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औने-पौने दामों में गन्ना बेच रहे किसान

Tue, 21 Oct 2014 05:31 AM IST
Sitapur
Sitapur Updated Tue, 21 Oct 2014 05:31 AM IST
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अमर उजाला ब्यूरो
सीतापुर। चीनी मिलों पर किसानों का 85 करोड़ 8 लाख रुपयेे बकाया है। हाईकोर्ट के सख्ती के बाद भी शासन व प्रशासन बकाए का भुगतान करा पाने में नाकाम साबित हो रहा है। इससे सबक लेते हुए गन्ना किसानों ने इस बार पेराई सत्र के शुरू होने का इंतजार किए बगैर ही औने-पौने दामों पर गन्ना बेचना शुरू कर दिया है।
पिछले साल के कड़वे अनुभव ने किसानों को तगड़ा सबक दिया हैे। यहां मिलों पर किसानों का लगभग 85 करोड़ 8 लाख रुपये बकाया है। जिसका भुगतान सरकार अभी तक नहीं करा पाई। इस कारण दशहरा के साथ ही किसान गन्ने का पूजन कर उसे बेचना शुरू कर दिया। बीते वर्ष 280 रुपये प्रति क्विंटल की दर से बिकने वाला गन्ना इस बार कोल्हुओं पर 150 से 170 रुपये प्रति क्विंटल ही बिक रहा है। शादी-ब्याह और दूसरी जरूरतों ने किसानों को घटी दरों पर अपना गन्ना बेचने पर विवश कर दिया है। शासन के गन्ना एक्ट में भी एक अक्टूबर से पेराई सत्र शुरू करने के निर्देश हैं। जिले में पांच चीनी मिलें हैं। सितंबर माह में गन्ना आयुक्त के यहां बुलाई गई किसानों, अधिकारियों व मिल प्रबंधकों की संयुक्त सर्वेक्षण बैठक में जिले की निजी चीनी मिलों का एक भी प्रतिनिधि शामिल होने नहीं गया। इससे लगता है, कि मिलें सरकार टकराव के मूड में हैं। रंगराजन समिति की सिफारिशें लागू करने की मांग को लेकर मिलों के प्रबंधक अड़े हुए हैं। शुगर मिल एसोसिएशन जहां 225 रुपये प्रति क्विंटल से अधिक मूल्य देने को राजी नहीं हैं। वहीं सरकार गत वर्ष से कम मूल्य से नीचे न जाने पर अड़ी है। मिल और सरकार की लड़ाई में किसान पिस रहे हैं। हाईकोर्ट ने अपनी निगरानी में गन्ना बकाया भुगतान के लिए निर्देश दिए थे। जिसके तहत मिलों की चीनी सीज कर बाजार में नीलामी कर किसानों का भुगतान करने, मनमानी करने वाली मिलों पर केस दर्ज कराने के आदेश जारी किए गए थे। तत्कालीन डीएम जेपी सिंह ने जवाहरपुर व हरगांव चीनी मिल की चीनी सील कराकर मुकदमा दर्ज कराया था। लेकिन चीनी की नीलामी नहीं करा सके थे। दबाव में मिलों ने नाममात्र का भुगतान किया। लेकिन अधिकतर चीनी बिक्री कर ऋण भुगतान करने की रिपोर्ट प्रशासन को थमाकर अपना पल्ला झाड़ लिया।
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शासन के केन एक्ट के अनुसार एक अक्तूबर से पेराई सत्र का शुभारंभ हो जाना चाहिए। जिले में निजी चीनी मिलों की बात दूर सहकारी मिल भी निर्धारित तारीख पर शुरू नहीं कराई जा सकी है।
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