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Siddharthnagar News: आखिर तक आशियाना बचने की थी उम्मीद, अब हटा रहे मलबा

Mon, 21 Apr 2025 11:20 PM IST
Gorakhpur Bureau गोरखपुर ब्यूरो
Updated Mon, 21 Apr 2025 11:20 PM IST
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There was hope to save the home till the end, now the debris is being removed
मनोज जायसवाल के घर के पीछे की खाली भूमि पर बिखरा घर का सामान। संवाद
संवाद न्यूज एजेंसी
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बांसी। रामलीला मैदान जदीद बाजार में गिराए गए मकान व दुकान का मलबा हटाने में लोग सोमवार को दिनभर व्यस्त रहे। मौके पर मौजूद मनोज कुमार जायसवाल ने बताया कि उनके पास इसके अलावा कहीं कोई अन्य मकान नहीं है। हमारा परिवार ने दूसरों के घर रात गुजारी है। उन्होंने कहा कि पूरे परिवार को रात में नींद नहीं आई है लोग करवट बदलते रहे और सुबह हो गई।
उन्होंने यह भी कहा कि जो मेरा मकान गिराया गया है उसके पीछे खाली जमीन पर उनका सारा सामान बिखरा पड़ा है। घर का सामान रखने के लिए उनके पास कोई सुरक्षित स्थान नहीं है। बांसी कस्बा के रामलीला मैदान से 50 वर्ष से अवैध कब्जा वाले चार रिहायशी मकान और 13 दुकानों को प्रशासन ने रविवार को बुलडोजर चलाकर जमींदोज कर दिया। नगर पालिका प्रशासन की तरफ से पहले 17 सितंबर 2024 को नियमानुसार नोटिस मिलने के बाद भी इन भवन स्वामियों को आखिर तक अपना आशियाना व दुकान बचे रहने की उम्मीद थी। इसी के तहत इन्होंने उक्त नोटिस का जवाब एवं आपत्ति की। इसका निस्तारण करते हुए नगर पालिका ने 13 दिसंबर 2024 को अतिक्रमण हटाए जाने के लिए दोबारा नोटिस दिया।
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इसके बाद भी उन्होंने आस नहीं छोड़ी और अतिक्रमण नहीं हटाते हुए जिलाधिकारी न्यायालय में अपील की। इस अपील पर विस्तृत सुनवाई कर जिलाधिकारी ने 12 मार्च 2025 को दिए आदेश में अपील निरस्त कर दी। इसके बाद प्रशासन ने रविवार को अवैध कब्जा पर कार्रवाई करते हुए सभी मकानों एवं दुकानों को ध्वस्त कर दिया। अब इन मकानों और दुकानों के स्वामियों द्वारा जेसीबी और ट्रैक्टर ट्राॅली लगाकर ईंट, सरिया और मलबे को यहां से हटाकर अन्यत्र पहुंचाया जा रहा था। मलबे को हटाने में अभी कई दिन लगने की संभावना है।
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हटाए गए भवन के स्वामी मोनू जायसवाल व मनोज जायसवाल ने बताया कि देश की आजादी से पूर्व का उनके पूर्वजों ने मकान से संबंधित राजा बांसी द्वारा दी गई रशीद, बैनामे का दस्तावेज, नगर पालिका उससे पूर्व टाउन एरिया द्वारा दी गई गृहकर की रशीद को संभाल कर रखा था जिसे हमें सौंपा था। इन कागजात को हम पुख्ता सबूत मान रहे थे। इन सभी कागजात को प्रशासन ने एक झटके के रद्दी साबित कर दिया और चार पीढ़ी बीत जाने के बाद आज हम ठगे महसूस कर रहे है। इनका कहना है कि इन्हें जरा सा एहसास होता कि यह उनका मकान नहीं है तो कुछ वर्षों पूर्व पुराने मकान में लाखों रुपया खर्च कर रहने लायक नहीं बनाता।
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