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सहेजे जाएंगे अस्तित्व खो रहे सैकड़ों साल पुराने वृक्ष
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मिश्रिख क्षेत्र के ब्रम्ह देव स्थान पर डेढ़ सौ वर्ष पुराना पीपल का पेड़।
- फोटो : SITAPUR
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सीतापुर। जिले में सैकड़ों वृक्ष सदियों पुराने हैं। इनकी उम्र सौ साल से अधिक है। इन वृक्ष से लोगों की आस्था जुड़ी है। लोग इनकी पूजा करते हैं। विडंबना यह है कि देखरेख व संरक्षण के अभाव में सदियों पुराने कई वृक्ष अस्तित्व खो चुके हैं। तमाम वृक्ष अस्तित्व बचाने की जद्दोजहद कर रहे हैं।
योगी सरकार ने सौ साल और इससे पुराने वृक्षों को संरक्षित करते हुए हेरिटेज के रूप में विकसित करने का निर्णय लिया है। इससे सदियों पुराने वृक्षों के दिन बहुरने की उम्मीद जगी है। भारतीय संस्कृति में वृक्षों को देवता माना जाता है। यह देव वृक्ष हमारी ऐतिहासिक धरोहर हैं। इनसे हजारों लोगों की आस्था जुड़ी हुई है।
सकरन क्षेत्र में गुलरबोझा मार्ग के किनारे लगे लगभग दो सौ साल पुराने पीपल के वृक्ष की बात करें या लहरपुर के मोहल्ला अंबर सरांय में लगे सदियों पुराने बरगद के वृक्ष की, इनसे लोगों की आस्था आज भी जुड़ी है। योगी सरकार द्वारा सौ साल से पुराने वृक्षों को सहेजकर इन्हें हेरिटेज बनाने के निर्णय पर ग्रामीणों में खुशी की लहर है।
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बौधनी के बुजुर्ग चंद्रभाल सिंह, बम्हेरा के कृष्ण कुमार तथा कमलापुर के चुन्नी बाबा कहते हैं कि सरकार का यह सराहनीय निर्णय है। यह देववृक्ष हमारी संस्कृति व सभ्यता का प्रतीक होने के साथ अमूल्य धरोहर हैं।
ऋषि-मुनि करते थे तपस्या
खैराबाद के भुइंया ताली तीर्थ पर सदियों पुराना वट वृक्ष (बरगद का पेड़) लगा है। इसकी यहां कई शाखाएं हैं। मान्यता है कि इस वट वृक्ष के नीचे ऋषि-मुनियों ने तपस्या की थी। औरंगजेब भी यहां आ चुका है। क्षेत्र से सैकड़ों लोगों की आस्था जुड़ी है। आज भी ग्रामीण इस वट वृक्ष की पूजा करते हैं।
महर्षि दधीचि के पुत्र पिप्लादि ने किया तप
मिश्रिख में महर्षि दधीचि मंदिर प्रांगण में लगभग 150 साल पुराना वट वृक्ष लगा है। मान्यता है कि महर्षि दधीचि के पुत्र पिप्लादि ऋषि ने इस वृक्ष के नीचे तपस्या की थी। इस वट वृक्ष से लोगों की आस्था जुड़ी है। बौधनी के पास स्थित ब्रम्ह देवता स्थान पर लगा पीपल का वृक्ष भी करीब 150 वर्ष का बताया जाता है। अश्विन माह की पूर्णिमा पर यहां हर साल दो दिवसीय मेला लगता है।
खनन से खतरे में देव वृक्ष का अस्तित्व
इमलिया सुल्तानपुर क्षेत्र के पचैनापुर गांव में लगा पीपल का पेड़ करीब डेढ़ शताब्दी पुराना है। यह वृक्ष लोगों की आस्था का प्रतीक है। ग्रामीणों के अनुसार जब से भट्ठा मालिकों द्वारा इस पीपल के किनारे खनन किया गया, तब से इसका अस्तित्व खतरे में है। पीपल का पेड़ एक ओर झुक गया है।
तुलसीदास ने लगाया था वट वृक्ष
कमलापुर क्षेत्र के जयरामपुर गांव में लगा सदियों पुराना वट वृक्ष आज भी सुदूरवर्ती क्षेत्र के लोगों की आस्था का प्रतीक है। इसके पास में रामचरित मानस के रचयिता तुलसीदास का मंदिर है। मान्यता है कि नैमिषारण्य जाने के दौरान तुलसीदास जी इस जगह ठहरे थे। यह वट वृक्ष उन्होंने ही लगाया गया था।
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योगी सरकार ने सौ साल और इससे पुराने वृक्षों को संरक्षित करते हुए हेरिटेज के रूप में विकसित करने का निर्णय लिया है। इससे सदियों पुराने वृक्षों के दिन बहुरने की उम्मीद जगी है। भारतीय संस्कृति में वृक्षों को देवता माना जाता है। यह देव वृक्ष हमारी ऐतिहासिक धरोहर हैं। इनसे हजारों लोगों की आस्था जुड़ी हुई है।
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सकरन क्षेत्र में गुलरबोझा मार्ग के किनारे लगे लगभग दो सौ साल पुराने पीपल के वृक्ष की बात करें या लहरपुर के मोहल्ला अंबर सरांय में लगे सदियों पुराने बरगद के वृक्ष की, इनसे लोगों की आस्था आज भी जुड़ी है। योगी सरकार द्वारा सौ साल से पुराने वृक्षों को सहेजकर इन्हें हेरिटेज बनाने के निर्णय पर ग्रामीणों में खुशी की लहर है।
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बौधनी के बुजुर्ग चंद्रभाल सिंह, बम्हेरा के कृष्ण कुमार तथा कमलापुर के चुन्नी बाबा कहते हैं कि सरकार का यह सराहनीय निर्णय है। यह देववृक्ष हमारी संस्कृति व सभ्यता का प्रतीक होने के साथ अमूल्य धरोहर हैं।
ऋषि-मुनि करते थे तपस्या
खैराबाद के भुइंया ताली तीर्थ पर सदियों पुराना वट वृक्ष (बरगद का पेड़) लगा है। इसकी यहां कई शाखाएं हैं। मान्यता है कि इस वट वृक्ष के नीचे ऋषि-मुनियों ने तपस्या की थी। औरंगजेब भी यहां आ चुका है। क्षेत्र से सैकड़ों लोगों की आस्था जुड़ी है। आज भी ग्रामीण इस वट वृक्ष की पूजा करते हैं।
महर्षि दधीचि के पुत्र पिप्लादि ने किया तप
मिश्रिख में महर्षि दधीचि मंदिर प्रांगण में लगभग 150 साल पुराना वट वृक्ष लगा है। मान्यता है कि महर्षि दधीचि के पुत्र पिप्लादि ऋषि ने इस वृक्ष के नीचे तपस्या की थी। इस वट वृक्ष से लोगों की आस्था जुड़ी है। बौधनी के पास स्थित ब्रम्ह देवता स्थान पर लगा पीपल का वृक्ष भी करीब 150 वर्ष का बताया जाता है। अश्विन माह की पूर्णिमा पर यहां हर साल दो दिवसीय मेला लगता है।
खनन से खतरे में देव वृक्ष का अस्तित्व
इमलिया सुल्तानपुर क्षेत्र के पचैनापुर गांव में लगा पीपल का पेड़ करीब डेढ़ शताब्दी पुराना है। यह वृक्ष लोगों की आस्था का प्रतीक है। ग्रामीणों के अनुसार जब से भट्ठा मालिकों द्वारा इस पीपल के किनारे खनन किया गया, तब से इसका अस्तित्व खतरे में है। पीपल का पेड़ एक ओर झुक गया है।
तुलसीदास ने लगाया था वट वृक्ष
कमलापुर क्षेत्र के जयरामपुर गांव में लगा सदियों पुराना वट वृक्ष आज भी सुदूरवर्ती क्षेत्र के लोगों की आस्था का प्रतीक है। इसके पास में रामचरित मानस के रचयिता तुलसीदास का मंदिर है। मान्यता है कि नैमिषारण्य जाने के दौरान तुलसीदास जी इस जगह ठहरे थे। यह वट वृक्ष उन्होंने ही लगाया गया था।