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मुद्दे बेअसर, सांप्रदायिक ध्रुवीकरण आया नजर
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सीतापुर। सभी प्रमुख दलों की चुनावी जनसभा में स्टार प्रचारकों ने विकास, भ्रष्टाचार, बेरोजगारी, आतंकवाद, कानून व्यवस्था और राष्ट्रीय सुरक्षा सरीखे मुद्दे उछाले थे। मगर मतदान के दौरान ये सारे मुद्दे दरकिनार हो गए।
यहां चुनाव सांप्रदायिक ध्रुवीकरण पर ही टिका नजर आया। मुख्य मुकाबला भाजपा तथा सपा-बसपा गठबंधन के बीच सिमटकर रह गया।
वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव में मोदी लहर ने कमाल दिखाया था। मगर तब भाजपा को सपा व बसपा दोनों पार्टियों से अलग-अलग लड़ना था।
इस बार लोकसभा चुनाव में सपा-बसपा ने गठबंधन कर भाजपा को चुनौती दी। गठबंधन के चलते ध्रुवीकरण को गति मिली। दरअसल, सीतापुर सीट पर गठबंधन प्रत्याशी के रूप में नकुल दुबे चुनाव लड़ रहे हैं।
सपा-बसपा के परंपरागत वोट बैंक के अलावा ब्राह्मण वोटरों को अपने पाले में करने के लिए इन्होंने पूरा दमखम लगा दिया। इसी तरह कांग्रेस प्रत्याशी कैसरजहां ने पार्टी के परंपरागत वोटरों के साथ ही मुस्लिम वोट बैंक में सेंध लगाने की भरपूर कोशिश की है।
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भाजपा प्रत्याशी राजेश वर्मा की लड़ाई पार्टी के परंपरागत वोटरों तथा कुर्मी वोट बैंक पर टिकी है। जातीय समीकरणों के इस मकड़जाल में उलझी कुर्सी की लड़ाई अब तक त्रिकोणीय लग रही थी।
मगर सोमवार को मतदान के बाद तस्वीर बिल्कुल साफ हो गई। गुम हुए मुद्दों के बीच मतदान में सिर्फ सांप्रदायिक ध्रुवीकरण ही नजर आया। नतीजतन, मुख्य मुकाबला भाजपा और गठबंधन के बीच सिमटकर रह गया है।
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यहां चुनाव सांप्रदायिक ध्रुवीकरण पर ही टिका नजर आया। मुख्य मुकाबला भाजपा तथा सपा-बसपा गठबंधन के बीच सिमटकर रह गया।
वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव में मोदी लहर ने कमाल दिखाया था। मगर तब भाजपा को सपा व बसपा दोनों पार्टियों से अलग-अलग लड़ना था।
इस बार लोकसभा चुनाव में सपा-बसपा ने गठबंधन कर भाजपा को चुनौती दी। गठबंधन के चलते ध्रुवीकरण को गति मिली। दरअसल, सीतापुर सीट पर गठबंधन प्रत्याशी के रूप में नकुल दुबे चुनाव लड़ रहे हैं।
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सपा-बसपा के परंपरागत वोट बैंक के अलावा ब्राह्मण वोटरों को अपने पाले में करने के लिए इन्होंने पूरा दमखम लगा दिया। इसी तरह कांग्रेस प्रत्याशी कैसरजहां ने पार्टी के परंपरागत वोटरों के साथ ही मुस्लिम वोट बैंक में सेंध लगाने की भरपूर कोशिश की है।
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भाजपा प्रत्याशी राजेश वर्मा की लड़ाई पार्टी के परंपरागत वोटरों तथा कुर्मी वोट बैंक पर टिकी है। जातीय समीकरणों के इस मकड़जाल में उलझी कुर्सी की लड़ाई अब तक त्रिकोणीय लग रही थी।
मगर सोमवार को मतदान के बाद तस्वीर बिल्कुल साफ हो गई। गुम हुए मुद्दों के बीच मतदान में सिर्फ सांप्रदायिक ध्रुवीकरण ही नजर आया। नतीजतन, मुख्य मुकाबला भाजपा और गठबंधन के बीच सिमटकर रह गया है।