फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Uttar Pradesh ›   Sitapur News ›   Bio-decomposer will be able to make manure from straw in the field itself

बायो डिकंपोजर से खेत में ही पराली से बना सकेंगे खाद

Sun, 21 Nov 2021 11:57 PM IST
Lucknow Bureau लखनऊ ब्यूरो
Updated Sun, 21 Nov 2021 11:57 PM IST
विज्ञापन
Bio-decomposer will be able to make manure from straw in the field itself
सीतापुर। किसान पराली को खेत में ही सड़ाकर खाद बनाएं। जिससे खेत के सूक्ष्म जीवाणुओं की सक्रियता बढ़ने से उत्पाद भी बढ़ेगा। खाद का कम प्रयोग करना होगा। इससे फसल की लागत में कमी आएगी। इसके लिए कृषि विभाग द्वारा बायो डिकंपोजर मुफ्त में उपलब्ध कराया जाएगा। जिसका प्रयोग किसानों को पराली वाले खेतों में करना है।
विज्ञापन

पराली जलाने से पर्यावरण प्रदूषण बढ़ता है। तमाम रोक और नियमों के बावजूद पराली जलाने की घटनाएं रुक नहीं रही हैं। अब शायद इससे निजात मिल जाए। इसके लिए नई तकनीक विकसित की गई है। किसानों को बायो डिकंपोजर के पैकेट निशुल्क उपलब्ध कराए जाएंगे। एक पैकेट में चार कैप्सूल होंगे। इससे वह घोल बनाकर पराली वाले खेत में डालकर उसे सड़ा सकेंगे।
विज्ञापन

सड़ने के बाद पराली खाद का काम करेगी। घोल खेत की पलेवा करते समय या इसके पहले भी प्रयोग किया जा सकता है। पराली को इकट्ठा करके भी उसका प्रबंधन किया जा सकता है। एडीएम राम भरत तिवारी ने सभी एसडीएम को निर्देश दिए हैं कि कृषि विभाग द्वारा बायो डिकंपोजर का वितरण निशुल्क कराया जा रहा है।
विज्ञापन
विज्ञापन

अपनी तहसील के लिए निर्धारित लक्ष्यों के सापेक्ष इसका वितरण किसानों के मध्य कराकर फसल अवशेष को खेते में ही गलाकर प्रबंधन व्यवस्था सुनिश्चित की जाए। उप कृषि निदेशक अरविंद मोहन मिश्रा ने बताया कि 35 हजार बायो डिकंपोजर के पैकेट उपलब्ध हैं। इसे 22 नवंबर से कृषि बीज भंडारों से वितरित किया जाना है। ब्लॉक स्तर पर गोष्ठियां आयोजित कर वितरण किया जाएगा। किसानों को इसके उपयोग की जानकारी दी जाएगी।
इस प्रकार करना है प्रयोग
उप कृषि निदेशक अरविंद मोहन मिश्रा ने बताया कि बायो डिकंपोजर के एक पैकेट में चार कैप्सूल हैं। इससे पांच लीटर घोल बनाया जाना है। इसके बाद आवश्यकतानुसार दो सौ लीटर पानी में घोल मिलाकर प्रयोग किया जा सकता है। कैप्सूल से तैयार किया गया घोल दही के जामन जैसा है, उससे अधिक घोल भी तैयार किया जा सकता है।
पराली वाले खेत में मल्चर चलाकर पलेवा या बुआई के बाद की जाने वाली सिंचाई के साथ घोल का प्रयोग किया जा सकता है। कृषि विज्ञान केंद्र कटिया के प्रभारी अध्यक्ष कृषि वैज्ञानिक डॉ. दया श्रीवास्तव का कहना है कि दो सौ लीटर ताजा पानी लेकर उसमें एक-एक किग्रा. बेसन और गुड़ को घोलकर मिलाना है। इसी में एक पैकेट के सभी चार कैप्सूल घोलने हैं। इसके एक सप्ताह बाद उसे एक एकड़ के खेत में प्रयोग करना है। बेसन व गुड़ जीवाणुओं का भोजन है।

डॉ. दया ने बताया कि फसलों के अवशेष खेत में मिल जाएं तो किसानों को कम खाद का प्रयोग करना होगा। मृदा का स्वास्थ्य भी अच्छा रहेगा। मृदा में जितना भी फसल अवशेष घोला जाएगा या प्रयोग किया जाएगा, मृदा की उर्वरकता बढ़ेगी। मिट्टी में सूक्ष्म जीवाणुओं की सक्रियता बढ़ेगी। जिससे फसल उत्पादन अच्छा मिलेगा।
विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News App, iOS Hindi News App और Amarujala Hindi News APP अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed