधाएं चरमरा गई है। घर से अस्पताल तक एंबुलेंस के जरिए मुफ्त में पहुंचने वाले लोगों को दो से तीन हजार रुपये तक खर्च करने पड़े। वाहन तलाशने के लिए काफी जद्दोजहद करनी पड़ी। मंगलवार को कुछ इस तरह के नजारे जिला व महिला अस्पताल के बाहर दिखाई दिए। वहीं ग्रामीण इलाकों के लोगों ने पहले एंबुलेंस को फोन किया, जब उन्हें सुविधा नहीं मिल सकी तो वह बाइक व अन्य साधनों का इंतजाम करके अस्पताल पहुंचे। ऐसे में दिन भर लोगों को एंबुलेंस की मदद याद आती रही।
जिले में 102 व 108 नंबर की 97 एंबुलेंस चल रही हैं। इन एंबुलेंस कर्मियों ने ठेका प्रथा बंद करने सहित अन्य मांगों को लेकर दो दिन की अनिश्चितकालीन हड़ताल शुरू कर दी है। इससे जिले में एंबुलेंस सेवा पूरी तरह से बाधित हो गई है, जबकि इन एंबुलेंसों के जरिए रोजाना तीन सौ मरीज अस्पताल से घर व घर से अस्पताल तक पहुंचते थे।
इससे एक तो उनको समय से सुविधा मिल जाती थी। वहीं उन्हे अपनी जेब से एक भी रुपया खर्च नहीं करना पड़ता था। लेकिन अब पैसा भी खर्च करना पड़ रहा है, समय से सुविधा भी नहीं मिल पा रही है। अमर उजाला ने इस हड़ताल की मंगलवार को हकीकत देखी तो लोग एंबुलेंस की याद करते हुए दिखाई दिए।
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अस्पताल पहुंचने में खर्च हुए तीन हजार रुपए
जिला अस्पताल में रेउसा से आए अवनीश ने बताया पिता जी बहुत बीमार थे। एंबुलेंस नहीं मिली तो पड़ोस के गांव जाकर एक चार पहिया वाहन बुक कराया था। जिसने अस्पताल से घर व घर से अस्पताल तक लाने के लिए दो हजार रूपये बचत व डीजल मांगा था। टोल टैक्स अलग से देना था। इससे करीब तीन हजार रूपये अस्पताल तक आने में ही खर्च हो गए।
जिला महिला अस्पताल में भर्ती मीरनगर निवासी सूरजपाल की पत्नी को दो दिन पहले बेटा हुआ था। अस्पताल से पत्नी की छुट्टी कर दी गई थी। इनके पास घर तक जाने का कोई साधन नहीं था। पहले एंबुलेंस को फोन किया, तब पता चला आज एंबुलेंस हड़ताल पर है। ऐसे में सूरजपाल के पास अधिक पैसे भी नहीं थे तो पत्नी को ऑटो रिक्शा से ही घर तक ले गए।
बिसवां निवासी कपिल शुक्ला भी एंबुलेंस पाने के लिए भटक रहे थे। वह भी अस्पताल में बार-बार लोगों से एंबुलेंस कैसे मिलेगी, जानकारी कर रहे थे। जब यह सुविधा नहीं मिली तो वह ट्रैवेल एजेंसी गए। वहां से करीब दो हजार रुपये में चार पहिया वाहन बुक कराया। उसके जरिए पत्नी को लेकर घर गए। कपिल ने बताया कि अस्पताल में इलाज कराने में ही अधिक पैसे खर्च हो गए थे। अब मजबूरी में दो हजार खर्च कर घर जा रहा हूं। कोरोना काल में वैसे भी पैसे की आर्थिक तंगी थी, अब यह और बढ़ गई है। इसी तरह अन्य भी लोग एंबुलेंस के चक्कर में भटकते हुए दिखाई दिए।
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जिले में 102 व 108 नंबर की 97 एंबुलेंस चल रही हैं। इन एंबुलेंस कर्मियों ने ठेका प्रथा बंद करने सहित अन्य मांगों को लेकर दो दिन की अनिश्चितकालीन हड़ताल शुरू कर दी है। इससे जिले में एंबुलेंस सेवा पूरी तरह से बाधित हो गई है, जबकि इन एंबुलेंसों के जरिए रोजाना तीन सौ मरीज अस्पताल से घर व घर से अस्पताल तक पहुंचते थे।
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इससे एक तो उनको समय से सुविधा मिल जाती थी। वहीं उन्हे अपनी जेब से एक भी रुपया खर्च नहीं करना पड़ता था। लेकिन अब पैसा भी खर्च करना पड़ रहा है, समय से सुविधा भी नहीं मिल पा रही है। अमर उजाला ने इस हड़ताल की मंगलवार को हकीकत देखी तो लोग एंबुलेंस की याद करते हुए दिखाई दिए।
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अस्पताल पहुंचने में खर्च हुए तीन हजार रुपए
जिला अस्पताल में रेउसा से आए अवनीश ने बताया पिता जी बहुत बीमार थे। एंबुलेंस नहीं मिली तो पड़ोस के गांव जाकर एक चार पहिया वाहन बुक कराया था। जिसने अस्पताल से घर व घर से अस्पताल तक लाने के लिए दो हजार रूपये बचत व डीजल मांगा था। टोल टैक्स अलग से देना था। इससे करीब तीन हजार रूपये अस्पताल तक आने में ही खर्च हो गए।
जिला महिला अस्पताल में भर्ती मीरनगर निवासी सूरजपाल की पत्नी को दो दिन पहले बेटा हुआ था। अस्पताल से पत्नी की छुट्टी कर दी गई थी। इनके पास घर तक जाने का कोई साधन नहीं था। पहले एंबुलेंस को फोन किया, तब पता चला आज एंबुलेंस हड़ताल पर है। ऐसे में सूरजपाल के पास अधिक पैसे भी नहीं थे तो पत्नी को ऑटो रिक्शा से ही घर तक ले गए।
बिसवां निवासी कपिल शुक्ला भी एंबुलेंस पाने के लिए भटक रहे थे। वह भी अस्पताल में बार-बार लोगों से एंबुलेंस कैसे मिलेगी, जानकारी कर रहे थे। जब यह सुविधा नहीं मिली तो वह ट्रैवेल एजेंसी गए। वहां से करीब दो हजार रुपये में चार पहिया वाहन बुक कराया। उसके जरिए पत्नी को लेकर घर गए। कपिल ने बताया कि अस्पताल में इलाज कराने में ही अधिक पैसे खर्च हो गए थे। अब मजबूरी में दो हजार खर्च कर घर जा रहा हूं। कोरोना काल में वैसे भी पैसे की आर्थिक तंगी थी, अब यह और बढ़ गई है। इसी तरह अन्य भी लोग एंबुलेंस के चक्कर में भटकते हुए दिखाई दिए।