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Siddharthnagar News: मेडिकल कॉलेज में नहीं है बर्न यूनिट
Fri, 10 Mar 2023 11:15 PM IST
गोरखपुर ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, सिद्धार्थनगर
संवाद न्यूज एजेंसी, सिद्धार्थनगर
Updated Fri, 10 Mar 2023 11:15 PM IST
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20 प्रतिशत से अधिक जलने वाले मरीजों को कर दिया जाता है रेफर
माधव प्रसाद त्रिपाठी मेडिकल कॉलेज में नहीं है बर्न यूनिट
आने वाले मरीजों को निजी अस्पताल जाना है मजबूरी
दो वर्ष पहले सर्जिकल वार्ड के एक कमरे में आरक्षित था बर्न यूनिट
संवाद न्यूज एजेंसी
सिद्धार्थनगर। माधव प्रसाद त्रिपाठी मेडिकल कॉलेज में बेहतर स्वास्थ्य सेवा का दावा हवा हवाई साबित हो रहा है। सबसे गंभीर मसला है कि यहां पर एक बर्न यूनिट भी नहीं है। ऐसे में आग से झुलसे गंभीर रोगियों को देखते ही रेफर कर दिया जाता है। क्योंकि जलने वाले मरीजों को रखने के लिए अलग से वार्ड होना चाहिए, जहां पर सफाई व्यवस्था बेहतर होने के साथ ही बाहरी व्यक्ति का आना-जाना न हो। इसे देखते हुए मरीजों को अन्यत्र भेज दिया जा रहा है। गर्मी के मौसम में जलने की घटनाएं बढ़ेंगी। ऐसे में बड़ी घटना होने पर अनहोनी से इन्कार नहीं किया जा सकता है। जिले की तकरीबन 29 लाख की आबादी को बेहतर स्वास्थ्य सेवाओं का लाभ मिले, इसके लिए जिला अस्पताल को मेडिकल कॉलेज में बदल दिया गया। मेडिकल कॉलेज होने के बाद भी लोगों को जो सुविधाएं मिलनी चाहिए वह नहीं मिल पा रही हैं। मेडिकल कॉलेज तो चलने लगा, लेकिन यहां झुलसे मरीजों को रखकर इलाज करने की कोई व्यवस्था नहीं है। जबकि सामान्य दिनों में हर माह पांच से दस मरीज आग से झुलसकर पहुंचते हैं। वहीं गर्मी में आग लगने की घटनाएं बढ़ती हैं, जिसमें जलने वालों की संख्या बढ़ जाती है। सुविधा न होने के कारण जलकर आने वाले मरीजों को देखते ही रेफर कर दिया जाता है। जहां निजी अस्पताल में जाने पर रुपये खर्च होने के साथ ही जिंदगी भी खतरे में रहती है। नगर निवासी रमेश कुमार, हितेंद्र और उमेश ने कहा कि मेडिकल कॉलेज बना तो लगा कि सुविधाएं अच्छी हो जाएंगी। लेकिन आज भी यहां सुविधाओं का अभाव है, मरीजों को विवश होकर निजी अस्पताल में जाना पड़ता है।
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20 प्रतिशत जलने वाले मरीजों का ही हो पाता है इलाज
मेडिकल कॉलेज के स्वास्थ्य कर्मियों के मुताबिक 20 प्रतिशत से कम जलने वाले उन मरीजों का इलाज हो जाता है। जिनका हाथ और पैर जला रहा है। अगर पेट और सीना जला रहता है तो उन्हें भी रेफर करना पड़ता है। क्योंकि उन मरीजों के लिए यहां पर विशेष सुविधा की जरूरत है जो कि मेडिकल कॉलेज में नहीं है।
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बर्न वार्ड में यह सुविधा जरूरी
स्वास्थ्य विभाग के मुताबिक बर्न यूनिट पूरी तरह से वातानुकूलित होना चाहिए। हमेशा साफ- सफाई होनी चाहिए। किसी भी बाहरी का व्यक्ति का वार्ड में प्रवेश न होना। भर्ती होने वाले मरीज की नियमित डे्रसिंग और दवा लगनी चाहिए, वार्ड में प्रशिक्षित स्वास्थ्य कर्मी होना चाहिए जो मरीजों का समय-समय जांच करके दवा देते रहें।
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दो वर्ष पहले तक था अलग वार्ड
दो वर्ष पहले तक जिला अस्पताल के सर्जिकल वार्ड के बगल में 10 बेड का सर्जिलक वार्ड चल रहा था, जहां पर पूरी व्यवस्था थी। लेकिन उसे भी बंद कर दिया गया है। ऐसे में जलकर आने वाले गंभीर मरीजों को देखते ही गोरखपुर मेडिकल कॉलेज रेफर कर दिया जाता है।
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बोले अधिकारी
मेडिकल कॉलेज में आने वाले मरीजों का इलाज किया जाता है। गंभीर होते हैं, उन्हें रेफर करना पड़ता है। क्योंकि रखने के लिए बर्न यूनिट नहीं है। नये भवन में बर्न यूनिट बन जाएगा, इसके बाद मरीजों को कोई दिक्कत नहीं होगी।
डॉ. एके झा, प्रभारी प्रचार्य श्याम सुंदर तिवारी
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20 प्रतिशत से अधिक जलने वाले मरीजों को कर दिया जाता है रेफर
माधव प्रसाद त्रिपाठी मेडिकल कॉलेज में नहीं है बर्न यूनिट
आने वाले मरीजों को निजी अस्पताल जाना है मजबूरी
दो वर्ष पहले सर्जिकल वार्ड के एक कमरे में आरक्षित था बर्न यूनिट
संवाद न्यूज एजेंसी
सिद्धार्थनगर। माधव प्रसाद त्रिपाठी मेडिकल कॉलेज में बेहतर स्वास्थ्य सेवा का दावा हवा हवाई साबित हो रहा है। सबसे गंभीर मसला है कि यहां पर एक बर्न यूनिट भी नहीं है। ऐसे में आग से झुलसे गंभीर रोगियों को देखते ही रेफर कर दिया जाता है। क्योंकि जलने वाले मरीजों को रखने के लिए अलग से वार्ड होना चाहिए, जहां पर सफाई व्यवस्था बेहतर होने के साथ ही बाहरी व्यक्ति का आना-जाना न हो। इसे देखते हुए मरीजों को अन्यत्र भेज दिया जा रहा है। गर्मी के मौसम में जलने की घटनाएं बढ़ेंगी। ऐसे में बड़ी घटना होने पर अनहोनी से इन्कार नहीं किया जा सकता है। जिले की तकरीबन 29 लाख की आबादी को बेहतर स्वास्थ्य सेवाओं का लाभ मिले, इसके लिए जिला अस्पताल को मेडिकल कॉलेज में बदल दिया गया। मेडिकल कॉलेज होने के बाद भी लोगों को जो सुविधाएं मिलनी चाहिए वह नहीं मिल पा रही हैं। मेडिकल कॉलेज तो चलने लगा, लेकिन यहां झुलसे मरीजों को रखकर इलाज करने की कोई व्यवस्था नहीं है। जबकि सामान्य दिनों में हर माह पांच से दस मरीज आग से झुलसकर पहुंचते हैं। वहीं गर्मी में आग लगने की घटनाएं बढ़ती हैं, जिसमें जलने वालों की संख्या बढ़ जाती है। सुविधा न होने के कारण जलकर आने वाले मरीजों को देखते ही रेफर कर दिया जाता है। जहां निजी अस्पताल में जाने पर रुपये खर्च होने के साथ ही जिंदगी भी खतरे में रहती है। नगर निवासी रमेश कुमार, हितेंद्र और उमेश ने कहा कि मेडिकल कॉलेज बना तो लगा कि सुविधाएं अच्छी हो जाएंगी। लेकिन आज भी यहां सुविधाओं का अभाव है, मरीजों को विवश होकर निजी अस्पताल में जाना पड़ता है।
20 प्रतिशत जलने वाले मरीजों का ही हो पाता है इलाज
मेडिकल कॉलेज के स्वास्थ्य कर्मियों के मुताबिक 20 प्रतिशत से कम जलने वाले उन मरीजों का इलाज हो जाता है। जिनका हाथ और पैर जला रहा है। अगर पेट और सीना जला रहता है तो उन्हें भी रेफर करना पड़ता है। क्योंकि उन मरीजों के लिए यहां पर विशेष सुविधा की जरूरत है जो कि मेडिकल कॉलेज में नहीं है।
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बर्न वार्ड में यह सुविधा जरूरी
स्वास्थ्य विभाग के मुताबिक बर्न यूनिट पूरी तरह से वातानुकूलित होना चाहिए। हमेशा साफ- सफाई होनी चाहिए। किसी भी बाहरी का व्यक्ति का वार्ड में प्रवेश न होना। भर्ती होने वाले मरीज की नियमित डे्रसिंग और दवा लगनी चाहिए, वार्ड में प्रशिक्षित स्वास्थ्य कर्मी होना चाहिए जो मरीजों का समय-समय जांच करके दवा देते रहें।
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दो वर्ष पहले तक था अलग वार्ड
दो वर्ष पहले तक जिला अस्पताल के सर्जिकल वार्ड के बगल में 10 बेड का सर्जिलक वार्ड चल रहा था, जहां पर पूरी व्यवस्था थी। लेकिन उसे भी बंद कर दिया गया है। ऐसे में जलकर आने वाले गंभीर मरीजों को देखते ही गोरखपुर मेडिकल कॉलेज रेफर कर दिया जाता है।
बोले अधिकारी
मेडिकल कॉलेज में आने वाले मरीजों का इलाज किया जाता है। गंभीर होते हैं, उन्हें रेफर करना पड़ता है। क्योंकि रखने के लिए बर्न यूनिट नहीं है। नये भवन में बर्न यूनिट बन जाएगा, इसके बाद मरीजों को कोई दिक्कत नहीं होगी।
डॉ. एके झा, प्रभारी प्रचार्य श्याम सुंदर तिवारी