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जोखिम के बीच स्कूल का सफर
ब्यूरो/अमर उजाला सिद्धार्थनगर
Updated Fri, 20 Jan 2017 10:57 PM IST
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सरकारी स्कूलों में ठंड में बच्चों से अत्याचार
- फोटो : अमर उजाला
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सिद्धार्थनगर। नौनिहालों की जान जोखिम में है। स्कूल वाहनों के नाम पर सड़कों पर जर्जर गाड़ियां फर्राटा भर रही हैं। जो स्कूल वाहन के मानकों पर खरी नहीं उतरतीं। स्कूल वाहनों मेें न तो प्राथमिक उपचार की पेटिका लगाई गई है और न ही आग की दुर्घटना से निपटने के लिए अग्निशमन यंत्र। जिम्मेदारों की उदासीनता के कारण इनपर कोई कार्रवाई नहीं है जिससे बच्चों को दुर्घटना के वक्त कोई सहूलियत मिल सके।
सरकारी स्कूलों की शिक्षा व्यवस्था को धता बतातेे हुए जिले भर में दो सौ से अधिक प्राइवेट स्कूल संचालित हो रहे हैं। स्कूलों में विभिन्न सुविधा सहूलियत के नाम पर अभिभावकों से मोटी फीस तो वसूल की जाती है पर सुविधा के नाम पर जर्जर स्कूली वाहनों से बच्चों के आवागमन की व्यवस्था मुहैया कराई जा रही है। कुछ विद्यालयों को छोड़ कर अधिकांश विद्यालयों से जर्जर वाहन संचालित किए जा रहे हैं। स्कूल वाहन चलाने के लिए नियम कायदे तो तय किए गए हैं पर इनका पालन हो रहा अथवा नहीं इसे जांचने की जरूरत नहीं समझी गई।
नियम है कि स्कूली वाहन की हर तीन माह पर फिटनेस जांच तो चालकों की आंखों का जांच हर छह माह पर आवश्यक है। बच्चों को प्राथमिक उपचार की सुविधा मुहैया कराने के लिए उपचार पेटिका लगाने की अनिवार्यता रखी गई है पर जिले में इसका मखौल उड़ाया जा रहा है। आग जैसी दुर्घटना से निपटने के लिए अग्निशमन पेटिका रखने का प्रावधान है पर स्कूली वाहनों से यह यंत्र नदारद है। कुछ बसों अगर इसे लगाया गया भी है तो वर्षों से उसकी रिफिलिंग नहीं हुई। ऐसे वाहनों से बच्चों को स्कूल भेजने में अभिभावक भी हिचकते हैं पर बच्चों को बेहतर भविष्य और शिक्षा देने के नाम पर उन्हें चुप रह जाना पड़ता है।
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अभिभावक रऊफ खान का कहना है कि स्कूल वाहनों की जांच आवश्यक है क्योंकि इसमें यात्रा नौनिहालों को करना होती है। बच्चों की सुरक्षा विद्यालय की जिम्मेदारी है। मानकों के विपरीत चल रहे वाहनों में उनका पाल्य सुरक्षित है इसकी चिंता हर वक्त लगी रहती है।
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सरकारी स्कूलों की शिक्षा व्यवस्था को धता बतातेे हुए जिले भर में दो सौ से अधिक प्राइवेट स्कूल संचालित हो रहे हैं। स्कूलों में विभिन्न सुविधा सहूलियत के नाम पर अभिभावकों से मोटी फीस तो वसूल की जाती है पर सुविधा के नाम पर जर्जर स्कूली वाहनों से बच्चों के आवागमन की व्यवस्था मुहैया कराई जा रही है। कुछ विद्यालयों को छोड़ कर अधिकांश विद्यालयों से जर्जर वाहन संचालित किए जा रहे हैं। स्कूल वाहन चलाने के लिए नियम कायदे तो तय किए गए हैं पर इनका पालन हो रहा अथवा नहीं इसे जांचने की जरूरत नहीं समझी गई।
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नियम है कि स्कूली वाहन की हर तीन माह पर फिटनेस जांच तो चालकों की आंखों का जांच हर छह माह पर आवश्यक है। बच्चों को प्राथमिक उपचार की सुविधा मुहैया कराने के लिए उपचार पेटिका लगाने की अनिवार्यता रखी गई है पर जिले में इसका मखौल उड़ाया जा रहा है। आग जैसी दुर्घटना से निपटने के लिए अग्निशमन पेटिका रखने का प्रावधान है पर स्कूली वाहनों से यह यंत्र नदारद है। कुछ बसों अगर इसे लगाया गया भी है तो वर्षों से उसकी रिफिलिंग नहीं हुई। ऐसे वाहनों से बच्चों को स्कूल भेजने में अभिभावक भी हिचकते हैं पर बच्चों को बेहतर भविष्य और शिक्षा देने के नाम पर उन्हें चुप रह जाना पड़ता है।
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अभिभावक रऊफ खान का कहना है कि स्कूल वाहनों की जांच आवश्यक है क्योंकि इसमें यात्रा नौनिहालों को करना होती है। बच्चों की सुरक्षा विद्यालय की जिम्मेदारी है। मानकों के विपरीत चल रहे वाहनों में उनका पाल्य सुरक्षित है इसकी चिंता हर वक्त लगी रहती है।